Saturday, July 19, 2014

भाषा और भारत

नमस्कार!

हालचाल ठीक है . सावन भी आज मूड में है. पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम दिन है, सुबह से बरसात के दौर चल रहे हैं. बिजली और वर्षा दोनों  का आना जाना लगा हुआ है. सीसैट ने भाषा और अनुवाद दोनों को विवाद के घेरे में ला दिया है. कई  दिनों के बाद सीसैट ( Civil Services Aptitude Test ) का अर्थ जान पाया. अंग्रेजी की एक बड़ी उपयोगिता छोटे नामों को प्रचलित कर देने में है. यह रोमन लिपि का कमाल है. इस कमाल के कारण धोखे भी खूब होते हैं. भारत सिविल शब्द खूब प्रचलित है. पहले हर जिले में सिविल सर्जन और सिविल लाइन होते थे. अब सिविल सर्जन तो नहीं होते किन्तु सिविल लाइन्स और सिविल सर्विसेज का प्रचलन खूब है. भाषा का ऐसा जोड़ तोड़ होता है कि एक बार खेल के मैदान में खेल-ज्योति या मशाल का नाम जब टार्च बोला गया तो मैं आधुनिक टार्च को ही दिमाग में ला सका. आज भी टार्च माने टार्च ही सामने आता है मशाल नही.

भारत में वस्तुनिष्ठता को नास्तिकता से जोड़ दिया गया, इसलिये भारत के बहुत से वैज्ञानिक और विज्ञान विषयों के आचार्य नास्तिकता से बचने के लिये वस्तुनिष्ठता से दूर ही रहना चाहते हैं. वसुधैव कुटुम्बकम का नारा तो देते हैं किन्तु भारत के ही सब लोगों को समानता का  अवसर नहीं देना चाहते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा की वस्तुनिष्ठता शुरु से ही संदिग्ध रही है. विषयों का चयन फैशन की तरह बदलता रहा है. आचार्य गण अपने विषय को प्रचलित करने के लिये सर्ल प्रश्न और अधिक अंक  देने का प्रयास करते रहे हैं. आचार्यों की ""वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता"" के चलते यह परीक्षा विवादित रही है.

अभ्यर्थी विवाद और न्यायालय के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते रहे. विषेशज्ञ गण अपनी कसौटी के समान दूसरे की कसौटी को मानते नहीं. फलतः तमाम अभ्यर्थी टूट्ते रहे. जो जीता वही सिकन्दर इसके कारण न चुने जाने वाले अयोग्य माने जाते रहे. जो शोधकार्य और प्रदत्त तथा प्रदत्त विश्लेषण प्रकाश में लाये जाते हैं उन्हें अलग से किसी ने जांचने की कोशिश नहीं की, अगर की भी तो वे चर्चित नहीं हुये.

भारत में इन्टरमीडियेट अर्थात १०+२ की परीक्षा प्रत्येक प्रदेश की परिषदें, और कुछ  परिषदें  संचालित कराती हैं. सबका अपना अपना राग है,  अलग राग प्रायः वस्तुनिष्ठता को समाप्त करने के लिये ही होते हैं.

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायक अंग्रेजी जानने वाले लोग ही थे. लेकिन लोग तो अंग्रेजी जानते नहीं थे. अतः नेताओं ने जनता से तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं में सम्पर्क साधा किन्तु सरकारी कमकाज अंग्रेजी की ओर गया. मुसलमान शासकों के कारण कचहरी की भाषा उर्दू हुई.

मैं जब हाईस्कूल १०वीं कक्षा में था तो उत्तर भरत में हिन्दी आन्दोलन चला था. १२ वीं तक पढाई का माध्यम हिन्दी रहा, उसके बाद माध्यम अंग्रेजी हो गया. हिन्दी माध्यम से पढकर गये छात्र अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़ लेते थे. अंग्रेजी में परीक्षा दे देते थे किन्तु आपसी बात तो हिन्दी में ही कर पाते थे. बहुत कम लोग बातचीत अंग्रेजी में करते थे.

व्यक्ति की बुद्धि, ज्ञान, विवेक मात्र किसी विदेशी भाषा के आधार पर नहीं जाना जा सकता. विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले 5.43% तथा हिन्दी वाले 4.70% बंगाली वाले 3.11% हैं.
http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers

एक दूसरे श्रोत के अनुसार मानक हिन्दी जानने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से अधिक है.
Hindi

मानक हिन्दी - Mānak Hindī

Modern Standard Hindi is a standardised variety of the Hindustani language.

It is one of the official languages in India (as Hindi, Urdu) and in Pakistan(as Urdu).
 
hin366 000 000487 000 000
English

has been widely dispersed around the world, it is official language in 83 countries/regions (ISO), spoken in 105 other countries (E).

Curiosity: English language does not have official status in Australia, theUnited Kingdom, and the United States.
http://www.nationsonline.org/oneworld/most_spoken_languages.htm

आजकल भारतीय भाषा वाले सीसैट में संशोधन चाहते  है. तमाम विद्वान यह मानते हैं कि अंग्रेजी जाने बिना मोक्ष ही नहीं मिलेगा तो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की प्री परीक्षा केवल भारतीय भाषा में होने दीजिये. चयन के बाद प्रशिक्षण में प्रशासनिक अंग्रेजी का लिखित और मौखिक अभ्यास और प्रशिक्षण देकर मोक्ष लायक अंग्रेजी सिखा दीजिये.

आजकल के फैशन के अनुरूप प्रत्येक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिये जिसमें आधा ध्यान बोलने पर भी दिया जाना चाहिये.

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