Friday, November 4, 2011

विश्वविद्यालय की परीक्षा

नमस्कार !

क्या हालचाल है?

अभी थोड़ी देर पहले रवीश जी के ब्लॉग पर ( http://naisadak.blogspot.com/ ) दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू सेमेस्टर सिस्टम को भारत के लिए बेकार बताया गया है. इसपर पहले मैं अपना अनुभव बताता हूँ - मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में १९७०-१९७२ तक विज्ञान वर्ग में स्नातक की परीक्षा सेमेस्टर प्रणाली से दिया हूँ. इस प्रणाली में  प्रत्येक विषय के एक प्रश्नपत्र की पढ़ाई तथा उसकी परीक्षा होती है. पहले सेमेस्टरकी परीक्षा दिसंबर में होनी थी अधिकाधिक छात्र परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे थे उसी समय कुछ छात्र जाड़े के नाम पर परीक्षा स्थगित कराने के अभियान  पर निकल गए और कहने लगे कि जनतांत्रिक अधिकार है परीक्षा टाली जाय. विज्ञान संकाय के डीन के पास छात्रावास के छात्र गए और परीक्षा टलवा दिए . हमलोग भी खुश हो गए कि चलो परीक्षा से गला छूटा. दूसरे सेमेस्टर की पढाई शुरू हो गई . यहाँ पर एक बात और उल्लेखनीय है कि प्रैक्टिकल की परीक्षा न होकर प्रतिदिन मूल्यांकन प्रणाली लागू थी.

जब दूसरे सेमेस्टर के परीक्षा की बारी आयी तो परीक्षा टलवाऊ समूह फिर सक्रिय हो गया और एक प्रश्नपत्र का बहिष्कार करा दिया. इसबार प्रशासन कठोर निर्णय पर उतारू हो गया और परीक्षा नही टली. वहाँ पर जो सेमेस्टर प्रणाली थी उसमे अगले सेमेस्टर  में पढ़ने और परीक्षा देने में कोई बाधा नही थी इसलिए सभी लोग एक प्रश्नपत्र में अनुपस्थित होने पर भी अगले सेमेस्टर में चले गए. परिणाम यह हुआ कि हमलोगों को एक प्रश्नपत्र के स्थान पर दो प्रश्नपत्रों को एक साथ तैयार करना पड़ा. बाद में पता चला कि परीक्षा टलवाउ नेता को अगले वर्ष छात्रसंघ का चुनाव लड़ना था. इसके लिए उन्होंने सबके कैरियर को दांव पर लगा दिया था.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में १९७४ के जेपी आन्दोलन के बाद सत्र अनियमित हो गए और आज तक नियमित नहीं हो पाए हैं. यहाँ पर विधि संकाय में सेमेस्टर प्रणाली है किन्तु यहाँ की सेमेस्टर प्रणाली में प्रतिवर्ष आगणन पद्धति  है अर्थात विधि प्रथम वर्ष पास किये बिना द्वितीय वर्ष में नहीं जा सकते. सेमेस्टर प्रणाली के होते हुए भी आज तक  विधि का सत्र भी नियमित नहीं है.

जब मैं लिख रहा हूँ कि गोरखपुर विश्वविद्यालय का सत्र नियमित नहीं है तो यह सुनकर बहुत सारे लोग नाराज हो सकते हैं. किन्तु यह वास्तविकता है कि यहाँ के परीक्षा परिणाम ४५ दिन में नहीं निकल पाते हैं. पहले तो दोष छात्रसंघों  का भी था किन्तु अब तो केवल विश्वविद्यालय प्रशासन ही जिम्मेदार है.

इस परिप्रेक्ष्य यह भी कहना समीचीन होगा कि पचहत्तर दिन के ग्रीश्मावाकास, पैंतालीस कार्य दिवसों की परीक्षा और असीमित अवकाशों और शोक अवकाशों के होते हुए एक सौ अस्सी पढाई के कार्य दिवस कैसे पूरे हो सकते हैं.
ऎसी स्थिति में पढाई की गुणवत्ता केवल इंफ्रास्ट्रचर से ही नहीं निर्धारित की जा सकती है.

यहाँ पर यहभी कहना समीचीन होगा कि शिक्षक संघों को शिक्षा की गुणवता और पाठ्यक्रम की सार्थकता पर भी ध्यान देना होगा नहीं तो परम्परागत विश्वविद्यालयों का अंत सुनिश्चित है.

