शहर से शिक्षा
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जिसे गुलाबी जाड़ा कहते हैं अब बीत गया. अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा -२०१४ पथ पर है. बाल दिवस बीत गया. फोकस मे नेहरू और मोदी आ गये हैं. आज भारत मे लोकतंत्र को सशक्त बनाने, सभी भारतीयों के जीवन सतर को जीने लायक बनाने के लिये आवश्यकताओं को क्रम से रखने में सबसे पहले तो बालक ही आयेंगे. उन्हें स्वस्थ और शिक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लोकतंत्र में सरकार जनता के धन से व्यवस्था करने का कार्य करती है किन्तु सरकार की प्राथमिकता में राजदल को सत्ता में बनाये रखना पहली प्राथमिकता हो जाती है इसके लिये जनता के धन को पानी जैसे बहा दिया जाता है. सत्ता सुख सदा बना रहे इसके लिये आगे के लिये आय के स्रोत बनाने के लिये तमाम तरह के कार्य किये जाते हैं. जनता एक सीमा तक इसे उचित मानने के लिये विवश भी है और विवशता में कुछ खुर्चन पाकर संतुष्ट हो जाती है.
नवम्बर २०१४ की "कादम्बिनी " सामने है...क्योंकि शहर एक सपना है यही प्रतिपाद्य है इस अंक का. जुलाई अगस्त में कई शहरों को देखने का अवसर मिला. गांव में जन्म हुआ. तब गांव में प्रसव कराने के लिये, हल चलाने वाले की पत्नी या मां आती थी. हल्दी, बीरो, दूध और मालिश के सहारे जच्चा बच्चा रहते थे. स्कूल जाने का समय आया तो गांव की जिला परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय मिला. मिट्टी की दीवार का खपरैल विद्यालय लगभग गिर चुका था. किन्तु हर कक्षा के लिये एक अध्यापक थे. प्रधानाध्यापक पंडित राज किशोर तिवारी ठीक समय पर विद्यालय पहुंच जाते थे. पेंड़ों के नीचे कक्षायें चल जाती थीं एक पक्का कुआं भी था. पीटी भी होती थी और शनिवार को बालसभा भी. इस लिहाज से मैं एक गंवार आदमी हूं. तमाम विद्वानों के अनुसार मुझे उसी गांव में बने रहना चाहिये था. मेरे पिताजी जिन्हें मैं बाबूजी कहता था नौकरी तो बाहर करते थे किन्तु गांव में ही रहना चाहते थे. यहां तक कि जब देवरिया में नई कालोनी बस रही थी तो मित्रों द्वारा जमीन लेने के सलाह को ठुकारा दिये और उन लोगों के जमीन लेने के निर्णय की आलोचना भी करते थे. किन्तु १९८१ में उन्होंने देवरिया नगरपालिका क्षेत्र में जमीन लेकर आवास बनवा लिया. इस प्रकार मैं नगरवासी बन गया.
देवरिया नगर भी कई गांवों से मिलकर बना है और लगातार विस्तृत होता जा रहा है. हर कस्बा, नगर और महानगर लगातार बढ़ रहा है. अनियोजित ढंग से बढ़ रहा है. नगर का बढ़ना विकास की परिभाषा में भी आता है. गांव में रहकर कौन गंवार बना रहना चाहेगा. यह अवश्य है कि अनियोजित विस्तार के कारण महानगर भी नरक बन चुके हैं इसके लिये सारा दोष दूसरे प्रदेशों से आये कामगारों को दिया जाता है.
