नमस्कार!
मैं उस भारतीय जनतंत्र का वासी हूँ जिस देश के राजतंत्र में भी जनता की आवाज का महत्व था. कहा जाता है कि एक राजा ने अपनी उस रानी का परित्याग कर दिया था जिसे वह प्राणों से भी अधिक चाहता था. उसी देश के एक कलाकार को देश छोड़कर जाना पड़ता है. उसी देश की जनता को अपनी बात रखने के लिए बोलने की जगह भी नहीं मिलती है. उस देश के विधायक,सांसद अब कहने लगे हैं कि उनके सिवा बोलने वाला कौन है ? उस देश की जनता को अब मानवाधिकार के लिए लड़ना पड़ता है. उसी देश में जनता अपनी बात कहने के लिए जब जुटती है तो उसे आधी रात को खदेड़ दिया जाता है. किन्तु जब वे जनता को जुटाते हैं तो उन्हें सर पर बिठाते हैं. जनता अब राजनैतिक दलों की गुलाम बन कर रह गयी है. जो राजनेता के पक्ष में है उसे छोड़कर बाक़ी सब बेकार हैं .
इस देश की सबसे बड़ी राजसत्ता नेहरू वंश के साथ है. नेहरू की समाजवाद तथा उनके सपनों का भी अंत हो चुका है. एक इमानदार राजीव मार डाले गए. अब नेहरू वंश की सोनिया जी वोट जुटाती हैं तथा कांग्रेसी राज करते हैं और भ्रष्टाचार करते हैं. इस वंश से सीख लेकर तमाम लोगों ने राजनैतिक दल बनाकर अपने को तथा अपनों को राजसिंहासन पर सुशोभित किया है.कुछ ऐसे राजनैतिक दल हैं जो व्यक्तिवादी हैं उनमें कुछ व्यक्ति ही दल हैं वे ही सिद्धांत हैं. वे ही सबकुछ हैं. सारी संगठन की गतिविधियाँ उनकी इशारों पे बनतीं बिगदतीं हैं. इनके दिखाने के दांत और खाने के दांत अलग अलग हैं . धीरे धीरे लोग इनके बारे में भी जानने लगे हैं.
जब भी जनता कुछ जागरूक होने लगती है इनकी परेशानी बढ़ने लगती है. इन जननायकों की इक्छा रहती है कि पच्चीस वर्ष से जिदगी भर सत्तासीन बने रहें. कुछ पिछलग्गू कार्यकर्ता इनके साथ लगे रहें जो पोस्टिंग ट्रांसफर उद्योग में सहयोग करें तथा धनार्जन कास्रोत बने रहें.
अखबारों में भारत के भ्रष्टाचार की खबरें छपा करती हैं. दस प्रतिशत कमीशन कुछ नजराना कुछ शुकराना देना भारत के लोगों को भी भाता है अब जबराना चलने लगा है. इसी बीच स्वामी रामदेव घूम घूम कर जनता को जगाने लगे कि केवल बाहर गया काला धन आ जाय तो भारत का भाग्य बदल जाय. नौजवान पैसा देकर भी नौकरी नहीं पा रहे हैं पैसा डूब जा रहा है. नौकरी करने वाले अपने जीपीय्फ़ से क़र्ज़ भी घूस देकर पा रहे हैं ट्रांसफर तो बहुत पुराना घुसहा रोग है. इसी दौर में अन्ना हजारे एंड कम्पनी लोकपाल बिल संबंधी मांग लेकर कनात प्लेस पर बैठ जाते है. इंटरनेट का सहयोग लेते हैं और उनके समर्थकों की संख्या बढ़ने लगती है. सरकार उनकी बात मान लेती है. किन्तु बात मन में नहीं उतरती है. सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना चाहती ही नहीं है. कुछ समय बाद स्वामी रामदेव का अनशन शुरू होता है सर्कार उनकी बात भी मन लेती है किन्तु मन से नहीं चाहती. क्योंकि कांग्रेसियों की बातों में ही परस्पर मतभेद है. फिर जनतंत्र की धज्जियां उड़ा दी जाती हैं.
भ्रष्टाचार में आगे रहनेवाला यह जनतंत्र शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार के अवसर में काफी पिछड़ा हुआ है. जनतांत्रिक मूल्य तो तब आयेंगे जब कोई राजनैतिक दल वास्तव में जनतांत्रिक मूल्य को स्वीकार कर पायेगा. वैसे तो रामलीला के मैदान में जनतंत्र का मुह काला कर दिया गया है. भ्रष्टाचार और भ्रष्ट दोनों ही खुश हैं.
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