Monday, October 3, 2011

गरीबी रेखा

नमस्कार !

क्या हालचाल है ?

अमीरी की रेखा का ज्ञान भारत को परेशान कर रहा है. महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री अहलुवालिया जी ने तमाम लोगों को रातोंरात अमीर बना दिया. बहुत दिनों से मैं भी गरीबी रेखा की खोज में था मिल ही नहीं रही थी. कई लोग और कई सस्थाएं इस रेखा को जहां तहां खीच रहे थे. शुक्र है माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग से रेखा की मांग कर दी. योजना आयोग की रेखा को देखकर, मध्यवर्ग जो विद्वान दीखने के लिए अखबार पढता है और टीवी पर समाचार पढ़ता है, बौखला गया. उसके पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी. वह अपने को अमीर समझता था. अब फिर रिक्सावाला उसके स्टेटस में आ गया. अब घड़ी, साइकिल,टीवी, मोबाइल और गैस जो कभी उसने अपनी अमीरी दिखाने के लिए लिए थे  निरर्थक हो गए. भारत अब अमीर देश हो गया. मध्यवर्ग अचानक बौखला गया और योजना आयोग पर हल्ला बोल दिया.

योजना आयोग के कर्ता धर्ता अहलुवालिया जी विदेश से लौटे   महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री से मिले और महान आईआईटीएन मंत्री माननीय जैराम रमेश जी के साथ प्रेसवार्ता  कर बताया कि लोग गलत कह रहे हैं . बत्तीस रूपये रोज पर बौखलाइये मत. लोगों को गणित ही नहीं आती. एक परिवार में पाँच लोग माने जाते हैं. बत्तीस में पाँच क गुणा कीजिए तो होगा एक सौ साठ.  एक दिन में एक सौ साठ, महीने में तीस दिन तो हो गए तो महीनें में हो गया चा.....र....ह....जा.....र....आठ....सौ...... अब बताइये महीने में चार हजार आठ सौ आमदनी वाला परिवार गरीब कैसे हुआ? जबसे मैनें उनका वक्तव्य सुना  है तब से जोड़ रहा हूँ. साल में तो ३६५ या ३६६ दिन होते हैं. ४८०० में १२ से गुणा करने पर आ रहा है ५७६०० . और ५७६०० में ३६५ से भाग देने पर आ रहा है १५७.८० . फिर १५७.८० में ५ से भाग देने पर आ रहा है ३१.५६  तो इस प्रकार तीन साल के लिए गरीबी रेखा ३१.५६ दिन ही हुई. ३६६ वाले साल में फिर गणित गडबड हो जा रहा है. तो भाई मेरे समझ के बाहर के इस गणित को समझाइये.

इतना ही नहीं जब हर तीन महीने में औद्योगिक महगाई सूचकांक बदल जाता है, हर छह महीने में सरकारी कर्मचारियों का सूचकांक बदल जाता है तो गरीबी रेखा भी ऊपर उठेगी या अगले दस सालों के लिए स्थिर  रहेगी . क्योंकि अहलुवालिया जी ने कहा कि हमने तो रेखा को बदला है वो भी तेंदुलकर जी की राय पर.  फिर कोई कमेटी बनेगी और रेखा बनाएगी तब तक तो यही रेखा रहेगी यही नियम चला आ रहा है.

जयराम जी बोले कि जाति गणना के साथ ग़रीबों की भी गणना हो जायेगी तब पुनः रेखा खींची जायगी. अब इस समय जो गणना हो रही है वह तो पुराने फार्मूले पर ही चल रही है. फिलहाल हल्ला गुल्ला बंद हो जाय. बाक़ी बाद में  रेखा खींचना तो मंत्रालय को ही है खीच दी जायगी.

मेरे समझ आ रहा कि जब हमलोग ग्लोबल गाँव में ही रह रहें हैं तो  एक गाँव में गरीबी रेखा तो एक ही होनी चाहिए. मुहल्लेवार अलग अलग तो नहीं होनी चाहिए .

फिर मिलेंगें.
नमस्कार.

Sunday, October 2, 2011

गांधी और भारत

नमस्कार !

