Wednesday, October 3, 2012

" उच्च शिक्षा में लूट की छूट"


  " उच्च शिक्षा में लूट की छूट"
सभी बड़े औद्योगिक घराने लाभकारी शिक्षण संस्थाएं चलाना चाहते हैं. क्योंकि इसमे सतत  लाभ
की पूर्ण संभावना है. अभी कुछ दिनों पहले भारत के राष्ट्रपति महोदय ने भारतीय उच्चशिक्षा के केन्द्रों के निराशाजनक प्रदर्शन पर टिप्पड़ी किया. उसके तत्काल बाद गुणवत्ता की चर्चा पुनः चला गयी है.

अब प्रश्न उठता है कि क्या अबतक भारत के वित्तमंत्रियों ने शिक्षा और विशेष कर उच्च शिक्षा पर उतना वित्तीय ध्यान दिया जितना  देना चाहिए? उत्तर मिलेगा नहीं . कारण यह है कि अभी तक शिक्षा और शिक्षा का स्तर वोटबैंक की राजनीति में कोई महत्त्व नहीं रखते.

जनतांत्रिक देश में शिक्षा की व्यवस्था किसी भी हालत में किसी के दान पर नहीं छोडी जानी चाहिए न ही इसे व्यापार के लिए खोला जाना चाहिए. भारत का प्रत्येक नागरिक कर देता है उस कर का प्रयोग राज-दल  अपने वोटबैंक बनाने के लिए करते हैं. तमाम योजनायें चलाई जाती हैं जिन्हें लूट के लिए ही चलाया जाता है. जनता से अब शिक्षा कर  की  वसूली भी की जा रही है किन्तु सबको शिक्षा का समान अवसर नहीं दिया जा रहा है. जब मांग होती है तो एक आयोग बना कर समस्या को लटका दिया जाता है.

अब देशी और विदेशी  कारपोरेट सेक्टर शिक्षा से धन दोहन की पूरी तैयारी कर चूका है और सरकार बेचना शुरू कर दी है . शिक्षा के अधिकार के कानून में सबको शिक्षा देने के लिए आवश्यक धन जुटाने केलिए केंद्र सरकारें और प्रांतीय सरकारें एक दूसरे को नीचा दिखाती रहेंगी. और सुधार के नाम पर झुनझुने मिलते रहेंगे.

Monday, September 17, 2012

बरसात में गैस की आग

बरसात में गैस की आग
नमस्कार !

हालचाल ठीक है न.

मानसून की कमी में कोयले  के भ्रष्टाचार को लेकर संसद का सत्र व्यर्थ हो गया. कोयला सुलगते सुलगते आग में बदल गया. सरकार आग में पानी डालने के बजाय एक अधिक ज्वलनशील पदार्थ डीजल और गैस में आग लगा दिया. गैस की आग खतरनाक होती है अतः सभी विरोधी दल गैस से हाथ सेंकने चल दिए. २० सितम्बर को देश की दुकाने बंद रखने के लिए भारत बंद होगा. स्पष्ट है देशवासी और राज-दल दोनों के लिए भ्रष्टाचार अधिक ज्वलन शील मुद्ददा गैस है.

पेट्रोलियम पदार्थों का दाम हरदम अबूझ पहेली रहा है. इसमें सब्सिडी दी जाती है. तेल कम्पनियां घाटे का रोना रोती हैं.  हरदम दाम बढाने या सब्सिडी घटाने की चर्चा होती रहती है. पेट्रोल पम्प और गैस की एजेंसी के लिए पचास लाख  से लेकर एक करोड़ तक घूस दिया जाता है. एजेंसी पाने वाला करोड़ पति हो जाता है  .यह सब हो जाता है, किन्तु जनता को गैस और मिट्टी का तेल जिसे किरोसिन भी कहते हैं सुविधापूर्वक नहीं  मिल पाता है. छोटे शहरों की हालत तो और ही खराब है. समाज के प्रभावशाली चारो खम्भे ( विधायिका,कार्यपालिका, न्यायपालिका, और मीडिया ) तथा पांचवा खम्भा ( असामाजिक तत्व ) के लोगों को छोड़कर बाक़ी गैस पाने का हर जुगाड़ करते हैं और जी लेते हैं.

जब गैस के दाम बढाने की बात होती है तो राज-दल खूब हल्ला मचाते हैं किन्तु नया कनेक्सन लेना और भरे गैस का सिलिंडर मिलता रहे इसकी व्यवस्था बनवा लेने में अबतक असफल रहे हैं.

