लोकतंत्रः आकाश कुसुम
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जबसे आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी की बैठक हुई तबसे भारत के लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकलाप सामने आते चले जा रहे हैं और मन में यह बात बैठती जा रही है कि भारतीय जनमानस में लोकतंत्र व्यवहार से बहुत दूर है. हम लोकतंत्र के मूल्यों को आत्मसात ही नहीं कर पाये हैं.
छोटी या बड़ी कोई भी लोकतांत्रिक संस्था प्रारम्भ से ही व्यक्तिवाद से ग्रस्त हो जाती है और हम अभिभूत हो चरणवन्दना में लग जाते हैं और तब तक लगे रहते हैं जबतक व्यक्तिगत हानि नहीं हो जाती है. छोटी संस्थाओं में सर्वमत से प्रस्ताव पारित होते रहते हैं क्योंकि एक व्यक्ति को छोड़कर अन्य को उससे प्रायः कोई मतलब ही नहीं होता है.
हमारी सबसे बड़ी संस्था में सांसद कितनी बार अपने विवेक के आधार पर अपना मत देता है. हमारे जन प्रतिनिधि को सभी बिलों के बारे में बोलने का अवसर भी नहीं मिलता है. सामान्यतः वह राजदल के लिये एक मत बनकर जाता है. निर्णय तो राजदल के सुप्रीमों तय किये रहते हैं.
प्रत्येक राजदल कुछ विशिष्ट सदस्यों को आजीवन अभिजात्य बना देता है. कुछ लोग नया दल बना लेते हैं आजीवन उसको चलाते हैं उसके बाद उनकी संततियां उसपर अधिकार प्राप्त कर ले ती हैं. जहां ऐसा नहीं होता वहां भी राजदल के निर्णय गुप्त मतदान द्वारा नहीं होते.
आम आदमी पार्टी के गठन के साथ यह विश्वास बन गया कि यह राजदल लोकतंत्र के हर कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करेगा किन्तु शीघ्र ही यह अरविन्द और दिल्ली के विधायकों द्वारा स्थापित कसौटी की ओर चलने लगा. आज अरविन्द केजरीवाल यह मान रहे हैं कि मात्र उन्हीं के कारण यह दल बन गया. अब उनको यह नहीं याद आ रहा है कि पता नहीं कितनों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.
समता, वन्धुता और वस्तुनिष्ठता के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता. जबतक ऐसा नहीं होता तबतक और चाहे जो कुछ हो लोकतंत्र नहीं हो सकता.
१४ अप्रैल को कुछ लोग लोकतंत्र के बुझे हुये दीप को पुनः जलाने जा रहे हैं. उन्हें सफलता मिले. उसमें आनंद कुमार और योगेन्द्र भी होंगे. उनसे निवेदन है कि समाजमिति विधि से कार्यसमिति का चयन करें. एक प्रयोग इस विधि का भी होना चाहिये.
नमस्कार.
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. जबसे आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी की बैठक हुई तबसे भारत के लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकलाप सामने आते चले जा रहे हैं और मन में यह बात बैठती जा रही है कि भारतीय जनमानस में लोकतंत्र व्यवहार से बहुत दूर है. हम लोकतंत्र के मूल्यों को आत्मसात ही नहीं कर पाये हैं.
छोटी या बड़ी कोई भी लोकतांत्रिक संस्था प्रारम्भ से ही व्यक्तिवाद से ग्रस्त हो जाती है और हम अभिभूत हो चरणवन्दना में लग जाते हैं और तब तक लगे रहते हैं जबतक व्यक्तिगत हानि नहीं हो जाती है. छोटी संस्थाओं में सर्वमत से प्रस्ताव पारित होते रहते हैं क्योंकि एक व्यक्ति को छोड़कर अन्य को उससे प्रायः कोई मतलब ही नहीं होता है.
हमारी सबसे बड़ी संस्था में सांसद कितनी बार अपने विवेक के आधार पर अपना मत देता है. हमारे जन प्रतिनिधि को सभी बिलों के बारे में बोलने का अवसर भी नहीं मिलता है. सामान्यतः वह राजदल के लिये एक मत बनकर जाता है. निर्णय तो राजदल के सुप्रीमों तय किये रहते हैं.
प्रत्येक राजदल कुछ विशिष्ट सदस्यों को आजीवन अभिजात्य बना देता है. कुछ लोग नया दल बना लेते हैं आजीवन उसको चलाते हैं उसके बाद उनकी संततियां उसपर अधिकार प्राप्त कर ले ती हैं. जहां ऐसा नहीं होता वहां भी राजदल के निर्णय गुप्त मतदान द्वारा नहीं होते.
आम आदमी पार्टी के गठन के साथ यह विश्वास बन गया कि यह राजदल लोकतंत्र के हर कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करेगा किन्तु शीघ्र ही यह अरविन्द और दिल्ली के विधायकों द्वारा स्थापित कसौटी की ओर चलने लगा. आज अरविन्द केजरीवाल यह मान रहे हैं कि मात्र उन्हीं के कारण यह दल बन गया. अब उनको यह नहीं याद आ रहा है कि पता नहीं कितनों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.
समता, वन्धुता और वस्तुनिष्ठता के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता. जबतक ऐसा नहीं होता तबतक और चाहे जो कुछ हो लोकतंत्र नहीं हो सकता.
१४ अप्रैल को कुछ लोग लोकतंत्र के बुझे हुये दीप को पुनः जलाने जा रहे हैं. उन्हें सफलता मिले. उसमें आनंद कुमार और योगेन्द्र भी होंगे. उनसे निवेदन है कि समाजमिति विधि से कार्यसमिति का चयन करें. एक प्रयोग इस विधि का भी होना चाहिये.
नमस्कार.
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