Friday, July 25, 2014

भावताव

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

इधर भाई लोग इसराइल के गुणगान में व्यस्त हैं, इसराइल को टमाटर बम बनाना चाहिये. भारत जैसे देश में टमाटर वर्षा कर देनी चाहिये.
 
आजकल  आम की  नहीं  टमाटर की चर्चा हो रही हैं. यह तो पता नहीं कि मीडिया के लोग जहां के मूल निवासी हैं वहां सालोंसाल टमाटर फलता है या मौसमी फल है.

यह बात अलग है कि जमाना ग्लोबल है तो हर समय हर चीज मिलती है. दिल्ली वालों को आदत है कि सब कुछ हर समय खायें तो टमाटर इस समय सौ रूपये किलो हो जा रहा तो टीवी का समाचर हो जा रहा है.

सब्जियां मंहगी और सस्ती होती रहती हैं. जब जो सब्जी महंगी  हो उसे खरीदना बंद कर दीजिये. दूध के भाव से टमाटर का भाव मिला लीजिये.

कल एक देहात के बाजार में आलू चौबीस रुपये किलो तथा परवल बीस रुपये किलो मिल रहा था. कभी कभी सेब से मंहगी प्याज मिलती है.

जब किसी सब्जी का भाव बढ़्ता है तो वह वीआईपी बन जाती है. उसे खाने का अधिक मन करता है. और टमातर में तो लाइकोपेन मिलता है. लाइकोपेन वाली गोली दस रुपये मेम एक मिलती है.

सब्जियों के थोक बाजार से खुदरा बाजार मेम जाने और उनके मंहगा हो जाए पर रोज समाचार सुनने को मिल जाते हैं. दवाओं के भाव के समाचार कोई नहीं दिखाता.

इसी पर याद आया रोटी घटना यह पता नहीं कि वहां थाली कितने की मिलती है. भोजन का भाव तो रोज बदलनेवाला है. जिसके कच्चे माल का भाव रोज बदलता है उससे बने सामग्री का भाव साल भर तक एक कैसे हो सकता है.

कुछ लोग कहते हैं कि बिना प्याज के सब्जी कैसे बनेगी कुछ लोग प्याज खाते ही नहीं.

बड़े बड़े शैफ लोग रोज नाना प्रकार के व्यंजन बनाने को बताते हैं उन्हें प्याज टमाटर रहित व्यंजन विधि बताना चाहिये.

जरा पब्लिक स्कूलों के कापी किताब और ड्रेस की ओर भी नजर घुमा लीजिये मीडिया सर. काटजू साहब के बहाने से ही सही हरिशंकर परसाई के नाम पर कचहरी की सैर भी कर लिजिये.
नमस्कार.




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