Saturday, March 26, 2011

सड़क पर सहायता.

नमस्कार!

आज सबेरे सबेरे महाविद्यालय जा रहा था . सड़क के किनारे सहजन के पत्र विहीन पेंड को देख कर उसके छायाचित्र के लिए मुड़ गया. फोटो लेकर मुख्य मार्ग से ज्यौहीं आगे बढ़ा, साईकिल का चेन उतर गया. साईकिल से उतर कर एक किनारे होकर चेन को ठीक करने का प्रयास प्रारम्भ किया . एक छोटा लड़का जो स्कूल बस की प्रतीक्षा  कर रहा था धीरे से मेरे पास आकर मदद कर चेन ठीक कर दिया. चेन लगाने के बाद उसने अपने हाथ की और देखा हाथ में कालिख नहीं लग पाई थी. कई दिनों से मैं सोच रहा था कि चेन में ग्रीस लगवा लेना चाहिए किन्तु यह विचार परिणाम तक नहीं पहुँच पाया. आज मैं खुश हुआ कि चलो ग्रीस न लगवाने के कारण उस लड़के के हाथ में कालिख नही लग पाई. मैं उस लड़के को धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया और सोचने लगा उस लड़के ने मेरी मदद की अपेक्षा के बिना भी मदद के लिए आगे क्यों आया? मैं तो सड़क के बाईं   पटरी से दाईं  ओर इसलिए चला गया था कि वहां  थोड़ी  अधिक जगह थी. उधर जाने से वह लड़का यह समझ बैठा कि मुझे उसकी मदद चाहिए, या मेरी उम्र को देखकर उसे लगा कि मदद कर देनी चाहिए. या उस लडके को मदद करना अच्छा लगता है. या अभी यह शहर अभी उतना मतलबी नहीं हो पाया है ओर उसकी संवेदनशीलता अभी बची हुई है.    

यह सब सोच ही रहा था कि मेरे मानस में संदीप मिश्र के दुर्घटना का विवरण घूमने लगा. तब भी मेरे मन में यह बात आई थी कि इसे मैं अपने ब्लॉग पर लिखूँगा. यद्यपि मेरा ब्लॉग अभी  पठनीय भी नहीं हुआ है न ही इसके पढ़ने वाले हैं.

संदीप मिश्रा अपनी मोटरसाइकिल से नैनी में अपने सहकर्मी के साथ कहीं जा रहे थे. बीच शहर में उनकी मोटर साइकिल  दुर्घटनाग्रस्त हो गई. वो ओर उनका सहकर्मी दोनों घायल होकर गिर गए. मिश्र के घुटने के ऊपर तथा नीचे की दोनों हड्डियां टूट चुकी थी वे उठाने में असमर्थ थे लेकिन होश में थे. उन्होंने सहायता की गुहार लगानी शुरू की किन्तु कोई भी उनकी ओर नहीं आ रहा था. उन्होंने मार्मिक रूप से भी सहायता की अपील शुरू की. कहना शुरू किया कि मेरे बच्चे अनाथ हो जायेंगे, मेरी जान बचा लीजिये भाई साहब, लेकिन कोई वाहन वाला मदद के लिए नहीं रुका.  किसी भी व्यक्ति ने सौ  नंबर पर भी फोन नहीं किया. जब वे निराश होने लगे तब जाकर एक पदयात्री इनकी मदद के लिए आया. उसने इन लोगों से कहा कि आप में से कोई मोटर साईकिल चला सकता है  इनके सहकर्मी के हाँ कहने पर उस व्यक्ति ने संदीप को टांगकर उठाया ओर मोटरसाइकिल पर बैठा कर पास के अस्पताल में पहुंचाया.

आखिर संदीप को सहायता क्यों नहीं मिल पा रही थी, शायद दुर्घटना और खून देखकर चाहते हुए भी कोई आगे नहीं आ पा रहा था. शायद सामने वाला सोचता होगा कि यदि रास्ते ही मर मरा गया तो पुलिस का चक्कर चल जाएगा. सामान्य व्यक्ति पुलिस से दूर ही रहना चाहता है. लोग तमाम किस्से बताने लगते हैं कि कब पुलिस ने सहयोग करने पर कितना चक्कर लगाना पड़ा. एक उदाहरण तो ऐसा भी आया जिसमें सहायक व्यक्ति पर क़त्ल  का इल्जाम लगा तथा लगभग बीस वर्षों के बाद मुक्ति मिल पाई. 

क्या हमारा सभ्य समाज पुलिस से भय मुक्त होकर सहायता करने में आगे बढ़ सकेगा?
   

