Sunday, March 23, 2014

२३ मार्च २०१४

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन है. छुट्टी का दिन है. आज शहीद दिवस  है, देश दुनिया और आदमी की हालत  पर सोचने का दिन है. साल भर में आदमी को एक बार तो सोचना ही चाहिये कि आदमी को कैसे जीना चाहिये और वह कैसे जी रहा है. राजा भी आदमी है, दरबारी भी आदमी. रंक भी आदमी भिखारी भी आदमी. अपने हिस्से की आजादी लेते लेते आदमी दूसरे की आजादी छीन लेता है. एक वक्त की रोटी खाने के बाद पीढियों तक राज करने का सपना आने लगता है
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२३ मार्च को कुछ लोग शहीदों की कुर्बानी को याद करने की कोशिश करते हैं. कुछ कर्मकांड भी होते हैं. बहुत से लोग इसी बात से डरने लगते हैं. हर छोटा या बडा बास भगत सिंह के नाम से घबराने लगता है. राजदल तो घबराहट में उन्हें ब्रह्म जैसे पूजते हैं. भारत इस वर्ष अपने सांसदों नहीं प्रधानमंत्री का चुनाव करने जा रहा है. या कहें कुछ लोग अपने में से किसी एक को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं ऐसी स्थिति में भगत सिंह का संदर्भ लेते हुये क्या करना चाहिये, क्या जो हम चाह्ते हैं कर पायेंगे, तमाम स्थितियों में हम उसे नहीं करते जो हम करना चाहते हैं हम उसे करते हैं जिसे लोग चाहते हैं.

एक पांच अंकों वाला धारावाहिक " सत्यमेव जयते" नाम से प्रसारित हो रहा है जो मार्च के हर रविवार को प्रसारित होगा. आज चौथा अंक प्रसारित हुआ. इस अंक में आम आदमी को जागरूक करने के लिये पूरा प्रयास किया गया है.

भारत के प्रति व्यक्ति सम्पत्ति की स्थिति बतायी गयी. मीडिया द्वारा प्रसारित करदाता के भ्रम को तोडने का प्रयास किया गया. भारत के भ्रष्टाचार की स्थिति बतायी  गयी. संघर्ष और निर्माण की भूमिका रेखांकित की गयी. सूचना के अधिकार के प्रयोग के लिये प्रेरित किया गया.

मुझे लगता है कि सोसल मीडिया के द्वारा जनता को सभी राजदलों को नागरिक एजेन्डा बताने की आवश्यकता है. सभी दल जनता को मूर्ख बनाकर अपनी कुर्सी पक्की करना चाहते हैं. उन्हें प्रतिनिधि बनाना पडेगा.
नमस्कार!
फिर मिलेंगे.
धन्यवाद.

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