कितने प्रदेश
नमस्कार!हालचाल ठीक है न! नए नए प्रदेशों के बनाने की मांग होती है । पक्ष विपक्ष में तमाम प्रमाण दिए जाते हैं। राजनीतिक दलों की अपनीपक्षधरता होती है की नए प्रान्त बनने से उन्हें कुर्सी मिल सकती है या नहीं। लोग शहीद होते हैं । लाठियां चलतीं हैंप्रदेश के नाम पर झगड़े होते हैं। फिर एक दिन प्रदेश बन जाता है। तर्कसंगत मांग को भी भारत के लोकतंत्र मेंपूरा पूरा दबाने का काम होता रहता है। ।
मैं उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में बैठकर यह ब्लॉग लिख रहा हूँ । उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावतीजी ने केन्द्र सरकार के पास एक पत्र भेजा है । पत्र भेजकर वह क्या दिखलाना चाहती हैं ? क्यों नही विभाजन केलिए विधान सभा का प्रस्ताव भेजती हैं। उत्तर प्रदेश के विभाजन के लिए कुछ दिनों से मांग के भाषण चालू हैं।
जब भी प्रदेशों के आकार पर चर्चा होती है तो मैं भारत का मानचित्र सामने लेकर बैठ जाता हूँ। विभिन्न प्रदेशों काआकार देखकर कुछ समझ में नहीं आता है। हमारे देश भारत को जिलों में भी बांटा गया है और संसदीय क्षेत्रों मेंभी। क्या लोकसभा के सीट के क्षेत्र की सीमा और जिले की सीमा एक नहीं हो सकती है ? जब सांसद से क्षेत्र केविकास का हिसाब पूछा जाता है तथा जिलाधिकारी से भी तो दोनों का क्षेत्र एक होना ही चाहिए। इसी प्रकारतहसील और विधायक के क्षेत्र की सीमा भी एक समान होनी चाहिए।
बीस या पचीस जिलों का एक राज्य होना चाहिए। यह विभाजन शीघ्र हो सके इसके लिए एक समिति का गठनहोना चाहिए जो भौगोलिक , सांस्कृतिक ,एवं प्रशासनिक दृष्टि पूरे देश का अध्ययन कर के बंटवारे का खाका एवंअपना पक्ष प्रस्तुत करे। उस रिपोर्ट को प्रकाशित करके जनता की अदालत में लाया जाए तथा जनता की रायजानने के लिए प्रश्नावली प्रकाशित कर उत्तर प्राप्त की जाए ।
भाषा के आधार पर राज्य का गठन अब उचित नहीं लगता है । बंगाल का नक्शा देखें उत्तर बंगाल के लोगों को "कलकत्ता" या "कोलकाता" से क्या लेना देना है। पश्चिम बंगाल के वर्तमान या भावी मुख्यमंत्री केवल दार्जीलिंग के चायकी आय से मतलब रखते हैं वहाँ के गाँवों के लोग क्या सोचते हैं उससे उनका क्या मतलब। राजनैतिक सोच भी यदि विकास के लिए होगी तो उसका परिणाम दूसरा होगा। राजनैतिक दलों में ऐसे राजनेताओं की कमी है जो देशके विकास को वास्तव में सर्वोपरि मानते हैं । वर्त्तमान परिदृश्य तो पैसा, पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई का है । देशऔर प्रदेश का विकास गौड़ प्रश्न है । भारत के दुर्भाग्य से भारत के सभी राष्ट्रीय राजनैतिक दल अपने चरित्र काप्रदर्शन कर चुके हैं। उन्हें कोई शर्म भी नहीं है।
इस समय राज्यों के पुनर्गठन की बात मुख्य चर्चा में है। अब यह मीडिया पर है की वह पूरे परिदृश्य को किस और मोड़ देने का प्रयास करती है। उसे भारत विकास अच्छा लगता है या अपने समाचार की कीमत।
नमस्कार