आक्रामकता
नमस्कार!अपने शशिशेखर जी हिन्दुस्तान वाले सम्पादक जी गुस्से पर गुस्सा हैं या चिंतित हैं. गुस्से के कारण लोग अब आक्रामक होते जा रहे हैं. यह आक्रामकता पूरे विश्व में देखी जा रही है. लोग पहले भी इसपर चिंता व्यक्त कर चुके हैं , इसके कारण और निवारण पर भी विचार कर चुके हैं. जब पत्रकार कलम छोड़कर जूता उठाले तो क्या कहा जाएगा. कलम की ताकत ख़तम हो गयी या जनतंत्र में कलम कीताकत कमजोर हो गयी है. या हमारे अन्दर कुछ बात है जिसके कारण हम आक्रामक हो जाते हैं.
हमारी संस्कृति हमें व्यवहार करने के तरीके सिखाती है और यदि हम अधिक आक्रामक हो रहे हैं तो हमें अपने सांस्कृतिक परिवेश की ओर झाँक कर देखना चाहिए. जिन्होंने झांका है वे पाए हैं कि विभिन्न संस्कृतियों में आक्रामक व्यवहार की मात्रा अलग अलग देखने को मिलती है.
आक्रामकता देखने और अनुकरण करने से बढ़ती है. सिनेमा, टीवी, अखबार और मंचीय कार्यक्रम भी आक्रामकता को बढाते हैं अतः मीडिया के लोंगों को भी सोचना होगा कि हम जो दिखा रहे हैं वह कैसे दिखाये कि सूचना तो दे दें किन्तु उसके निषेधात्मक प्रभाव को रोक लें. हमारे माननीय जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं उससे क्या प्रभाव पड़ेगा स्पष्ट है.
नशा , पीड़ा कष्ट भी हमारे आक्रामकता को बढाते हैं. किन्तु इन सबसे अधिक प्रभावशाली कारक है निराशा या कुंठा. दूरदर्शन और विज्ञापन के साजो सामान लोगों की आवश्यकता बढाते जा रहे हैं प्रकारांतर से कुंठा ही बढ़ा रहे हैं.
भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा से नौकरियाँ बिक रही हैं, हर काम में सुविधा शुल्क लग रहा है. बेरोजगार नौजवान सडकों पर हैं. असमानता बढ़ती जा रही है. रोज चौराहों पर घूस, चोरबाजारी, अन्याय और भ्रष्टाचार की चर्चा हो रही है. कौन सरकारी नौकरी कितने में बिकी, कौन काम कितने में हुआ, किस अधिकारी का तबादला कितने पैसे पर हुआ. ये पब्लिक तो सब जानती है पर हाकिम न जानने का बहाना कर रहे हैं.
यह पूरा आक्रोश किस व्यक्ति के व्यवहार से प्रकट हो जाय कहा नहीं जा सकता.
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