Friday, March 25, 2011

महंगाई भत्ता पर सम्पादकीय

नमस्कार! 
कोई दैनिक अखबार किसी आम बात पर सम्पादकीय लिखे तो वह जरूर कोई ख़ास बात है.भारत सरकार के सरकारी कर्मचारियों को हर एक जुलाई और एक जनवरी को पिछले छः माह में बढे थोक सूचकांक के आधार पर महंगाई भत्ते की एक किश्त देय हो जाती है. सरकारी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों और सरकारी बैंकों के कर्मचारियों को यह राहत हर तीसरे महीने ही प्राप्त हो जाती है. प्रत्येक दस वर्षों पर वेतन आयोग गठित होता है तथा प्रायः दस वर्षों में बढी हुई मंहगाई के आधार पर वेतन मान निर्धारित होते हैं. 

यह प्रक्रिया सरकार को करनी होती है किन्तु सरकार इसे नियोजित ढंग से कभी नहीं करती तथा यह एक वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया न होकर एक राजनैतिक प्रक्रिया बन गई है तथा महंगाई को बढाने में खूब योगदान करती है. प्रांतीय सरकारे तथा मीडिया इसे ऎसी घटना के रूप में प्रकाशित करते हैं जैसे कोई नई घटना हो रही है. सरकार्रें पिछले आयोग के सुझावों को जबतक लागू कर पाती है तब तक नए आयोग के गठन का समय आ जाता है. कर्मचारी संघों की मांग शरू हो जाती तब आयोग  गठित होता है आयोग की सिफारिशें आते आते इतना देर हो जाता है की बकाया वेतन भुगतान की नौबत आ जाती है. इस प्रकार एरियर  भुगतान और नई आर्थिक समस्या निरंतर जारी रहती है.

अगले वेतनं आयोग के सुझाव एक जनवरी २०१६ से लागू हो जाने चाहिए. यदि हमारी सरकार २०१४ में ही सातवाँ आयोग बना दे तथा अक्टूबर २०१५ तक सुझाव आ जाय तो एक जनवरी २०१६ से नए वेतन मान में भुगतान होने लगेगा तब  किसी एरियन के भुगतान की समस्या भी नहीं आयेगी. इसी प्रकार सरकारें प्रत्येक १५जनवरी तथा १५ जुलाई को  महंगाई  भत्ते की घोषणा कर दे तो वेतन के एरियर की समस्या समाप्त हो जायगी. 

ऎसी स्थिति में सम्पादक महोदय की टिप्पणी असंगत प्रतीत होती है. अब दूसरी बात पर आते हैं. कर्मचारियों के काम काज के सुधार की बात. सबसे पहले हमारे माननीय सांसद जो सरकार से वेतन और भत्ता तो पाते हैं किन्तु संसद में उनकी उपस्थिति पर कुछ लिखना आवश्यक नहीं हैं सभी जानते हैं. यही हाल माननीय मंत्रियों का है. ये लोग जब तक अपनी कार्य संस्कृति में सुधार नहीं लायेगे तबतक कर्मचारी कैसे सुधरेंगे. http://epaper.hindustandainik.com/PUBLICATIONS/HT/HT/2011/03/23/ArticleHtmls/I%C2%B8F%C3%8A%C2%A8FFdS%C2%B9F%C3%BB%C3%94-I%C3%BB-SFW%C2%B0F-23032011012001.shtml?Mode=1  

Wednesday, March 9, 2011

आरक्षण

नमस्कार!

आरक्षण आन्दोलन चल रहा है. नौकरियों में जातिगत आरक्षण. विधायिका में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पहले से ही आरक्षण उपलब्ध है. शिक्षा में भी आरक्षण उपलब्ध है.पंचायती राज में भी आरक्षण उपलब्ध है. कुछ दिनों पहले राजस्थान और अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा इसकी चपेट में है. 

एक ओर हम जाति को मनुवादी/ब्राह्मणवादी व्यवस्था की देन कहते हैं. दूसरी ओर जातिवाद चलाकर मत प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं. जाति आधारित आरक्षण के लिए जाति इकाई है. ऎसी स्थिति में हरएक जाति की औसत आय की वास्तविक गणना जरूरी है. जिसकी जानकारी करना लगभग असंभव है. जो लोग नौकरी करते हैं उनकी आय आप जान सकते हैं. लेकिन जिन नौकरिओं में ऊपर की आमदनी है उसे कैसे जानेंगे. जिनके पास जमीन है उसे आप जन सकते हैं. इसके बाद तमाम व्यवसाय हैं जिनकी आमदनी जानना आज के दिन असंभव है.  ऎसी स्थिति में उपलब्ध सूचना को सही मानकर काम चलाना मजबूरी है. १९३५ के बाद जनगणना में जाति का उल्लेख नही हो रहा है किन्तु जाति आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है. मतदाता सूची में जाति का उल्लेख नहीं किया जा रहा है. 

