नमस्कार !
हालचाल ठीक है .
बचपन में अक्षय तृतीया को सोहनाग का मेला करने ( मेला में जाने के लिए प्रयुक्त शब्द )गया था. परशुरामधाम सोहनाग देवरिया जिले के सलेमपुर तहसील मुख्यालय से २-३ किमी दक्षिण स्थित है. उस समय मै प्राथमिक कक्षा के तीसरी या चौथी का विद्यार्थी था. मुझे कनिया (मेरी चचेरी दादी ) के साथ जाना था .कनिया को सभी लोग कनिया ही कहते थे . मरे गाँव से सोहनाग की दूरी लगभग तीन कोस या दस किमी है. अक्षय तृतीया मई महीने में पड़ती है . देहात में तब मई महीना रबी के कृषि कार्य के बाद का काल होता था. प्राथमिक विद्यालय अभी चलते रहते थे. लू और गर्मी सहने की आदत भी थी.
एकतीजिया (अक्षय तृतीया) के दिन बहुत सबेरे चलकर सूर्योदय तक सोहनाग पहुँच गए . वहां कमल (पुरइन ) के पत्तों से घिरा एक पोखरा दिखा जिसके चारो ओर लोग नहा रहे थे . हमलोग भी नहाए . आज के दृष्टिकोण से ओह नहाने लायक पानी नहीं था . किन्तु वहां सभीलोग नहाते रहे। कहते रहे कि कनई (कीचड) हो गया है . लोग नहाते रहे. नहाने के बाद भगवान परशुराम का दर्शन कैसे किया यह तो याद नहीं किन्तु मानस पटल में मंदिर और पोखरे को जो चित्र था वह कुछ वर्षों पूर्व धूल धूसरित हो गया . मंदिर के बगल का खँडहर भी नहीं दिखा.
मेले में नहाने के बाद जलपान के लिए तीसी के तेल की जलेबी मेले की सर्व प्रमुख आकर्षण थी जो आज भी बनी हुई है. अब तीसी का तेल दुर्लभ हो गया है तब शोध हुआ है की दिल के रोगियों की दवा है तीसी. अब तो सबसे घटिया वनस्पति या किसी ऐसे माध्यम में जलेबी बनती है. जलेबी के साथ घर से लाया हुआ जलपान भी हुआ. जलपान से याद आया कि घर से जलपान, दान का सिद्धान्न (सीधा ) और दोपहर के लिए सत्तू भी साथ आया था.
पोखरे के चारो ओर कई मदारी प्रदर्शन में जुटे थे . उसमे से एक बिच्छू की दवा बेंच रहा था . उसके पास बहुत से बिच्छू भी थे वह दवा का परीक्षण भी दिखाया फिर दवा बेचने लगा मैंने भी एक गोली खरीदी . उस गोली नुमा बूटी की विशेषता बतायी गयी थी की बिच्छू के डंक मारने पर उस दवा को पत्थर पर पानी के साथ रगडकर चिपकादेने पर वह चिपक कर विष खीचने लगेगी और दर्द कम होने लगेगा . दर्द समाप्त हो जाने पर बूटी अलग हो जायेगी, धोकर रख देने पर पुन: कार्य करने लगेगी. मैंने भी वह बूटी खरीदवाया .
बहुत जल्दी ही धूप तेज होने लगी और लोग मेले से बाहर होने लगे . रास्ते में भिखारियों की लाइन लगी हुई थी जिसमे से अधिकाश कोढी थे. उस समय भी भिखारियों के विषय में जो चर्चा हो रही थी आज भी होती है . मेले में आने वाले लोगों की मनोवृत्ति की भी चर्चा हुई . शिव पार्वती की एक प्रचलित कथा के अनुसार बताया गया की जो जिस भावना से आया है उसे वही मिलेगा.
आगे बढ़ने पर एक बड़ा सा आम का बाग़ आया वहां कूआं था जिसपर कोई व्यक्ति ढेकुल से लगातार पानी चला रहा था .बहुत से लोग अपना लोटा और डोरी लेकर गए थे वे अपना पानी अपने ही भर लेते थे . कई लोग पनिसरा चला रहे थे . वे लोग बड़े से मिटटी के मटके में जल रखकर लोगों को बतासे के साथ पिलाते थे. बतासा अभी भी बचा हुआ है लेकिन हर सस्ती भारतीय मिठाई की तरह उपेक्षित है. इसमें मिलावट तो की ही नहीं जा सकती. तब केवल मापतौल में डंडीमारी (घटतौली )होती थी.
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पवहारी महाराज का नाम बहु प्रचलित है. पैकौली में उनकी मूल कुटी है जहां का पक्का पोखरा देखने लायक है. इस क्षेत्र बहुत से लोग पवहारी महाराज के शिष्य हैं . उस बागीचे में उनकी जमात भी विश्राम कर रही थी. उनके चेले खलिहानी जौ , गेंहू या गोजई लेकर आते उन्हें देते और चरण स्पर्श करते. बहुत से लोग उसी दिन सिख (शिष्य) बन जाते.
हम लोग भी गमछे में सत्तू सानकर भरुआ मरिचा और अचार से खाकर आगे चल दिये. अब धूप तेज हो गई थी . पैर जलने लगे थे. रास्ते के किनारे की घास खोज कर उसपर चल रहे थे. जहां बालू होता वहा दौड़ते हुये. छाया में रुकते हुए लगभग पांच बजे घर पहुँच गये. घर आने पर थाली में पर धोया गया . वह मेले का का अद्भुद आनंद वास्तव में पूरा वर्णित हो सकता.
तब परशुराम जी राजनैतिक नहीं हुए थे.
वर्तनी की अशुद्धियों केलिए क्षमा याचना सहित .
नमस्कार !
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