Wednesday, March 9, 2011

हिन्दी बदलेगी तो चलेगी

नमस्कार!

धीरे धीरे हिन्दी आगे बढ़ रही है. हिन्दी भाषा के साथ तकनीकी संकट खड़ा है. साहित्य में कोई संकट नहीं है बस संकट है तो व्यक्तित्व और अहंकार  का. हिन्दी भाषा और साहित्य को छोड़कर विज्ञान अथवा मानविकी या सामाजिक विज्ञान की उच्चशिक्षा हिंदी में प्राप्त करना अभी भी कठिन है. उच्च स्तरीय सन्दर्भ ग्रंथों का अभाव है. जो भी उच्च स्तरीय लेखक हैं सभी अंग्रेजी पसंद करते हैं क्योंकि शोध सन्दर्भ अंग्रेजी में होने के कारण अंग्रेजी में लिखना सरल लगता है तथा उसे अधिक पाठक मिलते हैं. 

हिन्दी के अखबारों की संख्या और प्रतियां दोनों में बृद्धि होरही है जब  कि दूरदर्शन का प्रवेश  गाँवों  तक हो चुका है. बहुत सारी पत्रिकाएं और उपन्यास लिखे जा रहे हैं और बिक रहें हैं. हिन्दी के जाने माने आधुनिक साहित्यकारों की रचनाएँ सस्ते कागज़ पर अच्छी छपाई में अभी भी अनुपलब्ध हैं. जो उपलब्ध हैं वे पढ़े जा रहे हैं. क्या यह स्थिति आयेगी कि हम कह सकेंगे कि अपनी हिन्दी सुधारनी है तो आपको "अमुक " अखबार को नियमित पढ़ना चाहिए. 

हिन्दी भाषी क्षेत्रों के विद्यार्थी वर्तनी दोष बाहुल्य हिन्दी लिखते हैं. हिन्दी से बिंदी गायब है. ऐसे में क्या क्या बदलना है. क्या क्या बदल जायगा कुछ कहा नहीं जासकता है. संवाद तो हो जा रहा है किन्तु उस संवाद में हम मर्म तक पहुँच पा रहे हैं या नहीं कहा नहीं जा सकता. इसलिए समरूपता जरूरी है अर्थात व्याकरण पर ध्यान रखना चाहिए. सभी समाचार पत्र हिंदी के सुधार हेतु भी थोड़ा स्थान देना शुरू करें तो हिन्दी के सरलीकरण और हिन्दी के विकास में बहुत सहयोग मिलेगा. और अच्छी हिन्दी का विकास होगा. 

इस समय हिंगलिश का बोलबाला है. हिन्दी समाचार वाचक तथा दूरदर्शन के समाचार प्रसारक और संवाददाता हिंगलिश के प्रयोग पर पूरा जोर दे रहे हैं. वे लोग जिस प्रकार की हिन्दी चाहेंगे, हिन्दी उधर जाने को मजबूर है. विज्ञापनों में हिंगलिश का प्रयोग धुंआधार हो रहा है उनकी प्राथिमिक उद्देश्य अपने उत्पाद को बेंचना है, हिन्दी अगर बिगड़े तो बिगड़े. हिन्दी फिल्म और दूरदर्शन के प्रसारणों में हिन्दी को बिगाड़ने का काम खूब तेजी से हो रहा है आंचलिक बोलियों का तड़का लगाया जा रहा है. अधिक तड़के वाली दाल नियमित खाने से  स्वास्थ्य बिगड़ ही जाता है, हिन्दी की हालत ऎसी ही हो गयी है. 

व्यापार जगत को अंग्रेजी में नाम रखने का चस्का है. पहले हिन्दी फिल्मों में कलाकार नामावली अंग्रेजी में ही होती थी धीरे धीरे हिंदी का प्रचालन हुआ अब भी हिन्दी भाषी क्षेत्रो में भी अंग्रेजी के पोस्टर चिपकाये जाते हैं. उपभोक्ता सामग्रियों के नाम बड़े बड़े अंग्रेजी के अक्षरों में लिखे जाते हैं. उन्हें हिन्दी नहीं भाती है. एलोपैथी अंग्रेजी और होमियोपैथी दवा के डाक्टर /चिकित्सक अंग्रेजी में ही अपना नुस्खा लिखते हैं जिसे पढ़ना अति कठिन होता है. अब कुछ कम्पनियां हिंदी के छोटे छोटे अक्षरों में हिंदी में नाम लिख रहीं हैं. चिकित्सक और दवा निर्माता वास्तव में जनता को दवा निरक्षर रखना चाहते हैं. आप यदी केवल हिन्दी जानते हैं तो इस क्षेत्र में निरक्षर ही हैं . यहाँ हिन्दी बदलेगी या भारत को बदलना पडेगा. 

जब टंकण यन्त्र आया तो हिन्दी के अनुसार उसे अनुकूलित करने का जो भी प्रयास हुआ. वह हिन्दी के अधिक यन्त्र के साथ अनुकूलित हुआ. किसी तरह से धीरे धीरे टंकण यन्त्र चला तब तक संगणक जी अर्थात कंप्यूटर महाराज का आगमन हुआ,  कहते हैं की इस क्षेत्र में भारत सबसे आगे है किन्तु क्या अभी तक  हिन्दी में किसी कंप्यूटर  भाषा का विकास हुआ है शायद नहीं. अभी इस आलेख को मैं गूगल ट्रांसलिटरेशन की कृपा से लिख रहा हूँ. इसमें कितनी बाधाएं हैं सभी उपयोगकर्ता जानते हैं. रेमिंगटन को नेट स्वीकार नहीं करता है. इनस्क्रिप्ट नाम तो  टेढा है ही काम भी टेढ़ा है. अगर आप बिलकुल अंग्रेजी नही जानते तो शायद कंप्यूटर का उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसलिए थोड़ी सी अंग्रेजी पढ़ा करें. 

   

2 comments:

  1. " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" की तरफ से आप को तथा आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामना. यहाँ भी आयें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो फालोवर अवश्य बने .साथ ही अपने सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ . हमारा पता है ... www.upkhabar.in

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