Friday, May 11, 2012

और अवंतिका बिक गयी


नमस्कार ! 

अवंतिका के बिकने पर भी मुझे खुशी हुई. यद्यपि अवंतिका का बिकना भारतीय समाज में फैले अन्धविश्वास में से एक है. किन्तु ऐसे अंधविश्वास  बुरे नहीं लगते हैं. कोई अपनी संतति को क्यों बेंचता है ? निश्चय ही अत्यंत मजबूरी में, सभी मार्ग बंद होजाने पर संततियां बिक जातीं हैं. मेरा यह कथन निरापद नहीं है. (दहेज लेना बेटा बेचने के रूप में प्रचलित नहीं है.)

आजके जमाने में जब बेटियों को कुछ लोग पसंद नहीं करते उसी जमाने में बेटियां हर क्षेत्र में धूम मचा रहीं हैं.  फिर भी बेटी का जन्म बहुत प्रीतिकर नहीं होता. थोड़ी कसक रहती है. अभी भी जब हम सब केवल मतदान मात्र के लिए समान अधिकारी हैं, तब अवंतिका को जीवित बचाने के लिए उसके पिता का संघर्ष प्रशंसनीय है.

अवंतिका अपनी माँ की दूसरी किन्तु पहली जीवित सन्तति है. आपरेशन से जन्मी अवंतिका को कुछ  ही समय में अपनी माँ  की सुखद गोद को छोड़कर दो किलोमीटर दूर एक ऐसे बाल चिकित्सक की शरण में जाना पड़ा जो अपने दुर्व्यवहार के लिए पूरे देवरिया में जाने जाते हैं. उसे क्या हुआ था यह तो चिकित्सक ही जानते हैं . भारत में चिकित्सक  रोगी को पूरी बात बताने परहेज करते है. पर्चा ऐसी अंग्रेजी में लिखते हैं जिसे कोई पढ़ नही सके. कोई कुछ नही कर सकता है . माननीय  सर्वोच्च न्यायालय की भाषा भी अंग्रेजी ही है. संसद में माननीय सांसद जिस भाषा में चाहे सुन सकते हैं किन्तु लोकसभा की कार्यवाही का प्रसारण  सुनाने वालों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है . डिस्कवरी चैनल को आप हिन्दी में सुन सकते हैं. ऎसी स्थिति में अवंतिका की माँ को कोई कैसे समझा सकता है की अवंतिका जीवित है. उसे तो यही लगता है की उसकी पहली सन्तति जैसे यह भी मर गयी है और घरवाले बता रहे हैं  कि वह दूसरे हास्पिटल में है.

जब मैं अवंतिका को देखने गया तो तो सुन्दर सी अवंतिका के चहरे पर रोग के नहीं शान्ति के लक्षण  थे किन्तु वह आक्सीजन  पर जी रही थी.  बहत्तर घंटे बाद  ही वह अपने इस बंधन से मुक्ति पा सकी तबतक उसे पीलिया हो गया . दस बारह हजार रूपये खर्च हो जाने के बाद अवंतिका अपने प्रसन्न पिता कि गोद में सवार होकर अपनी जननी सेमिलने पहुंची किन्तु तबतक  भयाक्रांत माँ को बताया जाचुका था कि यह सन्तति आपकी होते हुए जी नहीं सकती अतः इसे बेंच दें. 

और अवंतिका हास्पिटल के दाई के हाथों दस रूपयें बिक गयी.

अवंतिका के माँ बाप किसी तरह से धन एकत्र किये थे कि इस द्वितीय प्रसव के समय सामान्य प्रसव और जिला चिकित्सालय का परित्याग कर दिया जायगा जिससे कि सन्तति की हानि न हो. प्रसव चिकित्सालय पैसा तो लेते हैं किन्तु सामान्य और आवश्यक सुविधाए नहीं प्रदान करते . माँ किसी और जगह और नवजात शिशु  कहीं और एक दडबे में . उस दडबे में दो शिशु और दोनों के अभिभावक  एक साथ  इन्फेक्शन की पूरी संभावना के साथ.

इस लोकतंत्र में अवंतिका के  पिता ऋण  लेकर यदि अवंतिका की जान बचानें के लिए दिन रात एक नहीं करते तो अवंतिका का क्या होता ? संसद में  केंद्र और राज्य लड़ते रहते हैं  . चिकित्सा की धन राशि लूटी जाती रहती है और हजारों अवन्तिकाएं मरती रहती हैं. 

हम किसी देश के कानून के अनुसार शिशुओं की देखरेख  न करने वाले माता पिता के लिए शोर मचा सकते हैं किन्तु अपने देश की प्रसूताओं और शिशुओं की रक्षा के उपाय नही कर सकते हैं .

क्या हम अवंतिका को कह सकते हैं कि अवंतिका तुम निश्चिन्त रहो हम तुम्हारे साथ हैं. 

नहीं अवंतिका नहीं हम तम्हे  कानून दे देगे- स्वास्थ्य  रक्षा का कानून , शिक्षा के अधिकार का कानून, दहेज  निरोध का कानून.

कानून और केवल  कानून.  और अवंतिका जब इस कानून को लागू कराने के लिए जब  तुम न्यायालय जाओगी तो हो सकता है कि तुम्हारे जीवन काल  में ही न्याय मिल जाए. न्यायालय  में लगने वाले समय पर तो फर्नीचर वाले टिकाऊ फर्नीचर का विज्ञापन करते हैं.

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