Monday, December 27, 2010

परिधान

नमस्कार!
परिधान, पहनावा, फैशन बनता बिगड़ता रहता है और बनाता बिगाड़ता रहता है. वर्गीकरण आदमी का स्वभाव है. फैशन के आधार पर भी लोगों का वर्गीकरण किया जा सकता है. भारत में चार वर्ण और सरकारी नौकरियों में चार वर्ग हैं. वेतनक्रम चाहे जितने हों. उसे दस वर्गों में बांधने की कोशिश आयोग दर आयोग होती रही है किन्तु अभी सफलता नहीं मिली है. ऊपर से हम समान रहना चाहते हैं. किन्तु भीतर असमान बनने की चाहत भी जोर मारती रहती है. हम सबसे बड़ा बनाना चाहते हैं. वैसे हम सभी अनन्य हैं. किन्तु हम भीतरी अनन्यता से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं. बाहरी समाज हमें समान बनाना चाहता है. इसलिए समाज चाहता है कि परिधान की डिजाईन एक जैसी हो अर्थात हम कुर्ता या कमीज ही  पहने कपड़ा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार मंहगा या सस्ता हो सकता है. भीतर की अनन्यता चाह अलग ले जाना चाहती है और फैशन उसमें सहयोगी बनता है.

फैशन वालों के भी वर्ग हैं. कुछ उसे पहले अपनाते हैं धीरे धीरे दूसरे, तीसरे से होते हुए चौथे वर्ग तक फैशन का जाल पहुँच जाता है. इस प्रकार चौथा फैशनी वर्ग हरदम चौथे पायदान पर रहता है. कभी कभी शरीर अधिक से अधिक दिखाने का फैशन चलता है या कहें नंगई का फैशन चल पड़ता है. परिधान की मुख्य आवश्यकता  के आधार पर वैज्ञानिक विधि से वस्त्रों के चलन पर किसी को विश्वास नहीं रहता है. अत: कपड़ों के आधार पर कुछ भी कहने  पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात की जाने लगती है. वैसे किसी भी समूह अथवा संगठन को यदि कुछ अच्छा नहीं लगा तो  मारपीट आगजनी आजकल आम बात हो चुकी है.

कपड़ों के अतिरिक्त बाल भी फैशन का शिकार होता रहा है . बाल की कटाई और सवांरने की शैली, चोटी बनाने की शैली, को लेकर प्रयोग होते रहे हैं. प्रायः महिलाओं के बड़े बाल और पुरुषों  के छोटे बाल अंतर्राष्ट्रीय हैं किन्तु पहले महिलाओं ने बाल छोटे कराये तो पुरुषों ने बढ़ाना  और चोटी बनाना शुरू किया. 

परिधान और बाल के आधार पर संगठनों या समूहों की पहचान भी होती है या कहे कि विभिन्न सस्थाएं ,समूह और संगठन अपने परिधान नियम बनाएं हैं और उसका  पालन भी करते हैं . यह उनकी कार्य प्रणाली के लिए भी जरूरी है. 

सामान्य व्यक्ति के लिए वस्त्रों में समाज वाद जैसी चीज ही अधिक प्रशंशित है. यहाँ तक कि वस्त्रों और बाल के आधार पर व्यक्ति का प्रथम दृष्टया मूल्यांकन भी किया जाता है. इसीलिए फैशनी मध्यवर्ग लगभग एक जैसा दीखता है. 

धनी अपनी अनन्यता धन आधारित सज्जा से, ज्ञानी अपनी अनन्यता अपने विचार से प्रकट कर सकता है. इसके लिए उसे ऊल जलूल कार्य करने की आवश्यकता नहीं होती है. गांधी के नाम पर टोपी  चल पायी लंगोटी नहीं. हालांकि शायद ही गांधी ने कभी टोपी पहना हो.


प्याज और पोलिटिक्स

नमस्कार!
प्याज और पोलिटिक्स
प्याज भी गजब की चीज है. भारत में और भी गजब की चीज है. यह कई बार राजनीति की शिकार हो चुकी है. कई बार राजनीति भी प्याज की शिकार हो चुकी है. प्याज को छीलते जाईये फिर वैसी की वैसी. यही हाल राजनीति का है बहस पर बहस पर परिणाम नदारद.   इस समय भ्रष्टाचार और प्याज दोनों कांग्रेस के लिए संकट बने हुए हैं. भ्रष्टाचार के मेले में प्याज की माला पहनकर गंधाते हुए लोग दूसरे का बदबू सूँघ रहे हैं. कुछ छिलके विकीलीक्स ने उतारे कुछ टेप्स ने उतारे कुछ अखबारों ने उतारे.

