किसका वाद और किसका तंत्र
नमस्कार!
हालचाल ठीक ही है. तंत्र और वाद के संघर्ष में कुछ जीवन और गये. जिसके हाथ में बन्दूक हो या जिसकी सुरक्षा में बन्दूकधारी हों उसके मृत्यु की प्रायिकता सामान्य जन की अपेक्षा अधिक होती है. रक्तपात अच्छा तो कभी नहीं होता. किन्तु युद्ध में रक्तपात वीरता और शहादत मानी जाती है. इसलिये सैन्यबल, माओवादी और राजदल के सदस्य मरते हैं तो शहीद हैं और घायल हैं तो वीर हैं. किन्तु शहादत उसे ही मिलती है जिसके रक्तपात में केवल सैद्धान्तिक शत्रुता हो व्यक्तिगत स्वार्थ कहीं भी न हो. क्या ऐसा सम्भव है? इतिहास के पन्नों में इस तरह के युद्धों का विवरण मिलता है किन्तु बुद्धिमान लोग युद्ध और प्रेम में सब जायज है कहकर अपने कुकृत्यों का तर्कीकरण कर लेते हैं, विजयी होने पर करोडों खून माफ होते हैं.
भारत में कौन किस वाद का समर्थक है कहना दुष्कर है. किन्तु सरलता के दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि जो पचास प्रतिशत से अधिक दशाओं में जिस विचारधारा के निकट हो वह उस विचारधारा का है. और अधिक कसौटी खरी करें तो कह सकते हैं कि जसकी विचारधारा पन्चानबे प्रतिशत दशाओं में सही है वह व्यक्ति विचार के अनुसार व्यवहार कर रहा है.इससे अधिक प्रत्याशा नहीं की जा सकती है, शर्त यह है कि वह व्यक्ति जानबूझकर कोई त्रुटि नहीं कर रहा है.
भारत में जितने भी लोकतांत्रिक राजदल हैं उनमें से किसी भी दल में गुप्त मतदान द्वारा पारदर्शितापूर्ण निर्णय नहीं किया जाता है अतः उन्हें लोकतान्त्रिक दल कैसे कह सकते हैं . जब दल लोकतान्त्रिक नहीं हैं तो चुनाव और मतदान के आधार पर लोकतंत्र का नाम दे दिया गया है. मैं भी इसी तरह के लोगों में से ही हूं जो भारत को विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र कहते रहते हैं. भारत के मतदाताओं के लिये मतदाता पहचान पत्र का कार्यक्रम बहुत दिनों से चल रहा है, किन्तु विश्व के सबसे अधिक कम्प्यूटर ज्ञाताओं के देश में धुंधले चित्र,त्रृटिपूर्ण नाम पते वाले पहचान पत्रो की भरमार है. रंगीन फोटोयुक्त शुद्ध मतदाता पहचान पत्र के अभाव में कितना विश्वास और कितना संदेह किया जा सकता है.
हमारे माननीय प्रत्याशी के रूप में सेवा का अवसर मांगते हैं और माननीय बनते ही केवल मेवा की तलाश में लग जाते हैं, लाल बत्ती के वाहन के बिना जनसेवा हो ही नहीं पाती और लाल बत्ती की गाडी क्या से क्या बना देती है यह किसी को बताना नहीं है. गठबन्धन के नाम पर देश गिरवी रख दिया गया. दवा और अफीम की तस्करी तो समझ में आती है किन्तु पानी के जहाजों में भरकर खनिज पदार्थ शत्रु देशों को चले जाते हैं. फिर भी कानून व्यवस्था बनी रहती है. गरीब जनता माननीयों के आगे छोटे छोटे कामों के लिये आगे पीछे घूमती रहती है. नौकरी, स्थानान्तरण, ठीका, पट्टा आदि आदि के लिये मध्यवर्ग या खेतबेंचकर धन देनेवाले पीछे-पीछे घूमते हैं. और माननीय बडे घरानों को फंसाने के फिराक में रहते हैं. लाबीईस्ट लगे ही रहते हैं.
हर राजदल चुनाव में असीमित धन खर्च करता है. सही हिसाब कोई नहीं देता किन्तु इसका प्रमाण नहीं है. चुनाव चन्दा चढावा के रूप नहीं आता उसे प्रच्छन्न बल कौशल से वसूला जाता है. सभी दल इसके लिये नाना प्रकार के हथकन्डे प्रयोग में लाते हैं किन्तु यह सभी कार्य करते हुये राजदल लोकतंत्र की सीमा में बने रहते हैं. राजदल हैं जहां लोकतंत्र है वहा.
प्रत्येक सरकारी कार्यालय में आफिस आफिस होता रहता है. नजराना, शुकराना और जबराना हर जगह चलता है. हर आफिस, दूकान, मकान चौराहा, ट्रेन, बस, टैक्सी, गांव , मुहल्ला, शहर और महानगर. सडक से संसद तक इसकी जितनी चर्चा होती है उतनी तीब्र गति से वसूली में विकास होता है. यह विकास समावेशी होता है. इसे छोडकर भारत में और कहीं भी समावेशी विकास नहीं होता सिर्फ नारा दिया जाता है.
ऐसे लोकतंत्र में लोग बडी गम्भीरता से कह रहे हैं कि नक्सलवादी अपनी विचारधारा से भटक गये हैं. आतंकवादी हो गये हैं. रंगदारी वसूलते हैं. उन्हें सबक सिखाना चाहिये. सैन्य अभियान चलाना चाहिये.
ऐसी स्थिति में जब हर जिम्मेदार सेवा के अधिकाधिक लोग भ्रष्टाचार, कदाचार पर उतारू हों. हर दूसरे की गलतियों को गिना रहे हों. और रात को चर्चा में मशगूल हो जाते हों कि किसने कितना किसतरह से कमाया और किस तरह से पचाया.
ऐसी स्थिति में भारत में कौन सा तंत्र और कौन वाद कहां है ? एक अनुत्तरित प्रश्न जैसे मेरे समक्ष खडा है.
No comments:
Post a Comment