मैं अपनी बात स्पष्ट करने के लिये गाजियाबाद के वसुन्धरा कालोनी को लेता हूं जहां अगस्त में एक सप्ताह रहने का अवसर मिला. सड़क, फुटपाथ, और नाली सार्वजनिक ही बन सकती है और उसे साफ करने का उपाय भी सार्वजनिक ही हो सकता है. इस कार्य को संपन्न करने के लिये नगरपालिका ही जिम्मेदार है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिये. वसुन्धरा में मुझे यह देखने को नहीं मिला. जो लोग भी रहते हैं उनकी तमाम आवश्यकतायें होती है. उन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग कहां रहेंगे इसके बारे में योजनाकारों ने नहीं सोचा. घरेलू सहायिका, परिधानशिल्पी, परिधानसंरक्षी, आटोचालक, सुरक्षाकर्मी, वाहनचालक, जलसंसाधन संरक्षक, विद्युत संरक्षक, आदि आदि के लिये भी वास स्थान बनना चाहिये था , नहीं बना तो आधारभूत काम करनेवाले झुग्गियों में रहते हैं. वे उतना अपराध नहीं करते जितना ह्वाइट कालर क्राइम होता है. वे नाली में नहा लेते हैं, कूड़े में रह लेते हैं ताकि कालोनी वाले सुख से जी सकें.
स्मार्ट सिटी चर्चा में है. धनी लोग उसमें रहेंगे सब कुछ स्मार्ट होगा लेकिन रहेगा तो आदमी ही. उसे सेवक चाहिये, अत्यधिक उत्पादित कचरा को किनारे लगाने वाले लोग चाहिये.
शहर में लोग व्यस्त हैं क्योंकि कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये चार घंटे से अधिक समय चाहिये. हर कार्यालय, और उत्पाद्शाला तथा कार्यशाला आदि में कार्य करनेवाले यदि अपने कार्यस्थल के बिल्कुल समीप रहें तो आवागमन और जाम की समस्या से मुक्ति मिल सकती है. राजदल के लोग चुनाव के समय हर आवश्यक नियम को अपने सत्तासुख के लिये समाप्त करने का काम छोड़ दें तो हर नगर और गांव तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा. किसी कानून को बदलने के लिये लोगों को जीवन का बलिदान करना पड़ता है, तब भी नहीं बदलता किन्तु वोटबैंक के लिये सब खतम.
इन कालोनियों मे शिक्षा और शिक्षालय के लिये कोई सुविचारित और नियोजित व्यवस्था नहीं है. पक्के मकानों में रहनेवाले प्रतियोगिता में अपनी जेबे ढीली करते रहते हैं. प्राथमिक विद्यालयों की सूचना पुस्तिकायें पांच सौ , हजार की मिलती हैं किन्तु उनसे यह पता नहीं चलता कि वहां के शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं या नहीं. पचास हजार से लाख रूपये वार्षिक खर्च कर माता पिता रोज होमवर्क कराने को बाध्य हो जाते हैं या ट्यूशन का सहारा ले लेते हैं. बच्चे वाहनों से विद्यालय जाते हैं और आते हैं. पूरब वाले पश्चिम और पश्चिम वाले पूरब जाते हैं.
यदि सभी के लिये एक समान पाठ्यक्रम, शिक्षालय ,शिक्षक की व्यवस्था हो तो नौनिहाल बस्ते के बोझ से दबने से और अभिभावक शुल्क के बोझ से दबने से बच जायेंगे. सरकार शिक्षा उपकर वसूल लेती है किन्तु शिक्षा क्षेत्र की सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेने से बच जाती है. भारत के नब्बे प्रतिशत लोग इस शिक्षा को असहायता में झेल रहे हैं क्योंकि वे जिन्हें अपना प्रतिनिधि समझते हैं वे किसी राजदल के नेता के आगे नतमस्तक हैं और वह नेता पूंजी पतियों की बात मानने को मजबूर है. हमारे जैसे लोग हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलते रहत हैं. इसका कुफल हमारे नौनिहाल भुगत रहे हैं.
इसलिये हमें केजी से पीजी तक के लिये निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था को को हर गांव, कस्बा, नगर तथा महानगर तक प्रसारित करना होगा. इसके लिये अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा-२०१४ से जुड़िये और विमर्श कीजिये तथा वह करने का प्रयास कीजिये जिससे हर सपने को आसमान मिले.
सुझाव दीजिये.
नमस्कार.