इस समय यह लिखना जरूरी है कि भाजपा के शासन काल में गैस की किल्लत आश्चर्यजनक रूप से दूर हो गयी थी .इसका राज नही खुल पाता है.

सरकार ने डीजल दाम बढ़ा दिए और गैस में हिचकी ले रही है. सरकार बचाने का रास्ता शायद गैस दे दे किन्तु जनता के गैस की समस्या दूर कैसे होगी इसकी चिंता किसी को नहीं है.

मैं देवरिया नाम के एक छोटे से शहर में रहता हूँ. गैस को लेकर जो जो दुर्गति हो चुकी है उसका संस्मरण कभी फिर. अभी तो मैं इस समस्या समाधान के लिए अपना विचार रखने जा रहा हूँ.

पेट्रो पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दिया जाय, क्योंकि  सब्सिडी  व्यापारी, अफसर, नेता, मंत्री और राज-दल के चक्रव्यूह में फंसकर रह जाता है. सरकार केवल डीजल और मिट्टी के तेल पर लगने वाले टैक्स को कम कर दे अथवा करमुक्त कर दे. राजकोषीय घाटा का हल्ला कर मंहगाई बढाने वालों का मुंह बंद हो जायगा.

गैस का वितरण जैसे हो रहा है उसे होने दिया जाय और प्रत्येक तहसील पर कंपनियों के नए गोदामों द्वारा सीधे जनता को छोटे, मझोले और बड़े सिलिंडरों में दिए जाय. जो चाहे जितना चाहे ले जाय. गैस उसके एक फोन काल पर उसके  घर पहुंचा दिया जाय. छोटे सिलिंडरों का  ग्राहक वही तबका है जिसके नाम पर गैस सस्ता बेचनें कि राजनीति की जा रही है. ये ग्राहक बाजार से अप्रामाणिक छोटा सिलिंडर खरीदते हैं और अवैध रूप से  तिगुने दाम पर बेचे जाने वाले गैस को भरवा लेते  हैं.


सरकार जितना सबसिडी देती है लगभग उतना ही धन ब्लैक सिलिंडर के बिकने से बाजार में आता है. यही हाल मिट्टी के तेल का भी है.

इसी प्रसंग में यह भी कहना जरूरी है कि रिफाइनरी से सीधे हवा में जला दी जाने वाली ऊर्जा को भी उपयोग में लाया जाना जरूरी है.

जनता को भीख नहीं अधिकार चाहिए. उसे हर खरीद अथवा बिक्री पर उचित  मूल्य चाहिए. जनता द्वारा दिया गया कर राजकोष में ही पहुचना चाहिए. तेल के सब्सिडी के खेल की भी जांच जरूरी है. आखिर तेल का पैसा कौन खा रहा है? 

नमस्कार !

Sunday, August 5, 2012

सपने से सपने तक


नमस्कार ! अगस्त माह भारत में अति महत्वपूर्ण है. हम अपनी स्वतंत्रता की याद करते हैं. अपने विकास की समीक्षा करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत ने विकास नहीं किया है. किन्तु हम कितने पीछे हैं और क्यों इतने पीछे हैं?