जातिगत आरक्षण के लिए जातिवार सदस्यों की गणना और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी अति आवश्यक है. उसके बाद एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंड की घोषणा करके प्रत्येक जाति की स्थिति को सार्वजनिक करते हुए आरक्षण होना चाहिए जिससे प्रायः आरक्षण की मांग से बचा जा सके. हाईस्कूल और उसके समकक्ष पाठ्यक्रमों में इस पूरी नीति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए जिससे हर छात्र इस सम्बन्ध में जानकारी पा सके. हर एक जाति के समस्त लोगों केलिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए. इसके लिए हमें पूरे आरक्षण के कोटा को पुनः निर्धारित करना पडेगा. 

तमाम अलग अलग वर्गों के लिए अलग अलग आयोग गठित किये गए. लेकिन आवश्यकता एक ऐसे आयोग की है जो यह बता सके कि  हमकों सा कदम उठाये जिससे समता की स्थिति आ सके. कुछ वर्षों पूर्व तक उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु आरक्षित वर्ग से आवेदन ही नहीं प्राप्त होते थे. जो लोग आज की तिथि में विभिन्न सेवा संस्थाओं में आरक्षित वर्ग की संख्या  कम दिखाई दे रही है उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आवेदक कितने थे. 

कुछ वर्षों पूर्व विधि की पढाई करने वाली छात्राओं की अत्यंत कमी थी आज स्थिति बदल गयी है. यह मैं उदाहरण के लिए कह रहा हूँ. आज की तिथि में छोटे कस्बों की छात्राए भी उन तमाम क्षेत्रों में पढाई  कर रहीं हैं जिनमे उनकी संख्या नगण्य थी . इसी प्रकार आरक्षित वर्ग के तमाम छात्र जो वास्तव में पढ़ना और आगे बढ़ना चाहते हैं पढ़ रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं. 

भारत में आरक्षण से अधिक आधिक आवश्यक है समुचित शिक्षा की व्यवस्था. अनिवार्य शिक्षा अधिनियम  ठीक से लागू होना चाहिए और जनसँख्या के अनुपात में व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए. जनसंख्या के अनुपात में हर सेवायें प्रदान करनी की व्यवस्था करने पर इस तरह की समस्या अपने आप दूर हो जायगी.  
नमस्कार!

हिन्दी बदलेगी तो चलेगी

नमस्कार!

धीरे धीरे हिन्दी आगे बढ़ रही है. हिन्दी भाषा के साथ तकनीकी संकट खड़ा है. साहित्य में कोई संकट नहीं है बस संकट है तो व्यक्तित्व और अहंकार  का. हिन्दी भाषा और साहित्य को छोड़कर विज्ञान अथवा मानविकी या सामाजिक विज्ञान की उच्चशिक्षा हिंदी में प्राप्त करना अभी भी कठिन है. उच्च स्तरीय सन्दर्भ ग्रंथों का अभाव है. जो भी उच्च स्तरीय लेखक हैं सभी अंग्रेजी पसंद करते हैं क्योंकि शोध सन्दर्भ अंग्रेजी में होने के कारण अंग्रेजी में लिखना सरल लगता है तथा उसे अधिक पाठक मिलते हैं. 

हिन्दी के अखबारों की संख्या और प्रतियां दोनों में बृद्धि होरही है जब  कि दूरदर्शन का प्रवेश  गाँवों  तक हो चुका है. बहुत सारी पत्रिकाएं और उपन्यास लिखे जा रहे हैं और बिक रहें हैं. हिन्दी के जाने माने आधुनिक साहित्यकारों की रचनाएँ सस्ते कागज़ पर अच्छी छपाई में अभी भी अनुपलब्ध हैं. जो उपलब्ध हैं वे पढ़े जा रहे हैं. क्या यह स्थिति आयेगी कि हम कह सकेंगे कि अपनी हिन्दी सुधारनी है तो आपको "अमुक " अखबार को नियमित पढ़ना चाहिए. 

हिन्दी भाषी क्षेत्रों के विद्यार्थी वर्तनी दोष बाहुल्य हिन्दी लिखते हैं. हिन्दी से बिंदी गायब है. ऐसे में क्या क्या बदलना है. क्या क्या बदल जायगा कुछ कहा नहीं जासकता है. संवाद तो हो जा रहा है किन्तु उस संवाद में हम मर्म तक पहुँच पा रहे हैं या नहीं कहा नहीं जा सकता. इसलिए समरूपता जरूरी है अर्थात व्याकरण पर ध्यान रखना चाहिए. सभी समाचार पत्र हिंदी के सुधार हेतु भी थोड़ा स्थान देना शुरू करें तो हिन्दी के सरलीकरण और हिन्दी के विकास में बहुत सहयोग मिलेगा. और अच्छी हिन्दी का विकास होगा. 

