Friday, May 31, 2013

किसका वाद और किसका तंत्र

किसका वाद और किसका तंत्र
नमस्कार!

हालचाल ठीक ही है. तंत्र और वाद के संघर्ष में कुछ जीवन और गये. जिसके हाथ में बन्दूक हो या जिसकी सुरक्षा में बन्दूकधारी हों उसके मृत्यु की प्रायिकता सामान्य जन की अपेक्षा अधिक होती है. रक्तपात अच्छा तो कभी नहीं होता. किन्तु युद्ध में रक्तपात वीरता और शहादत मानी जाती है. इसलिये सैन्यबल, माओवादी और राजदल के सदस्य मरते हैं तो शहीद हैं और घायल हैं तो वीर हैं. किन्तु शहादत उसे ही मिलती है जिसके रक्तपात में केवल सैद्धान्तिक शत्रुता हो व्यक्तिगत स्वार्थ कहीं भी न हो. क्या ऐसा सम्भव है? इतिहास के पन्नों में इस तरह के युद्धों का विवरण मिलता है किन्तु बुद्धिमान लोग युद्ध और प्रेम में सब जायज है कहकर अपने कुकृत्यों का तर्कीकरण कर लेते हैं, विजयी होने पर करोडों खून माफ होते हैं.

भारत में कौन किस वाद का समर्थक है कहना दुष्कर है. किन्तु सरलता के दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि जो पचास प्रतिशत से अधिक दशाओं में जिस विचारधारा के निकट हो वह उस विचारधारा का है. और अधिक कसौटी खरी करें तो कह सकते हैं कि जसकी विचारधारा पन्चानबे प्रतिशत दशाओं में सही है वह व्यक्ति विचार के अनुसार व्यवहार कर रहा है.इससे अधिक प्रत्याशा नहीं की जा सकती है, शर्त यह है कि वह व्यक्ति जानबूझकर कोई त्रुटि नहीं कर रहा है.

भारत में जितने भी लोकतांत्रिक राजदल हैं उनमें से किसी भी दल में गुप्त मतदान द्वारा पारदर्शितापूर्ण निर्णय नहीं किया जाता है अतः उन्हें लोकतान्त्रिक दल कैसे कह सकते हैं . जब दल लोकतान्त्रिक नहीं हैं तो चुनाव और मतदान के आधार पर लोकतंत्र का नाम दे दिया गया है. मैं भी इसी तरह के लोगों में से ही हूं जो भारत को विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र कहते रहते हैं. भारत के मतदाताओं के लिये मतदाता पहचान पत्र का कार्यक्रम बहुत दिनों से चल रहा है, किन्तु विश्व के सबसे अधिक कम्प्यूटर ज्ञाताओं के देश में धुंधले चित्र,त्रृटिपूर्ण नाम पते वाले पहचान पत्रो की भरमार है. रंगीन फोटोयुक्त शुद्ध मतदाता पहचान पत्र  के अभाव में कितना विश्वास और कितना संदेह किया जा सकता है.

हमारे माननीय प्रत्याशी  के रूप में सेवा का अवसर मांगते हैं और माननीय बनते ही केवल मेवा की तलाश में लग जाते हैं, लाल बत्ती के वाहन के बिना जनसेवा हो ही नहीं पाती और लाल बत्ती की गाडी क्या से क्या बना देती है यह किसी को बताना नहीं है. गठबन्धन के नाम पर देश गिरवी रख दिया गया. दवा और अफीम की तस्करी तो समझ में आती है किन्तु पानी के जहाजों में भरकर खनिज पदार्थ शत्रु देशों को चले जाते हैं. फिर भी कानून व्यवस्था बनी रहती है. गरीब जनता माननीयों के आगे छोटे छोटे कामों के लिये आगे पीछे घूमती रहती है. नौकरी, स्थानान्तरण, ठीका, पट्टा आदि आदि के लिये मध्यवर्ग या खेतबेंचकर धन देनेवाले पीछे-पीछे घूमते हैं. और माननीय बडे घरानों को फंसाने के फिराक में रहते हैं. लाबीईस्ट लगे ही रहते हैं. 

हर राजदल चुनाव में असीमित धन खर्च करता है. सही हिसाब कोई नहीं देता किन्तु इसका प्रमाण नहीं है. चुनाव चन्दा चढावा के रूप नहीं आता उसे प्रच्छन्न बल कौशल से वसूला जाता है. सभी दल इसके लिये नाना प्रकार के हथकन्डे प्रयोग में लाते हैं किन्तु यह सभी कार्य करते हुये राजदल लोकतंत्र की सीमा में बने रहते हैं. राजदल हैं जहां  लोकतंत्र है वहा.