बहुत दिनों से बहुत सारे लोग भ्रष्टाचार को इसका कारण मानते हैं. कुछ लोग संसदीय लोकतंत्र को ही इसका कारण मानते हैं. भारत के राजनैतिक दल निराशा के दौर में थे , भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक आन्दोलन की अगुआयी की , आपातकाल लागू हुआ , सारे विरोधी  दल के नेता गण फर्जी मुकदमों में जेल में डाले गए. तब यह ज्ञात हुआ कि कि शासन के कहने पर कैसे लोगों को झूठे आरोपों में डाल दिया जाता है. जिले स्तर पर कांग्रस के नेता सूची बनाकर दे देते थे और लोग जेल में बंद कर दिए गए. जनता दल का गठन हुआ. जनता दल के टिकट देने के समय खूब धांधली हुई.  सभी दलों के एक हो जाने के कारण कांग्रेस हारी. जनता दल का शासन आया,  इंदिरा जी जेल गयीं , व्यक्तियों की राजनैतिक पदलिप्सा ने उसका अंत किया और कांग्रेस पुनः शासन में लौट गई. संजय गांधी ने जनता दल को तोड़ने की कूटनीति काफी योगदान किया. भारत के आगामी प्रधानमंत्री के रूप पूजे जाने वाले संजय गांधी का दुखद अंत हो गया. इंदिरा जी के पश्चात राजीव गांधी  देश के प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस के लोगों को उनकी इमानदारी नहीं पची और वे षड़यंत्र के शिकार हो गए. देश में पुनः बोफोर्स तोप काण्ड के बहाने भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात पर सरकार बनी . वामपंथी और भाजपा दोनों एक साथ खड़े हो गए. वह सरकार भी भ्रष्टाचार को समर्पित हो गयी. इसके बाद तो भ्रष्टाचार किस गति से बढ़ा कुछ पता ही नहीं. भारत के नेताओं ने  संविधान के संकल्प के विपरीत  समाजवाद को छोड़कर पूंजीवाद अपना कर जनता की संपत्तियों को बेंचकर काला धन बनाया. विदेश भेजा और उसे फिर मंगा कर भारत में लगाया , एन आर आई के नाम पर भारत  का पैसा भारत में फिर आ गया. नेताओं ने प्रतियोगिता कर के धन कमाया. इस बीच बहुत से आन्दोलन हुए किन्तु निष्प्रभावी रहे . एक हिन्दुस्तानी आन्दोलन नामक संस्था कुछ  दिन तक चर्चा में रही. भाजपा भी भारत को भ्रष्टाचार से चमका कर चली गयी . लोग पुनः कांग्रेस की और झुक गए . यद्यपि साझा सरकारों का ज़माना आ गया. भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता और बढ़ गयी. उसी समय अंधरे में एक किरण के रूप में अन्ना का आन्दोलन आया और लोग उस किरण की और लपके. इसी के साथ काले धन पर बाबा रामदेव की चर्चा बढी . बाबा देश में काला धन बनने से चिंतित नही. केवल बाहर गया काला धन वापस लाना चाहते हैं.

बुद्धिजीवी अन्ना आन्दोलन से ज्यादा जुड़े. अन्ना देश के दूसरे गांधी बन गए. कांगेस के वकील मंत्री अपने वाकजाल में आन्दोलन को उलझाने में लग गए. अन्ना और साथी उनके जाल में फंसकर उतावली में आ गए. और हमारे सामने एक और अनशन आ गया जिसमे अरविंद केजरीवाल नेता बनकर आये. जनता का साथ अब उतना नहीं मिला. लेकिन बहुत सारे लोग सपना देखने लगे. कांग्रेस बहुत सारे अनशनकारियों  को मार चुकी है. यह सोचकर लोगों ने कई विकल्प सुझाए जिसमें अनशन स्थगित कर राजनैतिक दल गठन करने का सुझाव आया. अचानक यह समाचार बहुत सारे लोगों के गले नहीं उतारा.


आन्दोलन के पुराने आलोचक दिवाली के मूड में आ गए. राजनैतिक दलों का तो कहना ही क्या.

 अब एक नया दल बनने वाला है जो राय मांग रहा है.

सभी समाचार पत्र इस नए दल हेतु राय बताएं. जब दल की रूपरेखा आ जाए तो सवाल उठायें.

जो यह कहते हैं कि इस आन्दोलन के नाते उनके प्रभावशाली आन्दोलन की हवा निकल गयी, वे पुनः अपने काम पर लग जाय. रास्ता बनाने वालों को रास्ता मिल जाता है.

सभी दलों और चिंतको को नमस्कार और देश के उज्जवल भविष्य की शुभकामना के साथ.

Friday, May 11, 2012

और अवंतिका बिक गयी


नमस्कार ! 

अवंतिका के बिकने पर भी मुझे खुशी हुई. यद्यपि अवंतिका का बिकना भारतीय समाज में फैले अन्धविश्वास में से एक है. किन्तु ऐसे अंधविश्वास  बुरे नहीं लगते हैं. कोई अपनी संतति को क्यों बेंचता है ? निश्चय ही अत्यंत मजबूरी में, सभी मार्ग बंद होजाने पर संततियां बिक जातीं हैं. मेरा यह कथन निरापद नहीं है. (दहेज लेना बेटा बेचने के रूप में प्रचलित नहीं है.)

आजके जमाने में जब बेटियों को कुछ लोग पसंद नहीं करते उसी जमाने में बेटियां हर क्षेत्र में धूम मचा रहीं हैं.  फिर भी बेटी का जन्म बहुत प्रीतिकर नहीं होता. थोड़ी कसक रहती है. अभी भी जब हम सब केवल मतदान मात्र के लिए समान अधिकारी हैं, तब अवंतिका को जीवित बचाने के लिए उसके पिता का संघर्ष प्रशंसनीय है.

