Wednesday, May 28, 2014

अरविन्द की जेल यात्रा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने नितिन गडकरी मानहानि केस में जेल जाना स्वीकार किया. उनका कहना था कि वे न्यायालय की सूचना पर उपस्थित हो गए हैं, और आगे भी आते रहेंगे, यह लिखकर दे दे रहे हैं, लेकिन विधि के अनुसार या माननीय न्यायमूर्ति के विवेक के अनुसार उनका कहना त्रुटिपूर्ण था. उन्हें जेल भेज दिया गया. न्यायमूर्ति ने उन्हें उच्च न्यायालय में जाने को सलाह दिया. उच्च न्यायालय ने उन्हें पहले जेल से बाहर आने कि कार्यवाही कर लेने की सलाह दी उन्होंने वैसा ही किया.

काका हाथरसी ने कहा है कि "सांई ये न बिरुद्धिये....." यद्यपि इसमें पत्रकारों और मीडिया का नाम नहीं है किन्तु अरविन्द ने इनका विरोध कर दिया. उनका विरोध कर दिया जो मंत्री बनाते बिगाडते हैं. यह सबसे बडा बंधुआ मजूर वाला क्षेत्र है. कुछ लोगों को खूब पगार मिलती है बाकी को लालीपाप. कस्बे से लेकर राजधानी तक मीडियाकर क्या क्या करते हैं ये सब  जानते हैं. एक शब्द है साक्षीभाव अर्थात परिघटना को राग द्वेश और संवेग से मुक्त होकर देखना. मीडियाकर को इसीभाव से समाचार लिखना चाहिये. एक शब्द है मीडिया प्रबन्धन. इसे भी मीडिया वाले ही जानते हैं, लोग भी जानते हैं.  भारत में लोग "बूझि मनहिं मन रहिये" "सामने कह कर तो देखे" के चलते किसी को कुछ कहना ठीक नहीं समझते हैं और कोर्ट कचहरी से भी डरते हैं.

भाई मीडियाकर लोग, अम्बेडकरवादी लोग, वामपंथी लोग, अन्नावादी लोग और प्रतिद्वन्द्वी राजदल वाले सभी अरविंद के जेल जाने का परिहास ही करते दिख रहे हैं.

केजरीवाल के जेल जाने से लोग इतने नाराज क्यों हैं. भारत की जेलों तमाम ऐसे लोग बन्द हैं जिन्हें वहां नहीं होना चाहिये. वे जमानत की न्यायिक प्रक्रिया के कारण जेल मे हैं. कचहरी के खर्च के लिये धन न जुटाने के कारण जेल मे हैं.

अभी कुछ दिनों पहले मीडिया में हंगामा हुआ था जब एक पुत्र ने वर्षों की मेहनत के बाद अपनी माता को जेल से रिहा कराया था.

जब देश के न्यायाधीश, शिक्षक, और पत्रकार/मीडियाकर आत्मनिरीक्षण न कर विवेक के स्थान पर अधिवक्ता की तरह पक्षपातपूर्ण तर्क का सहारा लेंगे तो देश का नैतिक पतन होगा.

नमस्कार.

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