इस समय हिंगलिश का बोलबाला है. हिन्दी समाचार वाचक तथा दूरदर्शन के समाचार प्रसारक और संवाददाता हिंगलिश के प्रयोग पर पूरा जोर दे रहे हैं. वे लोग जिस प्रकार की हिन्दी चाहेंगे, हिन्दी उधर जाने को मजबूर है. विज्ञापनों में हिंगलिश का प्रयोग धुंआधार हो रहा है उनकी प्राथिमिक उद्देश्य अपने उत्पाद को बेंचना है, हिन्दी अगर बिगड़े तो बिगड़े. हिन्दी फिल्म और दूरदर्शन के प्रसारणों में हिन्दी को बिगाड़ने का काम खूब तेजी से हो रहा है आंचलिक बोलियों का तड़का लगाया जा रहा है. अधिक तड़के वाली दाल नियमित खाने से  स्वास्थ्य बिगड़ ही जाता है, हिन्दी की हालत ऎसी ही हो गयी है. 

व्यापार जगत को अंग्रेजी में नाम रखने का चस्का है. पहले हिन्दी फिल्मों में कलाकार नामावली अंग्रेजी में ही होती थी धीरे धीरे हिंदी का प्रचालन हुआ अब भी हिन्दी भाषी क्षेत्रो में भी अंग्रेजी के पोस्टर चिपकाये जाते हैं. उपभोक्ता सामग्रियों के नाम बड़े बड़े अंग्रेजी के अक्षरों में लिखे जाते हैं. उन्हें हिन्दी नहीं भाती है. एलोपैथी अंग्रेजी और होमियोपैथी दवा के डाक्टर /चिकित्सक अंग्रेजी में ही अपना नुस्खा लिखते हैं जिसे पढ़ना अति कठिन होता है. अब कुछ कम्पनियां हिंदी के छोटे छोटे अक्षरों में हिंदी में नाम लिख रहीं हैं. चिकित्सक और दवा निर्माता वास्तव में जनता को दवा निरक्षर रखना चाहते हैं. आप यदी केवल हिन्दी जानते हैं तो इस क्षेत्र में निरक्षर ही हैं . यहाँ हिन्दी बदलेगी या भारत को बदलना पडेगा. 

जब टंकण यन्त्र आया तो हिन्दी के अनुसार उसे अनुकूलित करने का जो भी प्रयास हुआ. वह हिन्दी के अधिक यन्त्र के साथ अनुकूलित हुआ. किसी तरह से धीरे धीरे टंकण यन्त्र चला तब तक संगणक जी अर्थात कंप्यूटर महाराज का आगमन हुआ,  कहते हैं की इस क्षेत्र में भारत सबसे आगे है किन्तु क्या अभी तक  हिन्दी में किसी कंप्यूटर  भाषा का विकास हुआ है शायद नहीं. अभी इस आलेख को मैं गूगल ट्रांसलिटरेशन की कृपा से लिख रहा हूँ. इसमें कितनी बाधाएं हैं सभी उपयोगकर्ता जानते हैं. रेमिंगटन को नेट स्वीकार नहीं करता है. इनस्क्रिप्ट नाम तो  टेढा है ही काम भी टेढ़ा है. अगर आप बिलकुल अंग्रेजी नही जानते तो शायद कंप्यूटर का उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसलिए थोड़ी सी अंग्रेजी पढ़ा करें. 

   

Tuesday, March 8, 2011

विश्व महिला दिवस

विश्व महिला दिवस
नमस्कार!
आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है.इसे विश्व महिला दिवस क्यों नहीं कहते हैं? इसकी राजनीति क्या है? विश्व की सभी महिलाओं को सामान अधिकार  मिले समान  प्रतिष्ठा मिले. इसके लिए जो भी संघर्ष कर रहे हैं उन सभी को प्रणाम. भारत के पंचायती राज की व्यवस्था में आरक्षण के सहारे ही सही वे आगे आरहीं हैं . यही राजनैतिक दल अपने संगठन और विधायिका में आरक्षण देने को तैयार नहीं हैं. यहाँ तक की वामपंथी दलों की कार्यकारिणी में में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व आधा नही है. उस दल में भी नही है जो  कहते हैं की जहां नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं. उन दलों में भी नही है जो नारी को दलित मानते हैं.

क्रांतिकारी मीडिया के विज्ञापनों पर कलम वाली तलवार वाले भी कुछ नहीं कहते हैं. माइक बम  वाले भी कुछ नही कहते हैं. मीडिया के सहारे नारी को जिस फैशन की अंधी गली में  धकेलने की कोशिश होरही है. महिलाएं उसे समझें आज के दिन यही कामना है.

कलाके हर विधा के लोग महिलाओं की प्रतिष्ठा बढाने का ही प्रयास करेंगे. आशा की जा सकती है. नेट संसार भी समान अधिकार और प्रतिष्ठा के लिए सतत सचेष्ट रहेगा. साभिवादन.