Sunday, December 29, 2013

वर्ग और संघर्ष

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आआप की सरकार के शपथग्रहण कालीन  स्वतःस्फूर्त भीड के चलते आज फेसबुक पर साम्यवादी, वामपंथी, बहुजनवादी, अम्बेडकरवादी,कांग्रेसी, समाजवादी और भाजपाई मित्र अपने अपने विचार की कसौटी पर कस रहे हैं. अपने से सहानुभूति रखनेवालों को सचेत कर रहे हैं.
भारत में अधिकाधिक लोग किसी दल के सदस्य नहीं हैं, उन्हें एक अच्छी साफसुथरी सरकार चाहिये. मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं. मुझे प्रतियोगिता की अपेक्षा  सहकारिता अच्छी लगती है, व्यक्तिनिष्ठता की अपेक्षा वस्तुनिष्ठता अच्छी लगती है. गांधी व  विनोबा का त्याग और समाजसेवा आकर्षित करता है.
मुझे अम्बेडकर अच्छे तो लगते हैं लेकिन एकांगी लगते हैं. मुझे मार्क्स भी आकर्षित करते हैं किन्तु बन्दूक की गोली अच्छी नहीं लगती. इस प्रकार राजनैतिक दृष्टि से एक भ्रमित व्यक्ति. इस तरह का भ्रम केवल मेरा नहीं है. बहुतों का है. यही सोचकर मैं अपनी बात आपसभी के समक्ष रख रहा हूं कि मुझे अपनेभ्रम को दूर करने के लिये कुछ सुझाव प्राप्त होगा.
जनता को दो आर्थिक वर्गों में बांटकर उनमें संघर्ष की बात की जाती है. क्या आर्थिक आधार पर दो भाग का विभाजन हो  तो सकता है आप कह सकते हैं कि भूस्वामी और भूमिहीन. क्या सभी भूस्वामी समान भूमि रखते हैं ? नहीं. फुट्पाथ से लेकर महल तक फैली हुई आवासीय सम्पत्ति को क्या दो ही वर्ग में बांटा जायेगा?
उदाहरण दिया जाता है कि रात और दिन. सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन और बाकी रात, कितु प्रकाश की मात्रा और गर्मी एक सातत्य पर मिलेगा. शून्य आय से लेकर सर्वाधिक आय के बीच एक सातत्य है.
पूंजीवाद में कहा जाता है कि मजदूरी मारकर ही धन कमाया जाता है. हर उत्पाद का उपभोक्ता भी तो ठगा जाता है. पूंजीवाद प्राथमिक उत्पादक, मजदूर, धन लगाने वाले शेयरहोल्डर और उपभोक्ता सभी शोषित की श्रेणी में हैं.
देश की सभी सम्पदा पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व हो जाय. उत्पादन के साधन सरकार के पास हो जाय यह सब ठीक लगता है किन्तु सत्ता एक व्यक्ति में सीमित हो जाय तो ठीक नहीं लगता. कोई भी दल या व्यक्ति सर्वोच्च हो जाने पर नियंत्रण से बाहर हो जाता है.
भारत के संसद्वादी वामपंथी दल और अन्य वामपंथी दलों को वामपंथी विचारक एक साथ लाने में विफल हैं. सर्वोच्च आसन पर जाने और उसपर बने रहने की अदम्य लालसा सबमें एक समान दिखाई दे रही है. यही सबसे बडी बाधा है.
नमस्कार.