सम्पादक के नाम पत्र
नमस्कार!अतीत की यादें. चवन्नी का जाना. याद आता है एक गाना- "नए छः पैसों का पुराना एक आना बाबा बदला ज़माना". ज़माना रोज आगे बढ़ता है हम बढ़े न बढ़े. आपका अखबार "हिन्दुस्तान" अब देवरिया सस्करण भी छापने लगा है. तीन और साढ़े तीन रूपये वाले अखबार भी खूब बिक रहे है. शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ रही है अखबारों की खपत भी बढ़ रही है गलाकाटू प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है. नई नई बातें हो रहीं हैं.
खाद्य सामग्रियों का मूल्य बढ़ रहा है किन्तु किसान को लाभ नहीं मिल रहा है. वैसे हमारे प्रधानमंत्री जी किसानों पर ध्यान कम ही रखते हैं.पूरा कृषि क्षेत्र उपेक्षित है. कृषि मंत्री जी क्रिकेट वाले हैं. वेतन आयोग देर से गठित होते हैं. उनकी अनुशंषा देर से लागू होती है. एक बार बढ़ा वेतन मिलता है फिर बकाया धन राशि. महगाई बढाने का बहाना मिल जाता है. केंद्र का महगाई भत्ता बढ़ता है फिर प्रांत का, महगाई बढाने का फिर बहाना. केंद्र और प्रान्त सरकारें हर हाल में एक साथ ही वेतन बढाने घोषणा करें और लागू करें तो महगाई बढाने के अवसर कम हो जायेंगे.
महगांयी डायन है तो भ्रष्टाचार पिशाच. दोनों साथ मिलकर जनता का खून चूस रहे हैं. सब अपने अपने भ्रष्टाचार में लगे हैं. जब मेंड़ ही खेत खाने लगे तो खेत का क्या होगा. जिनसे अपेक्षा है कि भ्रष्टाचार रोकेंगे वे उसमें सम्मिलित हैं. प्रतियोगिता चल रही है कि कौन बड़ा. शायद कुछ हो जाए बिहार जैसा.
अखबार के पन्ने राजनीति, और खेल पर जितना स्थान देते हैं उतना शिक्षा पर नहीं. विज्ञान कांग्रेस की कितनी खबर छपी? शोध की सूचना मात्र शोधार्थी की सूचना रहती है. सिब्बल साहब शोध के लिए चिंतित हैं. शोध कर चुके नेट पास हजार, पांच सौ, दो हजार और पांच हजार रूपये महीने पर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं. उ. प्र. में सात विषयों के साथ महाविद्यालय खुल जाते हैं. सरकार के खर्च का हिसाब तो सिब्बल साहब ने ही दे दिया है.
पचौरी साहब को भी प्याज सता रही है. सरकारें बिगाड़ने बनाने वाली प्याज का रुतबा साहित्य में भी बढ़ गया है.
आपके "हिन्दुस्तान " में सम्पादक के नाम पत्र ईमेल से क्यों नही लिए जाते यदि हाँ तो पता क्यों नहीं छपता.
देवरिया संसकरण में तीसरे पेज पर मौसम का साप्ताहिक चित्र रोज गलत छपता है.
आशा है इस लोकल अखबार में ग्लोबल खबरें मिलती रहेंगी.
सादर
जयप्रकाश पाठक
देवरिया.
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