Sunday, April 10, 2011

अण्णा का अनशन

नमस्कार!
अण्णा हजारे का अनशन समाप्त हो गया. अण्णा सरकार से जो आश्वासन चाहते थे मिल गया. अब परिचर्चा हो रही है. सफलता की असफलता की. अण्णा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक सशक्त लोकपाल की मांग कर रहे  हैं. जिसके लिए विधेयक  बनाने की सशक्त समिति का गठन अण्णा की शर्त के अनुसार होना है. भारत के तमाम राजनैतिक दल इसकी चर्चा तो करते हैं किन्तु कानून ऐसा चाहते हैं जो उनकी मुट्ठी में रहे और उनका कभी भी कोई अहित नहो सके चाहे वे जो करते रहें. कोई सार्थक परिणाम न मिलाने पर अण्णा आमरण अनशन  पर बैठ जाते हैं. उन्हें इतना समर्थन मिलाने लगता है कि सरकार उअनकी शर्तें मान लेती है. वह प्रत्येक व्यक्ति हर्षित हो जाता है जिसने केवल मानसिक समर्थन मात्र दिया है.    

एक नारा लगता है " अभी तो ये अंगड़ाई है आगे बड़ी लड़ाई है." वास्तव में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए ये अंगड़ाई ही है. इस सफलता के कारणों का विश्लेषण हो रहा है. काल, परिस्थिति, व्यक्ति, संसाधन सभी का ऐसा तालमेल हुआ कि यह लड़ाई सफल हो गई. वर्षा, शीत, और गरमी तीनो दृष्टि से उपयुक्त समय, देश विदेश में भ्रष्टाचार विरोधी और लोकतंत्र समर्थक वातावरण, देश में चुनाव की स्थिति. अण्णा जैसा व्यक्तित्व, अरविंद केजरीवाल, किरण वेदी स्वामी अग्निवेश जैसे सहयोगी. देश के प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को छूता हुआ मुद्दा. मीडिया को तो समर्थन करना करना ही था. समर्थन न करने वाले, आलोचना करने वाले इस समय संदेह के घेरे में हैं. अण्णा के अनशन से किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई, उन्हों ने किसी का रास्ता नहीं रोका, सहयोग के लिए भी कोई भारी भूमिका नही बनाई. उनके किये गए कार्यों ने ही उनका प्रचार कर दिया. और वो हो गया. मोबाइल और इंटरनेट ने भी योगदान किया. 

हजारों लोग अनशन करते हैं.किन्तु सफल नही होते इस अनशन में ऐसा क्या था कि चार दिन में ही बात बन गयी. तमाम संभावनाएं इस समय सुर्ख़ियों में हैं. तमाम लोग खुश हैं. कुछ दुखी हैं. कुछ ईर्ष्या से मर रहें हैं. कुछ इसलिए दुखी हैं कि उनके आन्दोलन को ऎसी सफलता क्यों नहीं मिली. किसी को मीडिया की साजिश लगती है. गांधी से मतभेद रखने वाले दुखी हैं की गांधी के  खाते में एक और सफलता जुड़ गई.

चलिए एक आन्दोलन को एक कदम रखने का स्थान मिल गया है. इसके साथ जो हर्षित  हैं उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्हें आग को जलाए रखने का अथक प्रयास करते रहना होगा. यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन है. भारत में भ्रष्टाचार संस्कृति बन चुका है. जिसके  कारण हर व्यक्ति इससे प्रभावित है.कहावत कही जाती है बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए.

   

No comments:

Post a Comment