Sunday, August 5, 2012

सपने से सपने तक


नमस्कार ! अगस्त माह भारत में अति महत्वपूर्ण है. हम अपनी स्वतंत्रता की याद करते हैं. अपने विकास की समीक्षा करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत ने विकास नहीं किया है. किन्तु हम कितने पीछे हैं और क्यों इतने पीछे हैं?

बहुत दिनों से बहुत सारे लोग भ्रष्टाचार को इसका कारण मानते हैं. कुछ लोग संसदीय लोकतंत्र को ही इसका कारण मानते हैं. भारत के राजनैतिक दल निराशा के दौर में थे , भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक आन्दोलन की अगुआयी की , आपातकाल लागू हुआ , सारे विरोधी  दल के नेता गण फर्जी मुकदमों में जेल में डाले गए. तब यह ज्ञात हुआ कि कि शासन के कहने पर कैसे लोगों को झूठे आरोपों में डाल दिया जाता है. जिले स्तर पर कांग्रस के नेता सूची बनाकर दे देते थे और लोग जेल में बंद कर दिए गए. जनता दल का गठन हुआ. जनता दल के टिकट देने के समय खूब धांधली हुई.  सभी दलों के एक हो जाने के कारण कांग्रेस हारी. जनता दल का शासन आया,  इंदिरा जी जेल गयीं , व्यक्तियों की राजनैतिक पदलिप्सा ने उसका अंत किया और कांग्रेस पुनः शासन में लौट गई. संजय गांधी ने जनता दल को तोड़ने की कूटनीति काफी योगदान किया. भारत के आगामी प्रधानमंत्री के रूप पूजे जाने वाले संजय गांधी का दुखद अंत हो गया. इंदिरा जी के पश्चात राजीव गांधी  देश के प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस के लोगों को उनकी इमानदारी नहीं पची और वे षड़यंत्र के शिकार हो गए. देश में पुनः बोफोर्स तोप काण्ड के बहाने भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात पर सरकार बनी . वामपंथी और भाजपा दोनों एक साथ खड़े हो गए. वह सरकार भी भ्रष्टाचार को समर्पित हो गयी. इसके बाद तो भ्रष्टाचार किस गति से बढ़ा कुछ पता ही नहीं. भारत के नेताओं ने  संविधान के संकल्प के विपरीत  समाजवाद को छोड़कर पूंजीवाद अपना कर जनता की संपत्तियों को बेंचकर काला धन बनाया. विदेश भेजा और उसे फिर मंगा कर भारत में लगाया , एन आर आई के नाम पर भारत  का पैसा भारत में फिर आ गया. नेताओं ने प्रतियोगिता कर के धन कमाया. इस बीच बहुत से आन्दोलन हुए किन्तु निष्प्रभावी रहे . एक हिन्दुस्तानी आन्दोलन नामक संस्था कुछ  दिन तक चर्चा में रही. भाजपा भी भारत को भ्रष्टाचार से चमका कर चली गयी . लोग पुनः कांग्रेस की और झुक गए . यद्यपि साझा सरकारों का ज़माना आ गया. भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता और बढ़ गयी. उसी समय अंधरे में एक किरण के रूप में अन्ना का आन्दोलन आया और लोग उस किरण की और लपके. इसी के साथ काले धन पर बाबा रामदेव की चर्चा बढी . बाबा देश में काला धन बनने से चिंतित नही. केवल बाहर गया काला धन वापस लाना चाहते हैं.

बुद्धिजीवी अन्ना आन्दोलन से ज्यादा जुड़े. अन्ना देश के दूसरे गांधी बन गए. कांगेस के वकील मंत्री अपने वाकजाल में आन्दोलन को उलझाने में लग गए. अन्ना और साथी उनके जाल में फंसकर उतावली में आ गए. और हमारे सामने एक और अनशन आ गया जिसमे अरविंद केजरीवाल नेता बनकर आये. जनता का साथ अब उतना नहीं मिला. लेकिन बहुत सारे लोग सपना देखने लगे. कांग्रेस बहुत सारे अनशनकारियों  को मार चुकी है. यह सोचकर लोगों ने कई विकल्प सुझाए जिसमें अनशन स्थगित कर राजनैतिक दल गठन करने का सुझाव आया. अचानक यह समाचार बहुत सारे लोगों के गले नहीं उतारा.


आन्दोलन के पुराने आलोचक दिवाली के मूड में आ गए. राजनैतिक दलों का तो कहना ही क्या.

 अब एक नया दल बनने वाला है जो राय मांग रहा है.

सभी समाचार पत्र इस नए दल हेतु राय बताएं. जब दल की रूपरेखा आ जाए तो सवाल उठायें.

जो यह कहते हैं कि इस आन्दोलन के नाते उनके प्रभावशाली आन्दोलन की हवा निकल गयी, वे पुनः अपने काम पर लग जाय. रास्ता बनाने वालों को रास्ता मिल जाता है.

सभी दलों और चिंतको को नमस्कार और देश के उज्जवल भविष्य की शुभकामना के साथ.

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