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जिसे गुलाबी जाड़ा कहते हैं अब बीत गया. अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा -२०१४ पथ पर है. बाल दिवस बीत गया. फोकस मे नेहरू और मोदी आ गये हैं. आज भारत मे लोकतंत्र को सशक्त बनाने, सभी भारतीयों के जीवन सतर को जीने लायक बनाने के लिये आवश्यकताओं को क्रम से रखने में सबसे पहले तो बालक ही आयेंगे. उन्हें स्वस्थ और शिक्षित बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लोकतंत्र में सरकार जनता के धन से व्यवस्था करने का कार्य करती है किन्तु सरकार की प्राथमिकता में राजदल को सत्ता में बनाये रखना पहली प्राथमिकता हो जाती है इसके लिये जनता के धन को पानी जैसे बहा दिया जाता है. सत्ता सुख सदा बना रहे इसके लिये आगे के लिये आय के स्रोत बनाने के लिये तमाम तरह के कार्य किये जाते हैं. जनता एक सीमा तक इसे उचित मानने के लिये विवश भी है और विवशता में कुछ खुर्चन पाकर संतुष्ट हो जाती है.
नवम्बर २०१४ की "कादम्बिनी " सामने है...क्योंकि शहर एक सपना है यही प्रतिपाद्य है इस अंक का. जुलाई अगस्त में कई शहरों को देखने का अवसर मिला. गांव में जन्म हुआ. तब गांव में प्रसव कराने के लिये, हल चलाने वाले की पत्नी या मां आती थी. हल्दी, बीरो, दूध और मालिश के सहारे जच्चा बच्चा रहते थे. स्कूल जाने का समय आया तो गांव की जिला परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय मिला. मिट्टी की दीवार का खपरैल विद्यालय लगभग गिर चुका था. किन्तु हर कक्षा के लिये एक अध्यापक थे. प्रधानाध्यापक पंडित राज किशोर तिवारी ठीक समय पर विद्यालय पहुंच जाते थे. पेंड़ों के नीचे कक्षायें चल जाती थीं एक पक्का कुआं भी था. पीटी भी होती थी और शनिवार को बालसभा भी. इस लिहाज से मैं एक गंवार आदमी हूं. तमाम विद्वानों के अनुसार मुझे उसी गांव में बने रहना चाहिये था. मेरे पिताजी जिन्हें मैं बाबूजी कहता था नौकरी तो बाहर करते थे किन्तु गांव में ही रहना चाहते थे. यहां तक कि जब देवरिया में नई कालोनी बस रही थी तो मित्रों द्वारा जमीन लेने के सलाह को ठुकारा दिये और उन लोगों के जमीन लेने के निर्णय की आलोचना भी करते थे. किन्तु १९८१ में उन्होंने देवरिया नगरपालिका क्षेत्र में जमीन लेकर आवास बनवा लिया. इस प्रकार मैं नगरवासी बन गया.
देवरिया नगर भी कई गांवों से मिलकर बना है और लगातार विस्तृत होता जा रहा है. हर कस्बा, नगर और महानगर लगातार बढ़ रहा है. अनियोजित ढंग से बढ़ रहा है. नगर का बढ़ना विकास की परिभाषा में भी आता है. गांव में रहकर कौन गंवार बना रहना चाहेगा. यह अवश्य है कि अनियोजित विस्तार के कारण महानगर भी नरक बन चुके हैं इसके लिये सारा दोष दूसरे प्रदेशों से आये कामगारों को दिया जाता है.
