Monday, September 17, 2012

बरसात में गैस की आग

बरसात में गैस की आग
नमस्कार !

हालचाल ठीक है न.

मानसून की कमी में कोयले  के भ्रष्टाचार को लेकर संसद का सत्र व्यर्थ हो गया. कोयला सुलगते सुलगते आग में बदल गया. सरकार आग में पानी डालने के बजाय एक अधिक ज्वलनशील पदार्थ डीजल और गैस में आग लगा दिया. गैस की आग खतरनाक होती है अतः सभी विरोधी दल गैस से हाथ सेंकने चल दिए. २० सितम्बर को देश की दुकाने बंद रखने के लिए भारत बंद होगा. स्पष्ट है देशवासी और राज-दल दोनों के लिए भ्रष्टाचार अधिक ज्वलन शील मुद्ददा गैस है.

पेट्रोलियम पदार्थों का दाम हरदम अबूझ पहेली रहा है. इसमें सब्सिडी दी जाती है. तेल कम्पनियां घाटे का रोना रोती हैं.  हरदम दाम बढाने या सब्सिडी घटाने की चर्चा होती रहती है. पेट्रोल पम्प और गैस की एजेंसी के लिए पचास लाख  से लेकर एक करोड़ तक घूस दिया जाता है. एजेंसी पाने वाला करोड़ पति हो जाता है  .यह सब हो जाता है, किन्तु जनता को गैस और मिट्टी का तेल जिसे किरोसिन भी कहते हैं सुविधापूर्वक नहीं  मिल पाता है. छोटे शहरों की हालत तो और ही खराब है. समाज के प्रभावशाली चारो खम्भे ( विधायिका,कार्यपालिका, न्यायपालिका, और मीडिया ) तथा पांचवा खम्भा ( असामाजिक तत्व ) के लोगों को छोड़कर बाक़ी गैस पाने का हर जुगाड़ करते हैं और जी लेते हैं.

जब गैस के दाम बढाने की बात होती है तो राज-दल खूब हल्ला मचाते हैं किन्तु नया कनेक्सन लेना और भरे गैस का सिलिंडर मिलता रहे इसकी व्यवस्था बनवा लेने में अबतक असफल रहे हैं.

इस समय यह लिखना जरूरी है कि भाजपा के शासन काल में गैस की किल्लत आश्चर्यजनक रूप से दूर हो गयी थी .इसका राज नही खुल पाता है.

सरकार ने डीजल दाम बढ़ा दिए और गैस में हिचकी ले रही है. सरकार बचाने का रास्ता शायद गैस दे दे किन्तु जनता के गैस की समस्या दूर कैसे होगी इसकी चिंता किसी को नहीं है.

मैं देवरिया नाम के एक छोटे से शहर में रहता हूँ. गैस को लेकर जो जो दुर्गति हो चुकी है उसका संस्मरण कभी फिर. अभी तो मैं इस समस्या समाधान के लिए अपना विचार रखने जा रहा हूँ.

पेट्रो पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दिया जाय, क्योंकि  सब्सिडी  व्यापारी, अफसर, नेता, मंत्री और राज-दल के चक्रव्यूह में फंसकर रह जाता है. सरकार केवल डीजल और मिट्टी के तेल पर लगने वाले टैक्स को कम कर दे अथवा करमुक्त कर दे. राजकोषीय घाटा का हल्ला कर मंहगाई बढाने वालों का मुंह बंद हो जायगा.

गैस का वितरण जैसे हो रहा है उसे होने दिया जाय और प्रत्येक तहसील पर कंपनियों के नए गोदामों द्वारा सीधे जनता को छोटे, मझोले और बड़े सिलिंडरों में दिए जाय. जो चाहे जितना चाहे ले जाय. गैस उसके एक फोन काल पर उसके  घर पहुंचा दिया जाय. छोटे सिलिंडरों का  ग्राहक वही तबका है जिसके नाम पर गैस सस्ता बेचनें कि राजनीति की जा रही है. ये ग्राहक बाजार से अप्रामाणिक छोटा सिलिंडर खरीदते हैं और अवैध रूप से  तिगुने दाम पर बेचे जाने वाले गैस को भरवा लेते  हैं.


सरकार जितना सबसिडी देती है लगभग उतना ही धन ब्लैक सिलिंडर के बिकने से बाजार में आता है. यही हाल मिट्टी के तेल का भी है.

इसी प्रसंग में यह भी कहना जरूरी है कि रिफाइनरी से सीधे हवा में जला दी जाने वाली ऊर्जा को भी उपयोग में लाया जाना जरूरी है.

जनता को भीख नहीं अधिकार चाहिए. उसे हर खरीद अथवा बिक्री पर उचित  मूल्य चाहिए. जनता द्वारा दिया गया कर राजकोष में ही पहुचना चाहिए. तेल के सब्सिडी के खेल की भी जांच जरूरी है. आखिर तेल का पैसा कौन खा रहा है? 

नमस्कार !

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