भाजपा इस समय भ्रष्टाचार समाप्त करने के किसी योजना के लिए नहीं बल्कि कुछ और उद्देश्य लेकर भी मैदान में है. आखिर २जी स्पेक्ट्रम वाला मामला तब भी अखबारों में छापा था जब आबंटन हुआ था लेकिन तब मामला  टाँय   टाँय फिस्स हो गया था. अब अचानक प्याज छिलके जल्दी जल्दी उतारे जाने लगे तो तमाम लोगों की आँखों में आंसू आगये हैं.

Wednesday, December 22, 2010

धरती का पहला दिन

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प्याज

नमस्कार!
आज की ताजी खबर -प्याज.
आज की बासी खबर प्याज.
प्याज को छीलकर काटने  से आंसू निकलते हैं.
पत्रकार कह रहे हैं प्याज खरीदने से आंसू निकल रहे हैं.
बिना प्याज के खाना बनाएं .
आंसू बिलकुल नही निकालेंगे.
न खरीदने के न काटने के. 
केंद्र के खाद्य मंत्री वही हैं चीनी वाले.
याद हैं चीनी के भाव.
बिना प्याज के भोजन खाएं मस्त रहें.
जब सस्ता होजाए तो फिर खाएं.
व्यंजनों के प्याज रहित तरीके सुझाएँ.
कोई यह खबर मास्टर शैफ वाले  को पहुचाये.
नमस्कार.  

Saturday, December 11, 2010

चर्चा में

चर्चा में 
नमस्कार! 
हालचाल ठीक है ?
संसद ठप है. भ्रष्टाचार पर तू तू  मैं मैं चल रही है. खुशवंत बुढ़ापे में पछता रहे हैं कि कुछ पैसा नही बना पाए. मीडिया में भी तू तू  मैं मैं. कार्यपालिका में महाभ्रष्ट कौन है? कितने प्रतिशत हैं ? न्यायपालिका की खबर अखबार से लेकर आम आदमी तक चर्चेमें है. बचा कौन है . जिसके जिम्मे अंकुश है वही संलिप्त है. बचा आम आदमी सारा दोष उसी का है.

कभी किसी कक्षा की संस्कृत की पुस्तक में चतुर चोर की कहानी पढी थी. चोर को राज महल में चरी करते स्वयं महाराज ने पकड़ा और मृत्युदंड दे दिया. दंड  के ठीक पहले चोर ने कहा कि महाराज को बुलाया जाय उसे एक अति महत्वपूर्ण बात कहनी है. महाराज के आने पर उसने कहा कि वह सोने की खेती करना जानता है और इस राज्य की उन्नति के लिए मरने के पहले खेती करके राज्य को सोना समर्पित करना चाहता है. राजा ने उसके दंड को सोने की खेती होने तक स्थगित कर दिया. 

चोर ने बहुत चुनाव के बाद एक जमीन के टुकड़े को लिया और उसमें  टागुन  नामक फसल बो दिया. टागुन अगस्त सितम्बर के महीने पकती है दाने सुनहले होते हैं बाली गोल होती है तथा आधे पर से लटक जाती है रात की ओस की बूँदें उसपर चिपकी रहती हैं सूर्योदय के समय पूरब दिशा में खड़े होकर देखने से लगता है कि सोने की फसल है. फसल पकाने पर चोर ने कहा कि इसे वही काट सकता है जिसने कभी भी चोरी न की हो. कोई भी ऐसा नहीं मिला जिसने चोरी न किया हो यहाँ तक कि महाराजा भी. तब चोर ने कहा कि जब सभी चोर हैं तो उसे ही दंड क्यों ? राजा ने चोर की चतुराई देखकर उसे मंत्री बना दिया. 

सिफारिश करना भ्रष्टाचार नहीं है. पैसे लेकर सिफारिश करना भ्रष्टाचार है. लेकिन सिफारिश से उपकार के साथ ही नियम के साथ भ्रष्टाचार होजाता है. शुकराना हो नजराना हो या जबराना हो सभी भ्रष्टाचार हैं. बस बात इसपर है कि आप का वास्तविक  झुकाव किस तरफ है.