Friday, November 4, 2011

विश्वविद्यालय की परीक्षा

नमस्कार !

क्या हालचाल है?

अभी थोड़ी देर पहले रवीश जी के ब्लॉग पर ( http://naisadak.blogspot.com/ ) दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू सेमेस्टर सिस्टम को भारत के लिए बेकार बताया गया है. इसपर पहले मैं अपना अनुभव बताता हूँ - मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में १९७०-१९७२ तक विज्ञान वर्ग में स्नातक की परीक्षा सेमेस्टर प्रणाली से दिया हूँ. इस प्रणाली में  प्रत्येक विषय के एक प्रश्नपत्र की पढ़ाई तथा उसकी परीक्षा होती है. पहले सेमेस्टरकी परीक्षा दिसंबर में होनी थी अधिकाधिक छात्र परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे थे उसी समय कुछ छात्र जाड़े के नाम पर परीक्षा स्थगित कराने के अभियान  पर निकल गए और कहने लगे कि जनतांत्रिक अधिकार है परीक्षा टाली जाय. विज्ञान संकाय के डीन के पास छात्रावास के छात्र गए और परीक्षा टलवा दिए . हमलोग भी खुश हो गए कि चलो परीक्षा से गला छूटा. दूसरे सेमेस्टर की पढाई शुरू हो गई . यहाँ पर एक बात और उल्लेखनीय है कि प्रैक्टिकल की परीक्षा न होकर प्रतिदिन मूल्यांकन प्रणाली लागू थी.

जब दूसरे सेमेस्टर के परीक्षा की बारी आयी तो परीक्षा टलवाऊ समूह फिर सक्रिय हो गया और एक प्रश्नपत्र का बहिष्कार करा दिया. इसबार प्रशासन कठोर निर्णय पर उतारू हो गया और परीक्षा नही टली. वहाँ पर जो सेमेस्टर प्रणाली थी उसमे अगले सेमेस्टर  में पढ़ने और परीक्षा देने में कोई बाधा नही थी इसलिए सभी लोग एक प्रश्नपत्र में अनुपस्थित होने पर भी अगले सेमेस्टर में चले गए. परिणाम यह हुआ कि हमलोगों को एक प्रश्नपत्र के स्थान पर दो प्रश्नपत्रों को एक साथ तैयार करना पड़ा. बाद में पता चला कि परीक्षा टलवाउ नेता को अगले वर्ष छात्रसंघ का चुनाव लड़ना था. इसके लिए उन्होंने सबके कैरियर को दांव पर लगा दिया था.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में १९७४ के जेपी आन्दोलन के बाद सत्र अनियमित हो गए और आज तक नियमित नहीं हो पाए हैं. यहाँ पर विधि संकाय में सेमेस्टर प्रणाली है किन्तु यहाँ की सेमेस्टर प्रणाली में प्रतिवर्ष आगणन पद्धति  है अर्थात विधि प्रथम वर्ष पास किये बिना द्वितीय वर्ष में नहीं जा सकते. सेमेस्टर प्रणाली के होते हुए भी आज तक  विधि का सत्र भी नियमित नहीं है.

जब मैं लिख रहा हूँ कि गोरखपुर विश्वविद्यालय का सत्र नियमित नहीं है तो यह सुनकर बहुत सारे लोग नाराज हो सकते हैं. किन्तु यह वास्तविकता है कि यहाँ के परीक्षा परिणाम ४५ दिन में नहीं निकल पाते हैं. पहले तो दोष छात्रसंघों  का भी था किन्तु अब तो केवल विश्वविद्यालय प्रशासन ही जिम्मेदार है.

इस परिप्रेक्ष्य यह भी कहना समीचीन होगा कि पचहत्तर दिन के ग्रीश्मावाकास, पैंतालीस कार्य दिवसों की परीक्षा और असीमित अवकाशों और शोक अवकाशों के होते हुए एक सौ अस्सी पढाई के कार्य दिवस कैसे पूरे हो सकते हैं.
ऎसी स्थिति में पढाई की गुणवत्ता केवल इंफ्रास्ट्रचर से ही नहीं निर्धारित की जा सकती है.

यहाँ पर यहभी कहना समीचीन होगा कि शिक्षक संघों को शिक्षा की गुणवता और पाठ्यक्रम की सार्थकता पर भी ध्यान देना होगा नहीं तो परम्परागत विश्वविद्यालयों का अंत सुनिश्चित है.