Wednesday, May 28, 2014

दो प्रधानमंत्री

नमस्कार!
हाल चाल ठीक है. रोहिणी नक्षत्र की वर्षा ने किसानों मे भी खुशी बांटा और शहरी बाबुओं को भी राहत दिया. रोहिनियां आम अब अधिक मीठे लगेंगे. बाकी आम भी  जल्दी पकेंगे और मीठे भी लगेंगे. लगन का मौसम है ,पकवानों का जोर है. खानेवाले जुटे हुये हैं.
इसी तरह के मौसम में २७ मई, १९६४ को गांव के पडोस में तिलक समारोह था. लाउडस्पीकर पर गाना चल रहा था. बच्चे से बूढे तक जुटे थे. किसी ने आकर बताया आकाशवाणी से समाचार आ रहा है कि पंडित जी नहीं रहे.
लाउडस्पीकर बन्द हो गया. सन्नाटे में तिलक सम्पन्न हो गया. वह शाम पंडित जी की चर्चा मे बीता. लोगों को लग रहा था कि उनका कोई सगा नहीं रहा.
तब तक प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत ट्यूबवेल मेरे गांव में भी लग गया था, उसकी लम्बी नहरों से सिंचाई की सुविधा भी हो गई थी. उस समय साम्यवादी दल भी गांव में दाखिल हो गया था. नैनीताल मे जमीन पाये लोग रोज नेहरु-गांधी की गाथा भी गा रहे थे. लोकगीतों मे गान्धी, नेहरु व कांग्रेस की चर्चा होती थी. विवाह समारोह में प्रहसन-गाली- गीत में  भी गान्धी, नेहरू व कांग्रेस की चर्चा थी .
ऐसे परिवेश में पले बढे सम्वेदनशील लोगों के मानस पटल पर एक व्यक्तित्व अपनी जगह बना लिया. आधुनिक भारत को तेजी से विकसित राष्ट्रों की तरह बनाने का नेहरू का सपना चीनी आक्रमण से टूट गया और दिल भी. देश तो चलता ही रहेगा. लेकिन उसकी गुणवत्ता भूतकाल की नींव और वर्तमान के कर्म पर निर्भर होती है. आज नेहरू- नीति प्रश्नवाचक है किन्तु उनका भारत के निर्माण का सपना नहीं.

२९ मई,  १९८७ चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि है, मेरे होश में चरण सिंह घोर नेहरू विरोधी थे. कांग्रेस के कुलवाद के भी विरोधी थे. उन्हें सख्त प्रशासक माना जाता था. जब वे मुख्यमंत्री हुये तो कार्यालय १० बजे माने १०बजे खुलने लगे. सरकारी कर्मचारी समयपालन करने लगे. जनता की एक शिकायत पर प्रशासन दौडता था. मेरे गांव के एक व्यक्ति ने पोस्ट्कार्ड पर शिकायत भेज दी थी. देवरिया से अधिकारी बरसात में भींगते, कीचड में चलकर गांव पहुंचे. हम बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव पडा. किन्तु वार्धक्य आते आते उनका भी मन कुर्सीमय और परिवारवादी हो गया. उन्हें अपने दल भारतीय क्रान्तिदल का कोई कार्यकर्ता योग्य नहीं लगा और इस प्रकार एक और कुनबा दल बन गया.

दोनों को श्रद्धांजलि.
नमस्कार.

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