Saturday, December 23, 2017

तिहवार के खुशी

नमस्कार,

हालचाल ठीक बा. बड़ा दिन आवता।  इस्कूलन में छुट्टी हो गईल. बड़ा दिन की बाद सन २०१८ आई. बड़का दिन अंग्रेजी स्कूलन में धूम धाम मनावल जाला. जबसे टीवी नामके टीबी देश में आ गईल तबसे बड़का दिन आ नवका साल सभे मनावे लागल। डायरी, कलेण्डर आ बहुत कुल उपहार बटाईल शुरू हो गईल बा.

केक, पेस्ट्री, चॉकलेट की दिन में गुड़, महिया, राब, पट्टी, लाई के के पूछी. १४ जनवरी के खिचड़ी नाम के तिहवार पड़ेला ओहि दिन के व्यंजन खिचड़ी, लाई, दही, अचार,घी, पापड़ ह. गवई ज़माना में लाई खिचड़ी से बहुत पहिले ही बने लगत रहल ह. बड़की बड़की लाई बान्हल भी कला रहल आ ओके खाइल भी. लेकिन जब हम दुमहला तिमहला बरगर लोगन के खात देखलीं त लाई के आकार की बारे में सोचल बंद क दिहनी।

गाँव से जब शहर/ कस्बा में रहे मोका मिलल त रेवड़ी आ गजक से परिचय भईल. तिल के लाई खाये के आ छूएके (दान) खिचड़ी के जरूरी काम रहे. देहात में लोग माघ में काला तिल ना कीनेला ऐसे माघ की पहिले ही तिल कीन लिहल जात रहल. धीरे धीरे लाई गायब होखे लागल आ रेवड़ी गजक आ भाँति भांति  के डिब्बा बंद लाई गजक मिले लागल।

 खिचड़ी के डिब्बा बंद  नवका सामान में विविघता त बा बाकी बुझाला की सोंधाई आ स्वाद दुनू गड़बड़ा गईल बा. चाउर, चिउरा, चना, मकई, साँवा, कोदो, उजरका तिल, करिका तिल आदि के लाई सब केक पेस्ट्री के कान काटे वाला लागत बा. लाई की पाग में अदरक आ तिल परि  जाई आ पाग ठीक उतरि जाई त सवाद बनि जाई।  हर घर के लाई सवाद भी अलग अलग रहत रहल.

जाड़ा से डर छोड़ी के लोग माघ भरि स्नान दान करेला। त मन भर केक खाई सभे, नवका साल मनाई सभे, लाई बनाई, गजक खाई, घीव खिच्चड़ खाई सभे, उत्सव मनाई खुश रहीं , ख़ुशी बाटीं ,खिचड़ी बाटीं, लाई बाँटीं आ पार लागे त माघ भर नहा के दान देई।

बड़का दिन, नवका साल आ खिचड़ी की सन्ति शुभकामना.

पढ़ले खातिर धन्यवाद.

फेरू भेंट होई।