Wednesday, March 9, 2011

आरक्षण

नमस्कार!

आरक्षण आन्दोलन चल रहा है. नौकरियों में जातिगत आरक्षण. विधायिका में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पहले से ही आरक्षण उपलब्ध है. शिक्षा में भी आरक्षण उपलब्ध है.पंचायती राज में भी आरक्षण उपलब्ध है. कुछ दिनों पहले राजस्थान और अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा इसकी चपेट में है. 

एक ओर हम जाति को मनुवादी/ब्राह्मणवादी व्यवस्था की देन कहते हैं. दूसरी ओर जातिवाद चलाकर मत प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं. जाति आधारित आरक्षण के लिए जाति इकाई है. ऎसी स्थिति में हरएक जाति की औसत आय की वास्तविक गणना जरूरी है. जिसकी जानकारी करना लगभग असंभव है. जो लोग नौकरी करते हैं उनकी आय आप जान सकते हैं. लेकिन जिन नौकरिओं में ऊपर की आमदनी है उसे कैसे जानेंगे. जिनके पास जमीन है उसे आप जन सकते हैं. इसके बाद तमाम व्यवसाय हैं जिनकी आमदनी जानना आज के दिन असंभव है.  ऎसी स्थिति में उपलब्ध सूचना को सही मानकर काम चलाना मजबूरी है. १९३५ के बाद जनगणना में जाति का उल्लेख नही हो रहा है किन्तु जाति आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है. मतदाता सूची में जाति का उल्लेख नहीं किया जा रहा है. 

जातिगत आरक्षण के लिए जातिवार सदस्यों की गणना और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी अति आवश्यक है. उसके बाद एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंड की घोषणा करके प्रत्येक जाति की स्थिति को सार्वजनिक करते हुए आरक्षण होना चाहिए जिससे प्रायः आरक्षण की मांग से बचा जा सके. हाईस्कूल और उसके समकक्ष पाठ्यक्रमों में इस पूरी नीति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए जिससे हर छात्र इस सम्बन्ध में जानकारी पा सके. हर एक जाति के समस्त लोगों केलिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए. इसके लिए हमें पूरे आरक्षण के कोटा को पुनः निर्धारित करना पडेगा. 

तमाम अलग अलग वर्गों के लिए अलग अलग आयोग गठित किये गए. लेकिन आवश्यकता एक ऐसे आयोग की है जो यह बता सके कि  हमकों सा कदम उठाये जिससे समता की स्थिति आ सके. कुछ वर्षों पूर्व तक उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु आरक्षित वर्ग से आवेदन ही नहीं प्राप्त होते थे. जो लोग आज की तिथि में विभिन्न सेवा संस्थाओं में आरक्षित वर्ग की संख्या  कम दिखाई दे रही है उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आवेदक कितने थे. 

कुछ वर्षों पूर्व विधि की पढाई करने वाली छात्राओं की अत्यंत कमी थी आज स्थिति बदल गयी है. यह मैं उदाहरण के लिए कह रहा हूँ. आज की तिथि में छोटे कस्बों की छात्राए भी उन तमाम क्षेत्रों में पढाई  कर रहीं हैं जिनमे उनकी संख्या नगण्य थी . इसी प्रकार आरक्षित वर्ग के तमाम छात्र जो वास्तव में पढ़ना और आगे बढ़ना चाहते हैं पढ़ रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. 

भारत में आरक्षण से अधिक आधिक आवश्यक है समुचित शिक्षा की व्यवस्था. अनिवार्य शिक्षा अधिनियम  ठीक से लागू होना चाहिए और जनसँख्या के अनुपात में व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए. जनसंख्या के अनुपात में हर सेवायें प्रदान करनी की व्यवस्था करने पर इस तरह की समस्या अपने आप दूर हो जायगी.  
नमस्कार!

No comments:

Post a Comment