नमस्कार!
हालचाल ठीक है. कई दिनों से पछुआ तेजी पर है. यूपी आग से त्रस्त है. सूखा भी है. कुछ प्रदेशों में सूखा से पानी का भयंकर संकट है. कई प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं . चुनावी जुमलेबाजियाँ भी चल रही हैं. भारत राज-दल संकट से गुजर रहा है. पूरी राजनीति को कुछ परिवार (संघ-परिवार) को शामिल करते हुए चला रहे हैं. वाम-दल सठिया गए हैं. उन्हें भी विधायिका की कुर्सी का चस्का लग गया है. युवा चापलूसी और चमचागीरी में लगे हैं. किसी भी दल में वास्तविक लोकतंत्र नहीं है. दलों की कार्यकारिणी में सठिया गए लोगों की कुटिल नीति चल रही है. मोदी ने साहस किया और सफल हुए. अन्य दलों में युवा अपना रास्ता बना नहीं पा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति के लाभ हैं.
ऐसे राजनैतिक परिवेश में स्वर्णकार उत्पाद-कर/एक्साइज ड्यूटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और भाजपा को छोड़कर सभी राजदल विरोध में हैं. भारत में योजनाओं के मूल्यांकन पर समीक्षा नहीं होती तात्कालिक मत-लाभ के आधार पर अपना तर्क दिया जाता है. असली भुक्तभोगी उपभोक्ता मौन तमाशा देखता है क्योंकि वह अपने नेता/राजा पर आँख मूंदकर विश्वास करता है.
कुछ वर्षों पहले कृषि पर आयकर लगाने की बात उठी थी संसद में खूब विरोध हुआ, भारत के सामान्य किसान भी हाहाकार करने लगे. तब मेरी समझ में जो बात आई थी उसकी पुष्टि अभी कुछ दिनों पूर्व खेती के नाम पर आयकर की चोरी और कालाधन के सृजन के खुलासे से पुष्ट हुई है. भारत में बहुत सारे खुले रहस्य हैं.
लगभग पंद्रह वर्ष पहले आयकर का रिटर्न भरने के लिए मित्र गण एक अधिवक्ता मित्र के पास बैठे थे. कर पर चर्चा करते हुए और हम लोगों के पेटकटाऊ आयकर पर आह भरते हुए उन्होंने कई ठेलेवालों का नाम लेकर बताया की उनकी आमदनी हमलोगों से अधिक है. ऐसी दशा में मुझे उत्पाद कर लगने से कोई आपत्ति नहीं है. छोटे से दुकानदार से लेकर बड़े उद्योग सभी का पंजीकरण होना चाहिए. सभी उत्पाद गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए. हरेक बिक्री पर पक्की रसीद मिलनी चाहिए.
जिस संस्थान में दस से अधिक कर्मचारी हों तो पीयफ नियम लागू होगा. नौ होंगे तो भाड़ में जाएँ. ऐसी स्थिति में हर संस्थान के कर्मचारी को पी यफ का लाभ मिलना चाहिए. प्रत्येक का आनलाइन पंजीकरण होना चाहिए. उत्पादकर, बिक्रीकर/वैट/जीयसटी का पंजीकरण भी आनलाइन होना चाहिए. सरकार कर प्राप्त करती है इसलिए कर के रख रखाव और रसीद की छपाई का दाम निर्धारित कर में से वापस मिलना चाहिए. जो व्यक्ति या संस्थान जितना कर दे उसके अनुपात में सामूहिक जीवन बीमा और सामग्री बीमा होना चाहिये जो व्यक्ति या संस्थान को मिलना चाहिए.
लोग कहते हैं कि इन्स्पेक्टर राज का समापन होना चाहिए. नाम बदल दीजिये कर सहायक नाम दीजिये. अगर राजदल चुनाव चन्दा के नाम पर वसूली बंद कर दें, मंत्रियों और अधिकारियों को भेंट देना बंद हो जाय तो इस्पेक्टर राजा से सहायक हो जायेंगे.
कर से किसी दस्तकार पर संकट नहीं आने वाल है. यदि कर उपयक्त हो अनुचित नहो. कर कराधान के बहाने हप्ता वसूली न हो. आखिर सभी करों का बोझ तो अंतिम क्रेता ही भुगतता है.
धन्यवाद! फिर भेंट होगी .