अवंतिका अपनी माँ की दूसरी किन्तु पहली जीवित सन्तति है. आपरेशन से जन्मी अवंतिका को कुछ  ही समय में अपनी माँ  की सुखद गोद को छोड़कर दो किलोमीटर दूर एक ऐसे बाल चिकित्सक की शरण में जाना पड़ा जो अपने दुर्व्यवहार के लिए पूरे देवरिया में जाने जाते हैं. उसे क्या हुआ था यह तो चिकित्सक ही जानते हैं . भारत में चिकित्सक  रोगी को पूरी बात बताने परहेज करते है. पर्चा ऐसी अंग्रेजी में लिखते हैं जिसे कोई पढ़ नही सके. कोई कुछ नही कर सकता है . माननीय  सर्वोच्च न्यायालय की भाषा भी अंग्रेजी ही है. संसद में माननीय सांसद जिस भाषा में चाहे सुन सकते हैं किन्तु लोकसभा की कार्यवाही का प्रसारण  सुनाने वालों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है . डिस्कवरी चैनल को आप हिन्दी में सुन सकते हैं. ऎसी स्थिति में अवंतिका की माँ को कोई कैसे समझा सकता है की अवंतिका जीवित है. उसे तो यही लगता है की उसकी पहली सन्तति जैसे यह भी मर गयी है और घरवाले बता रहे हैं  कि वह दूसरे हास्पिटल में है.

जब मैं अवंतिका को देखने गया तो तो सुन्दर सी अवंतिका के चहरे पर रोग के नहीं शान्ति के लक्षण  थे किन्तु वह आक्सीजन  पर जी रही थी.  बहत्तर घंटे बाद  ही वह अपने इस बंधन से मुक्ति पा सकी तबतक उसे पीलिया हो गया . दस बारह हजार रूपये खर्च हो जाने के बाद अवंतिका अपने प्रसन्न पिता कि गोद में सवार होकर अपनी जननी सेमिलने पहुंची किन्तु तबतक  भयाक्रांत माँ को बताया जाचुका था कि यह सन्तति आपकी होते हुए जी नहीं सकती अतः इसे बेंच दें. 

और अवंतिका हास्पिटल के दाई के हाथों दस रूपयें बिक गयी.

अवंतिका के माँ बाप किसी तरह से धन एकत्र किये थे कि इस द्वितीय प्रसव के समय सामान्य प्रसव और जिला चिकित्सालय का परित्याग कर दिया जायगा जिससे कि सन्तति की हानि न हो. प्रसव चिकित्सालय पैसा तो लेते हैं किन्तु सामान्य और आवश्यक सुविधाए नहीं प्रदान करते . माँ किसी और जगह और नवजात शिशु  कहीं और एक दडबे में . उस दडबे में दो शिशु और दोनों के अभिभावक  एक साथ  इन्फेक्शन की पूरी संभावना के साथ.

इस लोकतंत्र में अवंतिका के  पिता ऋण  लेकर यदि अवंतिका की जान बचानें के लिए दिन रात एक नहीं करते तो अवंतिका का क्या होता ? संसद में  केंद्र और राज्य लड़ते रहते हैं  . चिकित्सा की धन राशि लूटी जाती रहती है और हजारों अवन्तिकाएं मरती रहती हैं. 

हम किसी देश के कानून के अनुसार शिशुओं की देखरेख  न करने वाले माता पिता के लिए शोर मचा सकते हैं किन्तु अपने देश की प्रसूताओं और शिशुओं की रक्षा के उपाय नही कर सकते हैं .

क्या हम अवंतिका को कह सकते हैं कि अवंतिका तुम निश्चिन्त रहो हम तुम्हारे साथ हैं. 

नहीं अवंतिका नहीं हम तम्हे  कानून दे देगे- स्वास्थ्य  रक्षा का कानून , शिक्षा के अधिकार का कानून, दहेज  निरोध का कानून.

कानून और केवल  कानून.  और अवंतिका जब इस कानून को लागू कराने के लिए जब  तुम न्यायालय जाओगी तो हो सकता है कि तुम्हारे जीवन काल  में ही न्याय मिल जाए. न्यायालय  में लगने वाले समय पर तो फर्नीचर वाले टिकाऊ फर्नीचर का विज्ञापन करते हैं.