प्रत्येक सरकारी कार्यालय में आफिस आफिस होता रहता है. नजराना, शुकराना और जबराना हर जगह चलता है. हर आफिस, दूकान, मकान चौराहा, ट्रेन, बस, टैक्सी, गांव , मुहल्ला, शहर और महानगर. सडक से संसद तक इसकी जितनी चर्चा होती है उतनी तीब्र गति से वसूली में विकास होता है. यह विकास समावेशी होता है. इसे छोडकर भारत में और कहीं भी समावेशी विकास नहीं होता सिर्फ नारा दिया जाता है.

ऐसे लोकतंत्र में लोग बडी गम्भीरता से कह रहे हैं कि नक्सलवादी  अपनी विचारधारा से भटक गये हैं. आतंकवादी हो गये हैं. रंगदारी वसूलते हैं. उन्हें सबक सिखाना चाहिये. सैन्य अभियान चलाना चाहिये.

ऐसी स्थिति में जब हर जिम्मेदार सेवा के अधिकाधिक लोग भ्रष्टाचार, कदाचार पर उतारू हों. हर दूसरे की गलतियों को गिना रहे हों. और रात को चर्चा में मशगूल हो जाते हों कि किसने कितना किसतरह से कमाया और किस तरह से पचाया. 

ऐसी स्थिति में भारत में कौन सा तंत्र और कौन वाद कहां है ? एक अनुत्तरित प्रश्न जैसे मेरे समक्ष खडा है.






























Thursday, May 23, 2013

रिपोर्ट कार्ड

नमस्कार
हालचाल ठीक है. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भारत निर्माण कर रहे हैं. ्यह निर्माण उन्हें और कान्ग्रेसियों को ही दिखाई दे रहा है. इस समय कोई भी दल नहीं है जिसमें आन्तरिक लोकतन्त्र हो. सभी हर प्रकार से सामन्तवादी हैं. ये सारा दोष जनता पर थोप देने के लिये तैयार बैठे हैं.१९१४ में लोकसभा का आम चुनाव है. सभी दल अपनी सीट बढाने के तिकडमी कार्यक्रम पर जुटे हुये हैं . इस समय कान्ग्रेस चार वर्ष पूरे करने का समारोह कर रही है. मैं भी सोच रहा हूं कि इस सरकार ने भारत को और मुझे ऐसा क्या दिया है जिसके लिये इसकी सराहना करूं या उलाहना दूं.

अब भारत सरकार छ्ब्बीस जनवरी को राष्ट्र की प्रगति का लेखाजोखा न देकर सरकार के गठन के दिन को रिपोर्ट कार्ड का दिन मानती है और अपने को टापर बना देती है.नौ वर्षों से सोनिया और मनमोहन को छोडकर सभी अस्थिर रहे हैं. इन दोनों की प्रत्येक  गलती क्षम्य है.

राष्ट्रीय स्तर तथा अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार में प्रथम  स्थान दिया जा सकता है.
शासन के सन्चालन में बस पास भर किया जा सकता है.
मौन और धैर्य के लिये प्रथम स्थान दिया जा सकता है.
केवल भाजपा वाले मनमोहन जी को ईमानदार कहते रहे हैं क्योकि ये सदा से पूंजीपतियों के पक्षधर रहे हैं किन्तु अब वे भी बेईमान कहने लगे हैं. अतः बेईमानी में प्रथम श्रेणी प्रदान किया जा सकता है.
देश के भ्रष्टों को मनमोहन जी के कारण राहत, सूझ, और सहनशक्ति मिलती है अतः इन्हे माडल भ्रष्ट कहा जा सकता है.

Monday, May 13, 2013

मेला

नमस्कार !
हालचाल ठीक है .

बचपन में अक्षय तृतीया को सोहनाग का मेला करने ( मेला में जाने के लिए प्रयुक्त शब्द )गया था. परशुरामधाम  सोहनाग देवरिया जिले के सलेमपुर तहसील मुख्यालय से २-३  किमी दक्षिण स्थित है. उस समय मै प्राथमिक कक्षा के तीसरी या चौथी का विद्यार्थी था. मुझे कनिया (मेरी चचेरी दादी ) के साथ जाना था .कनिया को सभी लोग कनिया ही कहते थे . मरे गाँव से सोहनाग की दूरी लगभग तीन कोस या दस किमी है. अक्षय तृतीया मई महीने में पड़ती  है . देहात में तब मई महीना रबी के कृषि कार्य के बाद का काल होता था. प्राथमिक विद्यालय अभी चलते रहते थे. लू और गर्मी सहने की आदत भी थी. 

