नमस्कार!
दैनिक समाचार पत्र "हिन्दुस्तान" ने दो टूक कहा है की जनता को सेवायें प्राप्त करने के लिए व्यय करना चाहिए. वास्तव में सरकार जो भी व्यय कर रही है जनता ही देतीहै प्रत्यक्ष कर के रूप में अप्रत्यक्ष कर के रूप में. केन्द्रीय कर के रूप में प्रांतीय कर के रूप में और तमाम ढंग हैं कर वसूली के. तमाम तरह के कर देने पर भी जनता को सुविधा देने की बात आती है तो तरह तरह के बहाने बनाए जाते हैं. कर के रूप में बटोरी गई धन राशि को बेदर्दी से बरबाद किया जा रहा है. एक बरबादी का उदाहरण कामनवेल्थ खेल भी है जो हमारी गुलामी का ढिंढोरा पीटता है तथा राजतन्त्र का प्रचार करते है.
कर उगाही का अधिकार मात्र केंद्र को होना चाहिए तथा सभी नागरिक सेवा संस्थाओं को उसका अंश मिलना चाहिए जिससे की हर नागरिक को एक समान सुविधा प्राप्त हो सके. आज की स्थिति में तमाम कर बिचौलिए खा जाते हैं. वैट के नाम जितना कर जनता की जेब से जाता है उसका कितना अंश सरकारी कोष में पहुंचता है इसका न कोई हिसाब है न चर्चा. निश्चय ही जनता का बहुत सारा पैसा जनता की जेब से कर के नाम पर ले लिया जाता है किन्तु वह सरकारी कोष में नहीं पहुचता है. इतना सारा धन कर के रूप में देने के बाद शिक्षा, चिकित्सा एवं सड़क जलनिकास पानी के नाम पर कार्यदायी संस्थाएं धन का रोना रोती हैं. सभी जानते हैं इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार समाप्त हो जाय तो दशा कितनी सुधर सकती है. कुछ लोग कह सकते हैं कि निःशुल्क सुविधा होने पर दुरुपयोग होगा. किन्तु सभी जानते हैं की बिजली पानी के मीटर कैसे चलते हैं और रुकते हैं. बकायेदारों में भी कौन होते हैं उसका खुलासा होप्ता ही रहता है.
इन सस्थाओं के पास जब शिकायत की जाती है तो ये जनता के कर्तव्य की बात करने लगतीं हैं. किन्तु जनता को वह सब कुछ नही मिल पा रहा है जितना कर के रूप में दे रही है. कुछ लोगों को भ्रम है की कुछ ही करदाता हैं. किन्तु वास्तव में गर्भस्थ शिशु के लिए खरीदी जाने वाली दवा में से भी कर ले लिया जाता है. कर लेने के लिए तो सबके दायरे तय हैं किन्तु सुविधा के नाम पर सभी एक दूसरे को दिखाने लगते हैं. तब हम देश के नही किसी गाँव या शहर के नागरिक हो जाते हैं.