फुटपाथ
नमस्कार!
क्या हालचाल है?
क्या यह विष्मय की बात नहीं है कि फुटपाथ जैसी उपेक्षित चीज भी किसी सभ्यता या देश के सभ्य होने का सूचकहै। यहीं पर प्रश्न उठाता है कि सभ्य होने और विकसित होने में अन्तर है अथवा नहीं? यह वादविवाद का विषय है। मैं यहाँ पर इस विवाद में पड़ना भी नहीं चाहता हूँ। वैसे भी आजकल विकास के आगे सभ्यता को कौन पूछता है। तथ्य न होने पर भी मान लिया गया है कि जो जितना ही विकसित है उतना ही सभ्य भी है। सभ्यता और विकासकी बात को छोड़कर आइए फुटपाथ की ओर चलें।
वास्तव में फुटपाथ सभ्य होने का सूचक हो न हो विकसित होने का सूचक अवश्य है। बिना फुटपाथ वाली सड़क परबाइक , साइकिल या पैदल चलते हुए चारपहिया वाहनों के आने पर पूरी सड़क उन्हीं के हवाले कर ही देना पड़ता हैयदि आपने ऐसा नहीं किया तो आपका जीवन खतरे में पड़ सकता है अथवा दो चार गालियों से दो चार होना पड़सकता है।अपने महान भारत देश में नगरों में फुटपाथ सहित सडकों का अभाव भी है और चलन भी नहीं है। महामहानगरों में सडकों के किनारे फुटपाथ होते तो जरूर हैं पर उनकी हालत उतनी ठीक नहीं है जीतनी होनी चाहिए। बी और सी श्रेणी के शहरों में फुटपाथ नाम मात्र के होते हैं। वहाँ पर इतनी ही चौड़ी जगह उपलब्ध होती है कि मुख्य सड़क ही फुटपाथ जितनी चौड़ी बन पाती है। दूसरे जहाँ चौड़ी सड़क बनाने कि जगह होती है वहाँ सड़कबनाने भर का धन ही मुहैया हो पाता है। जनता सड़क देखकर ही निहाल हो जाती है फुटपाथ की कौन सोचे?
महा महानगरों की यातायात समस्या का निवारण फ्लाईओवर बनवाने की अपेक्षा फुटपाथों की ओर ध्यान देने सेही सुलझेगी। अभी भी कहीं पर भी चाहे नगर हो महानगर हो चाहे ग्राम पैदल चलने वालों की संख्या सबसे अधिकहै, उसके बाद आते हैं साइकिल वाले फिर मोटरसाइकिल वाले तब आते हैं कार वाले।
अभी हाल ही में बीस नवम्बर को अंग्रेजी दैनिक "द हिन्दू" के आखिरी पन्ने पर एक रोचक तथा उपयोगी समाचार छपा है। उस समाचार को देखकर मुझे अपनी समस्या याद आ गयी। काश हमारे महान भारत के नगर विकास केनीति नियामक तथा लोक निर्माण विभाग के नीति नियामक इस समाचार के मर्म को समझते हुए योजनाएंबनाएंगे। नयी बन रही स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क पर साइकिल चालाक तथा पदयात्री उसी प्रकार सुख से यात्रा करसकेंगे जिस प्रकार कार वाले यात्रा करते हैं।
नमस्कार !
फिर मिलेंगे।
क्या हालचाल है?
क्या यह विष्मय की बात नहीं है कि फुटपाथ जैसी उपेक्षित चीज भी किसी सभ्यता या देश के सभ्य होने का सूचकहै। यहीं पर प्रश्न उठाता है कि सभ्य होने और विकसित होने में अन्तर है अथवा नहीं? यह वादविवाद का विषय है। मैं यहाँ पर इस विवाद में पड़ना भी नहीं चाहता हूँ। वैसे भी आजकल विकास के आगे सभ्यता को कौन पूछता है। तथ्य न होने पर भी मान लिया गया है कि जो जितना ही विकसित है उतना ही सभ्य भी है। सभ्यता और विकासकी बात को छोड़कर आइए फुटपाथ की ओर चलें।
वास्तव में फुटपाथ सभ्य होने का सूचक हो न हो विकसित होने का सूचक अवश्य है। बिना फुटपाथ वाली सड़क परबाइक , साइकिल या पैदल चलते हुए चारपहिया वाहनों के आने पर पूरी सड़क उन्हीं के हवाले कर ही देना पड़ता हैयदि आपने ऐसा नहीं किया तो आपका जीवन खतरे में पड़ सकता है अथवा दो चार गालियों से दो चार होना पड़सकता है।अपने महान भारत देश में नगरों में फुटपाथ सहित सडकों का अभाव भी है और चलन भी नहीं है। महामहानगरों में सडकों के किनारे फुटपाथ होते तो जरूर हैं पर उनकी हालत उतनी ठीक नहीं है जीतनी होनी चाहिए। बी और सी श्रेणी के शहरों में फुटपाथ नाम मात्र के होते हैं। वहाँ पर इतनी ही चौड़ी जगह उपलब्ध होती है कि मुख्य सड़क ही फुटपाथ जितनी चौड़ी बन पाती है। दूसरे जहाँ चौड़ी सड़क बनाने कि जगह होती है वहाँ सड़कबनाने भर का धन ही मुहैया हो पाता है। जनता सड़क देखकर ही निहाल हो जाती है फुटपाथ की कौन सोचे?
महा महानगरों की यातायात समस्या का निवारण फ्लाईओवर बनवाने की अपेक्षा फुटपाथों की ओर ध्यान देने सेही सुलझेगी। अभी भी कहीं पर भी चाहे नगर हो महानगर हो चाहे ग्राम पैदल चलने वालों की संख्या सबसे अधिकहै, उसके बाद आते हैं साइकिल वाले फिर मोटरसाइकिल वाले तब आते हैं कार वाले।
अभी हाल ही में बीस नवम्बर को अंग्रेजी दैनिक "द हिन्दू" के आखिरी पन्ने पर एक रोचक तथा उपयोगी समाचार छपा है। उस समाचार को देखकर मुझे अपनी समस्या याद आ गयी। काश हमारे महान भारत के नगर विकास केनीति नियामक तथा लोक निर्माण विभाग के नीति नियामक इस समाचार के मर्म को समझते हुए योजनाएंबनाएंगे। नयी बन रही स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क पर साइकिल चालाक तथा पदयात्री उसी प्रकार सुख से यात्रा करसकेंगे जिस प्रकार कार वाले यात्रा करते हैं।
नमस्कार !
फिर मिलेंगे।
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