एकतीजिया (अक्षय तृतीया) के दिन बहुत सबेरे चलकर सूर्योदय तक सोहनाग पहुँच गए . वहां कमल (पुरइन ) के पत्तों से घिरा एक पोखरा दिखा जिसके चारो ओर लोग नहा रहे थे . हमलोग भी नहाए . आज के दृष्टिकोण से ओह नहाने लायक पानी नहीं था . किन्तु वहां सभीलोग नहाते रहे। कहते  रहे कि कनई (कीचड) हो गया है . लोग नहाते रहे. नहाने के बाद भगवान  परशुराम  का दर्शन कैसे किया यह तो याद नहीं किन्तु मानस पटल में मंदिर और पोखरे को जो चित्र  था वह कुछ वर्षों पूर्व धूल धूसरित हो गया . मंदिर के बगल का खँडहर  भी नहीं दिखा. 

मेले में नहाने के बाद जलपान के लिए तीसी के तेल की जलेबी मेले की सर्व प्रमुख आकर्षण थी  जो आज भी बनी हुई है. अब तीसी का तेल दुर्लभ हो गया है तब शोध हुआ है की दिल के रोगियों की दवा है तीसी. अब तो सबसे घटिया वनस्पति या किसी ऐसे  माध्यम में जलेबी बनती  है. जलेबी के साथ घर से लाया हुआ जलपान भी हुआ. जलपान से याद आया कि घर से जलपान, दान का सिद्धान्न (सीधा ) और दोपहर के लिए सत्तू भी साथ आया था. 

पोखरे के चारो ओर कई मदारी प्रदर्शन में जुटे थे . उसमे से एक बिच्छू की दवा बेंच रहा था . उसके पास बहुत से बिच्छू भी थे वह दवा का परीक्षण भी दिखाया फिर दवा बेचने लगा मैंने भी एक गोली खरीदी . उस गोली नुमा बूटी की विशेषता बतायी गयी थी की बिच्छू के डंक मारने पर उस दवा को पत्थर पर पानी के साथ रगडकर चिपकादेने पर वह  चिपक कर विष खीचने लगेगी और दर्द कम होने लगेगा . दर्द समाप्त हो जाने पर बूटी अलग हो जायेगी, धोकर रख देने पर पुन: कार्य करने लगेगी. मैंने भी वह बूटी खरीदवाया .

बहुत जल्दी ही धूप तेज होने लगी और लोग मेले से बाहर होने लगे . रास्ते में भिखारियों की लाइन लगी हुई थी जिसमे से अधिकाश कोढी थे. उस समय भी भिखारियों के विषय में जो चर्चा हो रही थी आज भी होती है . मेले में आने वाले लोगों की मनोवृत्ति की भी चर्चा हुई . शिव पार्वती की एक प्रचलित कथा के अनुसार बताया गया की जो जिस भावना से आया है उसे वही मिलेगा. 

आगे बढ़ने  पर एक बड़ा सा आम का बाग़ आया वहां कूआं था जिसपर कोई व्यक्ति ढेकुल से लगातार पानी चला रहा था .बहुत से लोग अपना लोटा और डोरी लेकर गए थे वे अपना पानी अपने ही भर लेते थे . कई लोग पनिसरा चला रहे थे . वे लोग बड़े से मिटटी के मटके में जल रखकर लोगों को बतासे के साथ पिलाते थे. बतासा अभी भी बचा हुआ है लेकिन हर सस्ती भारतीय मिठाई की तरह उपेक्षित है. इसमें मिलावट तो की ही नहीं जा सकती. तब केवल मापतौल में डंडीमारी (घटतौली )होती थी. 

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पवहारी महाराज का नाम बहु प्रचलित है. पैकौली में उनकी मूल कुटी है जहां का पक्का पोखरा देखने लायक है. इस क्षेत्र बहुत से लोग पवहारी महाराज के शिष्य हैं . उस बागीचे में उनकी जमात भी विश्राम कर रही थी. उनके चेले खलिहानी जौ , गेंहू या गोजई लेकर आते उन्हें देते और चरण स्पर्श करते. बहुत से लोग उसी दिन सिख (शिष्य) बन जाते. 

हम लोग भी गमछे में सत्तू सानकर  भरुआ मरिचा  और अचार से खाकर आगे चल दिये. अब धूप तेज हो गई थी . पैर जलने लगे थे. रास्ते के किनारे की घास खोज कर उसपर चल रहे थे. जहां बालू होता वहा दौड़ते हुये. छाया में रुकते हुए लगभग पांच बजे घर पहुँच गये. घर आने पर थाली में पर धोया गया . वह मेले का का अद्भुद आनंद वास्तव में पूरा वर्णित हो सकता. 

तब परशुराम जी राजनैतिक नहीं हुए थे. 

वर्तनी की अशुद्धियों केलिए क्षमा याचना सहित .

 नमस्कार !