नमस्कार.
हालचाल ठीक है. कई दिनों से पछुआ तेजी पर है. यूपी आग से त्रस्त है. सूखा भी है. कुछ प्रदेशों में सूखा से पानी का भयंकर संकट है. कई प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं . चुनावी जुमलेबाजियाँ भी चल रही हैं. भारत राज-दल संकट से गुजर रहा है. पूरी राजनीति को कुछ परिवार (संघ-परिवार) को शामिल करते हुए चला रहे हैं. वाम-दल सठिया गए हैं. उन्हें भी विधायिका की कुर्सी का चस्का लग गया है. युवा चापलूसी और चमचागीरी में लगे हैं. किसी भी दल में वास्तविक लोकतंत्र नहीं है. दलों की कार्यकारिणी में सठिया गए लोगों की कुटिल नीति चल रही है. मोदी ने साहस किया और सफल हुए. अन्य दलों में युवा अपना रास्ता बना नहीं पा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति के लाभ हैं.
ऐसे राजनैतिक परिवेश में स्वर्णकार उत्पाद-कर/एक्साइज ड्यूटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और भाजपा को छोड़कर सभी राजदल विरोध में हैं. भारत में योजनाओं के मूल्यांकन पर समीक्षा नहीं होती तात्कालिक मत-लाभ के आधार पर अपना तर्क दिया जाता है. असली भुक्तभोगी उपभोक्ता मौन तमाशा देखता है क्योंकि वह अपने नेता/राजा पर आँख मूंदकर विश्वास करता है.
कुछ वर्षों पहले कृषि पर आयकर लगाने की बात उठी थी संसद में खूब विरोध हुआ, भारत के सामान्य किसान भी हाहाकार करने लगे. तब मेरी समझ में जो बात आई थी उसकी पुष्टि अभी कुछ दिनों पूर्व खेती के नाम पर आयकर की चोरी और कालाधन के सृजन के खुलासे से पुष्ट हुई है. भारत में बहुत सारे खुले रहस्य हैं.
लगभग पंद्रह वर्ष पहले आयकर का रिटर्न भरने के लिए मित्र गण एक अधिवक्ता मित्र के पास बैठे थे. कर पर चर्चा करते हुए और हम लोगों के पेटकटाऊ आयकर पर आह भरते हुए उन्होंने कई ठेलेवालों का नाम लेकर बताया की उनकी आमदनी हमलोगों से अधिक है. ऐसी दशा में मुझे उत्पाद कर लगने से कोई आपत्ति नहीं है. छोटे से दुकानदार से लेकर बड़े उद्योग सभी का पंजीकरण होना चाहिए. सभी उत्पाद गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए. हरेक बिक्री पर पक्की रसीद मिलनी चाहिए.
जिस संस्थान में दस से अधिक कर्मचारी हों तो पीयफ नियम लागू होगा. नौ होंगे तो भाड़ में जाएँ. ऐसी स्थिति में हर संस्थान के कर्मचारी को पी यफ का लाभ मिलना चाहिए. प्रत्येक का आनलाइन पंजीकरण होना चाहिए. उत्पादकर, बिक्रीकर/वैट/जीयसटी का पंजीकरण भी आनलाइन होना चाहिए. सरकार कर प्राप्त करती है इसलिए कर के रख रखाव और रसीद की छपाई का दाम निर्धारित कर में से वापस मिलना चाहिए. जो व्यक्ति या संस्थान जितना कर दे उसके अनुपात में सामूहिक जीवन बीमा और सामग्री बीमा होना चाहिये जो व्यक्ति या संस्थान को मिलना चाहिए.
लोग कहते हैं कि इन्स्पेक्टर राज का समापन होना चाहिए. नाम बदल दीजिये कर सहायक नाम दीजिये. अगर राजदल चुनाव चन्दा के नाम पर वसूली बंद कर दें, मंत्रियों और अधिकारियों को भेंट देना बंद हो जाय तो इस्पेक्टर राजा से सहायक हो जायेंगे.
कर से किसी दस्तकार पर संकट नहीं आने वाल है. यदि कर उपयक्त हो अनुचित नहो. कर कराधान के बहाने हप्ता वसूली न हो. आखिर सभी करों का बोझ तो अंतिम क्रेता ही भुगतता है.
धन्यवाद! फिर भेंट होगी .
नमस्कार.
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