Sunday, January 16, 2011

आक्रामकता

आक्रामकता
नमस्कार!
अपने शशिशेखर जी हिन्दुस्तान वाले सम्पादक जी गुस्से पर गुस्सा हैं या चिंतित हैं. गुस्से के कारण लोग अब आक्रामक  होते जा रहे हैं. यह आक्रामकता पूरे विश्व में देखी जा रही है. लोग पहले भी इसपर चिंता व्यक्त कर चुके हैं ,  इसके कारण और निवारण पर भी विचार कर चुके हैं.  जब पत्रकार कलम छोड़कर जूता उठाले तो क्या कहा जाएगा. कलम की ताकत ख़तम हो गयी या जनतंत्र में कलम कीताकत कमजोर हो गयी है. या हमारे अन्दर कुछ बात है जिसके कारण हम आक्रामक हो जाते हैं. 

हमारी संस्कृति हमें व्यवहार करने के तरीके सिखाती है और यदि हम अधिक आक्रामक हो रहे हैं तो हमें अपने सांस्कृतिक परिवेश की ओर झाँक कर देखना चाहिए.  जिन्होंने झांका है वे पाए हैं कि विभिन्न संस्कृतियों में आक्रामक व्यवहार की मात्रा अलग अलग देखने को मिलती है.  

आक्रामकता देखने और अनुकरण करने से बढ़ती है. सिनेमा, टीवी, अखबार और मंचीय कार्यक्रम भी आक्रामकता को बढाते हैं अतः मीडिया के लोंगों को भी सोचना होगा कि हम जो दिखा रहे हैं वह कैसे दिखाये कि सूचना तो दे दें किन्तु उसके निषेधात्मक प्रभाव को रोक लें. हमारे माननीय जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं उससे क्या प्रभाव पड़ेगा स्पष्ट है. 

नशा ,  पीड़ा कष्ट भी हमारे आक्रामकता को बढाते हैं. किन्तु इन सबसे अधिक प्रभावशाली कारक है निराशा या कुंठा.   दूरदर्शन और विज्ञापन के साजो सामान लोगों की आवश्यकता बढाते जा रहे हैं प्रकारांतर से कुंठा ही बढ़ा रहे हैं. 

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा से नौकरियाँ बिक रही हैं, हर काम में सुविधा शुल्क लग रहा है. बेरोजगार नौजवान सडकों पर हैं. असमानता बढ़ती जा रही है. रोज चौराहों पर घूस, चोरबाजारी, अन्याय और भ्रष्टाचार की चर्चा हो रही है. कौन सरकारी नौकरी कितने में बिकी, कौन काम कितने में हुआ, किस अधिकारी का तबादला कितने पैसे पर हुआ. ये पब्लिक तो सब जानती है पर हाकिम न जानने का बहाना कर रहे हैं. 

यह पूरा आक्रोश किस व्यक्ति के व्यवहार से प्रकट हो जाय कहा नहीं जा सकता. 

Sunday, January 9, 2011

सम्पादक के नाम पत्र

सम्पादक के नाम पत्र 
नमस्कार!
अतीत की यादें. चवन्नी का जाना. याद आता है एक गाना- "नए छः पैसों का पुराना एक आना बाबा बदला ज़माना". ज़माना रोज आगे बढ़ता है हम बढ़े न बढ़े. आपका  अखबार "हिन्दुस्तान" अब देवरिया सस्करण भी छापने लगा है. तीन और साढ़े तीन  रूपये वाले अखबार भी खूब बिक रहे है. शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ रही है अखबारों की खपत भी बढ़ रही है गलाकाटू प्रतिस्पर्धा  भी बढ़ रही है. नई नई बातें हो रहीं हैं.

खाद्य सामग्रियों का मूल्य बढ़ रहा है किन्तु किसान को लाभ नहीं मिल रहा है. वैसे हमारे प्रधानमंत्री जी किसानों पर ध्यान कम ही रखते हैं.पूरा कृषि क्षेत्र उपेक्षित है. कृषि मंत्री जी क्रिकेट वाले हैं. वेतन आयोग देर से गठित होते हैं. उनकी अनुशंषा देर से लागू होती है. एक बार बढ़ा वेतन मिलता है फिर बकाया धन राशि. महगाई बढाने का बहाना मिल जाता है. केंद्र का महगाई भत्ता बढ़ता है फिर प्रांत का, महगाई बढाने का फिर बहाना. केंद्र और प्रान्त सरकारें हर हाल में एक साथ ही वेतन बढाने घोषणा करें और लागू करें तो महगाई बढाने के अवसर कम हो जायेंगे.

महगांयी डायन  है तो भ्रष्टाचार पिशाच. दोनों साथ मिलकर जनता का खून चूस रहे हैं. सब अपने अपने भ्रष्टाचार में लगे हैं. जब मेंड़ ही खेत खाने लगे तो खेत का क्या होगा. जिनसे अपेक्षा है कि भ्रष्टाचार रोकेंगे वे उसमें सम्मिलित हैं. प्रतियोगिता चल रही है कि कौन बड़ा. शायद कुछ हो जाए बिहार जैसा. 

अखबार के पन्ने राजनीति, और खेल पर जितना स्थान देते हैं उतना शिक्षा पर नहीं. विज्ञान कांग्रेस  की कितनी खबर छपी? शोध की सूचना मात्र शोधार्थी की सूचना रहती है. सिब्बल साहब शोध के लिए चिंतित हैं. शोध कर चुके नेट पास हजार, पांच  सौ, दो हजार और पांच हजार रूपये महीने पर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं. उ. प्र. में सात विषयों के साथ महाविद्यालय खुल जाते हैं. सरकार के खर्च का हिसाब तो सिब्बल साहब ने ही दे दिया है. 

पचौरी साहब को भी  प्याज सता रही है. सरकारें बिगाड़ने  बनाने वाली प्याज का रुतबा साहित्य में भी बढ़ गया है. 

आपके "हिन्दुस्तान " में सम्पादक के नाम पत्र ईमेल से क्यों नही लिए जाते यदि हाँ तो पता क्यों नहीं छपता. 

देवरिया संसकरण में तीसरे पेज पर मौसम का साप्ताहिक चित्र रोज गलत छपता है. 
आशा है इस लोकल अखबार में ग्लोबल खबरें मिलती रहेंगी.  

सादर 
जयप्रकाश पाठक 
देवरिया.

Saturday, January 1, 2011

PUSHP

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स्वागत-2011

स्वागत-२०११
नमस्कार!

आज का सूर्योदय कुछ ख़ास था. रात को बदली छाई रही, नव वर्ष २०११ का  स्वागत  हल्की फुहार के साथ हुआ. धीरे धीरे भारत में भी  यह त्यौहार  का रूप लेता  जा रहा है. बधाइयां, मिठाइयां, पटाखे, नाच, गान,धूम धड़ाका चल रहा है. बूढ़े, जवान, बच्चे सभी एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं. हो गया त्यौहार. कैलेण्डर बदल गए. डायरियां बदल गई. उपहार दिए लिए जा रहे हैं. नये साल के नए सपने नए प्रस्ताव नई नई बातें. साल कुछ दे जाता है कुछ ले जाता है.

कोई भी त्यौहार एक नया उत्साह दे जाता है, यह त्यौहार जाड़े के साथ आता है. जाड़े में हिदुओं के कई त्यौहार आते हैं जो नहान के त्यौहार होते हैं. यही त्यौहार जिसमें भारतीयों को अपने जैसे काम करने में खूब मजा आता है. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और तमाम श्रद्धास्थल लोगों से भर जा रहे हैं.

स्वागत २०११