मैं अपनी बात स्पष्ट करने के लिये गाजियाबाद के वसुन्धरा कालोनी को लेता हूं जहां अगस्त में एक सप्ताह रहने का अवसर मिला. सड़क, फुटपाथ, और नाली सार्वजनिक ही बन सकती है और उसे साफ करने का उपाय भी सार्वजनिक ही हो सकता है. इस कार्य को संपन्न करने के लिये नगरपालिका ही जिम्मेदार है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिये. वसुन्धरा में मुझे यह देखने को नहीं मिला. जो लोग भी रहते हैं उनकी तमाम आवश्यकतायें होती है. उन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग कहां रहेंगे इसके बारे में योजनाकारों ने नहीं सोचा. घरेलू सहायिका, परिधानशिल्पी, परिधानसंरक्षी, आटोचालक, सुरक्षाकर्मी, वाहनचालक, जलसंसाधन संरक्षक, विद्युत संरक्षक, आदि आदि के लिये भी वास स्थान बनना चाहिये था , नहीं बना तो आधारभूत काम करनेवाले झुग्गियों में रहते हैं. वे उतना अपराध नहीं करते जितना ह्वाइट कालर क्राइम होता है. वे नाली में नहा लेते हैं, कूड़े में रह लेते हैं ताकि कालोनी वाले सुख से जी सकें.
स्मार्ट सिटी चर्चा में है. धनी लोग उसमें रहेंगे सब कुछ स्मार्ट होगा लेकिन रहेगा तो आदमी ही. उसे सेवक चाहिये, अत्यधिक उत्पादित कचरा को किनारे लगाने वाले लोग चाहिये.
शहर में लोग व्यस्त हैं क्योंकि कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये चार घंटे से अधिक समय चाहिये. हर कार्यालय, और उत्पाद्शाला तथा कार्यशाला आदि में कार्य करनेवाले यदि अपने कार्यस्थल के बिल्कुल समीप रहें तो आवागमन और जाम की समस्या से मुक्ति मिल सकती है. राजदल के लोग चुनाव के समय हर आवश्यक नियम को अपने सत्तासुख के लिये समाप्त करने का काम छोड़ दें तो हर नगर और गांव तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा. किसी कानून को बदलने के लिये लोगों को जीवन का बलिदान करना पड़ता है, तब भी नहीं बदलता किन्तु वोटबैंक के लिये सब खतम.
इन कालोनियों मे शिक्षा और शिक्षालय के लिये कोई सुविचारित और नियोजित व्यवस्था नहीं है. पक्के मकानों में रहनेवाले प्रतियोगिता में अपनी जेबे ढीली करते रहते हैं. प्राथमिक विद्यालयों की सूचना पुस्तिकायें पांच सौ , हजार की मिलती हैं किन्तु उनसे यह पता नहीं चलता कि वहां के शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं या नहीं. पचास हजार से लाख रूपये वार्षिक खर्च कर माता पिता रोज होमवर्क कराने को बाध्य हो जाते हैं या ट्यूशन का सहारा ले लेते हैं. बच्चे वाहनों से विद्यालय जाते हैं और आते हैं. पूरब वाले पश्चिम और पश्चिम वाले पूरब जाते हैं.
यदि सभी के लिये एक समान पाठ्यक्रम, शिक्षालय ,शिक्षक की व्यवस्था हो तो नौनिहाल बस्ते के बोझ से दबने से और अभिभावक शुल्क के बोझ से दबने से बच जायेंगे. सरकार शिक्षा उपकर वसूल लेती है किन्तु शिक्षा क्षेत्र की सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेने से बच जाती है. भारत के नब्बे प्रतिशत लोग इस शिक्षा को असहायता में झेल रहे हैं क्योंकि वे जिन्हें अपना प्रतिनिधि समझते हैं वे किसी राजदल के नेता के आगे नतमस्तक हैं और वह नेता पूंजी पतियों की बात मानने को मजबूर है. हमारे जैसे लोग हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलते रहत हैं. इसका कुफल हमारे नौनिहाल भुगत रहे हैं.
इसलिये हमें केजी से पीजी तक के लिये निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था को को हर गांव, कस्बा, नगर तथा महानगर तक प्रसारित करना होगा. इसके लिये अखिल भारतीय शिक्षा संघर्ष यात्रा-२०१४ से जुड़िये और विमर्श कीजिये तथा वह करने का प्रयास कीजिये जिससे हर सपने को आसमान मिले.
सुझाव दीजिये.
नमस्कार.
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