Sunday, October 2, 2011

गांधी और भारत

नमस्कार !

आज २ अक्टूबर २०११ है. मोहनदास करमचंद गांधी, गांधी जी, महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता गांधी या बापू  का जन्म दिन है. गांधी को बचपन में टोपी से जाना. बाद में खादी से जाना. हाईस्कूल में संछिप्त आत्मकथा से जाना.लेकिन मैं  क्या गाँधी को जान पाया ? नहीं. सत्याग्रह, असहयोग और  अनशन की बातें सुनी. राष्ट्रीय सेवा योजना में काम करते समय कुछ लोगों को बताया, सुना उसे  आचार में लाना कठिन है लेकिन प्रयास करता रहा. विशेषकर अहिंसा का मार्ग अच्छा लगता रहा. अब भी अच्छा लगता है. साम्यवाद की भी बहुत सी बातें अच्छी लगतीं हैं. गोली और बंदूक की बात अच्छी नहीं लगती है.

२०११ की कुछ घटनाएँ गाँधीवाद की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्नों की बाढ़ को रोक रहीं है. किन्तु कांग्रेस सरकार जो अपने को गाँधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी मानती है, गांधी को अप्रासंगिक बनाने पर तुली हुई है. कांग्रेस सरकार को सत्य और अहिंसा से कोई सरोकार नहीं है. अगर सरकार अपने को बापू का उत्तराधिकारी मानती है तो उसे भ्रष्टाचार और काले धन का मोह छोडना पड़ेगा.  गाँधी जी भी वकील थे.  चिदंबरम, सिब्बल और सलमान खुर्शीद भी वकील ही हैं. कौन सच्चा वकील है ? राजनीति में सच्चे वकीलों की जरूरत हैं ,ऐसे वकीलों की जो न्याय की रक्षा कर सकें न कि धन कमाने के लिए वकालत करें.

अन्ना हजारे के आंदोलन ने भारत में गाँधी को पुनः प्रासंगिक बना दिया है. पूरे भारत में एक आंदोलन बिना किसी राजनैतिक दल के सक्रिय सहयोग के अहिंसा के साथ बारह दिनों तक चलता रहा. गांधी टोपी जो गाली बन गयी थी अन्ना और अहिंसा तथा निष्ठा के स्पर्श से पुनः पूज्य हो गयी.

गाँधी का पुनर्जन्म हो चुका है. बचपन में कुपोषण से लेकर महामारियों तक का भारी खतरा होता है. भारत में तो यह खतरा  कई गुना होता है. कांग्रेस से ही नए गाँधीवाद को भारी खतरा है. टोपी के साथ तिरंगा भी जनप्रिय हो गया है. भारत में राष्ट्रवाद भी बढ़ा है. आइये कामना करें कि सत्य और अहिंसा में हम सबसे आगे हों. समानता और बंधुता में आगे हों. समता और न्याय में आगे हों.

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