नमस्कार!
हालचाल ठीक है न!
लोकपाल बिल के लिए सरकार ने सर्वदलीय बैठक किया.बैठक के प्रस्ताव से स्पष्ट हो गया कि दलीय लोकतंत्र में दलगत स्वार्थ प्रमुख है.
अन्ना हजारे की टीमने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल की अपील की थी किन्तु निराशा हाथ लगाने पर अन्ना ने आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया. जन सहयोग देखकर सरकार ने एक समिति बना दी. सत्ता पक्ष ने लचर बिल से प्रारम्भ किया, उनकी सोच यह थी कि अन्ना टीम की कुछ बातें मानकर एक बिल सामने ला दिया जायगा. और काम बन जायगा. अन्ना टीम के न मानने पर लोकपाल बिल के दो प्रारूप सामने आगये. सरकार को दलों का रुख देखकर लगा कि वेलोग भी वही सोच रहे हाँ जो कांग्रेस सोच रही है तो उन्हें भी बुला लिया जाय. और सर्वदलीय बैठक हो गयी.
स्पष्ट है कि सभी दलों को दोनों प्रारूपों का ज्ञान था. अन्ना हजारे ने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल के प्रारूप को समझा भी दिया था किन्तु बैठक निर्णय अति असंतोषजनक था. जनता के सामने दल कुछ कहते हैं और बैठक में कुछ. अपनी छवि बनाने के लिए सभी सशक्त लोकपाल का नारा लगा रहे हैं किन्तु अवसर आने पर तकनीकी बहाने बना रहे हैं. यह सक्रिय राजनीति नहीं है. सभी जानते हैं कि आगामी सत्र में बिल स्थाई समिति और मंत्रिमंडल से होता हुआ संसद में आएगा.
यदि हमारे राजनैतिक दल सक्रिय होते तो बिल के प्रावधानों पर स्पष्ट रूप से बात करते और बिल को सशक्त बनाने के लिए अपनी स्पष्ट राय दिए होते. अब नेता गण अलग बयानों में तरह तरह की बात कर रहे हैं.
कमजोर लोकपाल बनाने के लिए संविधान की दुहाई दी जा रही है यदि किसी धारा के कारण संविधान संबंधी समस्या है तो सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले लेनी चाहिए. इस समय तक जो भी विचार आरहे हैं उससे लगता है कि संविधान का उलंघन नही होरहा है. लोगों में मतभेद है.
सर्वदलीय बैठक से यह भी लग रहा है कि दलों को कोई लोकपाल बिल पास कराने की कोई जल्दी नही है.
हालचाल ठीक है न!
लोकपाल बिल के लिए सरकार ने सर्वदलीय बैठक किया.बैठक के प्रस्ताव से स्पष्ट हो गया कि दलीय लोकतंत्र में दलगत स्वार्थ प्रमुख है.
अन्ना हजारे की टीमने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल की अपील की थी किन्तु निराशा हाथ लगाने पर अन्ना ने आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया. जन सहयोग देखकर सरकार ने एक समिति बना दी. सत्ता पक्ष ने लचर बिल से प्रारम्भ किया, उनकी सोच यह थी कि अन्ना टीम की कुछ बातें मानकर एक बिल सामने ला दिया जायगा. और काम बन जायगा. अन्ना टीम के न मानने पर लोकपाल बिल के दो प्रारूप सामने आगये. सरकार को दलों का रुख देखकर लगा कि वेलोग भी वही सोच रहे हाँ जो कांग्रेस सोच रही है तो उन्हें भी बुला लिया जाय. और सर्वदलीय बैठक हो गयी.
स्पष्ट है कि सभी दलों को दोनों प्रारूपों का ज्ञान था. अन्ना हजारे ने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल के प्रारूप को समझा भी दिया था किन्तु बैठक निर्णय अति असंतोषजनक था. जनता के सामने दल कुछ कहते हैं और बैठक में कुछ. अपनी छवि बनाने के लिए सभी सशक्त लोकपाल का नारा लगा रहे हैं किन्तु अवसर आने पर तकनीकी बहाने बना रहे हैं. यह सक्रिय राजनीति नहीं है. सभी जानते हैं कि आगामी सत्र में बिल स्थाई समिति और मंत्रिमंडल से होता हुआ संसद में आएगा.
यदि हमारे राजनैतिक दल सक्रिय होते तो बिल के प्रावधानों पर स्पष्ट रूप से बात करते और बिल को सशक्त बनाने के लिए अपनी स्पष्ट राय दिए होते. अब नेता गण अलग बयानों में तरह तरह की बात कर रहे हैं.
कमजोर लोकपाल बनाने के लिए संविधान की दुहाई दी जा रही है यदि किसी धारा के कारण संविधान संबंधी समस्या है तो सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले लेनी चाहिए. इस समय तक जो भी विचार आरहे हैं उससे लगता है कि संविधान का उलंघन नही होरहा है. लोगों में मतभेद है.
सर्वदलीय बैठक से यह भी लग रहा है कि दलों को कोई लोकपाल बिल पास कराने की कोई जल्दी नही है.