Thursday, July 30, 2015

गरमागरम-१

नमस्कार!

हालचाल ठीक ही है. कई दिन से तेज धूप हो रही है. देश में राजनीति गर्मी पर है. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब नहीं रहे. भगवान उनकी जैसे मृत्यु सबको दें. कर्मयोगी को लोगों ने राजनीति में लाया. उनका व्यक्तित्व और निखरा. "जस की तस धर दीनी चदरिया'' जीवन में ऐसा बनना कठिन है. पूर्व राष्ट्रपति के मृत्यु पर एक राजनयिक परिपाटी / प्रोटोकोल होता है उसका पालन हुआ. उनकी सक्रियता ने उनको जनता से जोड़े रखा. आगे उनके जैसे या उनसे भी अच्छे राष्ट्राध्यक्ष मिलें तो भारत का भविष्य शुभ रहेगा.

आज का दिन कुछ गड़बड़ है. आज ही कलाम साहब को उनके पैत्रिक निवास रामेश्वरम में दफनाया गया और आज ही सबेरे एक ऐतिहासिक फांसी भी दी गयी याकूब मेनन की फांसी.

फेसबुक पूरे समाज का दर्पण है. बहुत सारे लोग एकदम नंगई पर उतारू रहते हैं. दुनिया का हर मानव अपने को सर्वोच्च मानता है. इसलिए वह प्रयास भी करता है. विडम्बना यह है कि  कोई सफल नहीं हो पाता . भगवान भी नहीं. पता नहीं विश्व में कितने भगवान हैं. मानव की दूसरी मजबूरी यह है कि वह अकेले नहीं रह सकता . समाज में आने के बाद समाज में जीने मरने के अपने नियम भी हैं. हम समाज के नियम और अपने नियम से संघर्ष करते रहते हैं. इस संघर्ष के चलते हमने गुणवता पूर्वक जीने के कुछ मानक भी बना लिए हैं. हमारे स्वार्थ इन मानकों से टकराते रहते हैं . हम इन्हें तोड़ते रहते हैं किन्तु साथ में यह भी चाहते हैं की सभी हमारे हर काम को पसंद भी करें.

याकूब ने बम लगाने की योजना क्यों बनाई? उसका कोई खास संबंधी तो दंगे में नहीं मरा था. जिस व्यक्ति का नाम आ रहा है उसका तो वसूली और रंगदारी का धंधा है. इस काम के बहाने एक समुदाय के लोगों का साथ भी मिल गया और धंधा आगे चमकाने की गारंटी भी मिल गयी.

विभिन्न देशों के कर्ता धर्ता जब मिलते हैं तो आतंकवाद पर घडियाली आंसू बहाते हैं , तथा हर क्षण विश्व में धमाके होते रहें इसका प्रबंध/पोषण करते रहते हैं. मानवाधिकार और विश्वबंधुत्व के मुखौटों के पीछे हमारी दूसरों को समाप्त कर देने की इच्छा कुलबुलाती रहती है. जब भी अवसर मिलता है बाहर निकल जाती है.

एक सामान्य नागरिक देश के हर खम्भे पर विश्वास करने को मजबूर है. इसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं कर सकता है. यदि थोड़ा भी विचलित हुआ तो ये खम्भे ही खा जायेंगे. जब उसे इन खम्भों का भय नहीं रहता या कोई खम्भा साथ देता हुआ लगता है तो वह खुश हो जाता है. बाकी ट्रेन में चौपाल में हर रोज भुक्तभोगी और लाभभोगी दोनों या तो रोते या डींग हांकते मिल ही जाते हैं.

न्याय गणित के सूत्र जैसा वस्तुनिष्ठ नहीं है. जब न्यायालय में दो न्यायाधीशों की बेंच बनती है तो मुझे कुछ अटपटा लगता है. बेंच तो एक, तीन, पांच जैसे  विसम संख्या की ही होना चाहिए. अथवा सम संख्या होने और मतभेद होने पर तत्काल एक दूसरी बेंच बननी चाहिए. न्याय तो सर्वमत से ही होना चाहिए. यदि सर्वमत नहीं है तो कानून में संशोधन होना चाहिए. किसी भी निर्णय को नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए. नजीर बनाने के लिए कम से कम पांच जजों की बेंच का सर्वमत निर्णय होना चाहिए जो स्पष्ट रूप से उल्लेख कर सके. अभी तक न्यायालय अपने निर्णयों पर स्वत: शोध नही कराता है. विधि मंत्रालय में न्याय के विकास के लिए निरंतर शोध होना चाहिए.

न्यायालय और तारीख में बहुत निकट का सम्बन्ध है. भारत के तमाम विधिवेत्ता ऐसी प्रक्रिया का विकास नहीं कर सकें है जिससे पूरा न्याय का कार्य एक निर्धारित सीमा में पूरा हो जाय.

भारत के जितने भी लोग न्याय के क्षेत्र में एक्टिविस्ट के रूप में काम कर रहे हैं तत्काल न्यायाधीशों की नियुक्ति जनसंख्या के अनुपात में कराने के लिए जनचेतना के लिए सक्रिय हो जाय. सभी को न्याय के लिए भौतिक दूरी से भी मुक्ति मिलनी चाहिए. न्याय जनता के लिए है तो उसे जनता के पास ही जाना चाहिए.

सभी को न्याय मिले .
नमस्कार.


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