आज २ अक्टूबर २०११ है. मोहनदास करमचंद गांधी, गांधी जी, महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता गांधी या बापू  का जन्म दिन है. गांधी को बचपन में टोपी से जाना. बाद में खादी से जाना. हाईस्कूल में संछिप्त आत्मकथा से जाना.लेकिन मैं  क्या गाँधी को जान पाया ? नहीं. सत्याग्रह, असहयोग और  अनशन की बातें सुनी. राष्ट्रीय सेवा योजना में काम करते समय कुछ लोगों को बताया, सुना उसे  आचार में लाना कठिन है लेकिन प्रयास करता रहा. विशेषकर अहिंसा का मार्ग अच्छा लगता रहा. अब भी अच्छा लगता है. साम्यवाद की भी बहुत सी बातें अच्छी लगतीं हैं. गोली और बंदूक की बात अच्छी नहीं लगती है.

२०११ की कुछ घटनाएँ गाँधीवाद की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्नों की बाढ़ को रोक रहीं है. किन्तु कांग्रेस सरकार जो अपने को गाँधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी मानती है, गांधी को अप्रासंगिक बनाने पर तुली हुई है. कांग्रेस सरकार को सत्य और अहिंसा से कोई सरोकार नहीं है. अगर सरकार अपने को बापू का उत्तराधिकारी मानती है तो उसे भ्रष्टाचार और काले धन का मोह छोडना पड़ेगा.  गाँधी जी भी वकील थे.  चिदंबरम, सिब्बल और सलमान खुर्शीद भी वकील ही हैं. कौन सच्चा वकील है ? राजनीति में सच्चे वकीलों की जरूरत हैं ,ऐसे वकीलों की जो न्याय की रक्षा कर सकें न कि धन कमाने के लिए वकालत करें.

अन्ना हजारे के आंदोलन ने भारत में गाँधी को पुनः प्रासंगिक बना दिया है. पूरे भारत में एक आंदोलन बिना किसी राजनैतिक दल के सक्रिय सहयोग के अहिंसा के साथ बारह दिनों तक चलता रहा. गांधी टोपी जो गाली बन गयी थी अन्ना और अहिंसा तथा निष्ठा के स्पर्श से पुनः पूज्य हो गयी.

गाँधी का पुनर्जन्म हो चुका है. बचपन में कुपोषण से लेकर महामारियों तक का भारी खतरा होता है. भारत में तो यह खतरा  कई गुना होता है. कांग्रेस से ही नए गाँधीवाद को भारी खतरा है. टोपी के साथ तिरंगा भी जनप्रिय हो गया है. भारत में राष्ट्रवाद भी बढ़ा है. आइये कामना करें कि सत्य और अहिंसा में हम सबसे आगे हों. समानता और बंधुता में आगे हों. समता और न्याय में आगे हों.

Tuesday, July 5, 2011

लोकपाल

नमस्कार!
हालचाल ठीक है न!

लोकपाल बिल के लिए सरकार ने सर्वदलीय बैठक किया.बैठक के प्रस्ताव से स्पष्ट हो गया कि दलीय लोकतंत्र में दलगत स्वार्थ प्रमुख है.

अन्ना हजारे की टीमने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल की अपील की थी किन्तु निराशा हाथ लगाने पर अन्ना ने आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया. जन सहयोग देखकर सरकार ने एक समिति बना दी. सत्ता पक्ष ने लचर बिल से प्रारम्भ किया, उनकी सोच यह थी कि अन्ना  टीम की कुछ बातें मानकर एक बिल सामने ला दिया जायगा. और काम बन जायगा. अन्ना टीम के न मानने पर लोकपाल बिल के दो प्रारूप सामने आगये. सरकार को दलों का रुख देखकर लगा कि वेलोग भी वही सोच रहे हाँ जो कांग्रेस सोच रही है तो उन्हें भी बुला लिया जाय. और सर्वदलीय बैठक हो गयी.

स्पष्ट है कि सभी दलों को दोनों प्रारूपों का ज्ञान था. अन्ना हजारे ने सभी दलों से मिलकर सशक्त लोकपाल के प्रारूप को समझा भी दिया था किन्तु बैठक निर्णय अति असंतोषजनक था. जनता के सामने दल कुछ कहते हैं और बैठक में कुछ. अपनी छवि बनाने के लिए सभी सशक्त लोकपाल का नारा लगा रहे हैं किन्तु अवसर आने पर तकनीकी बहाने बना रहे हैं. यह सक्रिय राजनीति नहीं है. सभी जानते हैं कि आगामी सत्र में बिल स्थाई समिति और मंत्रिमंडल से होता हुआ संसद में आएगा.

यदि हमारे राजनैतिक दल सक्रिय होते तो बिल के प्रावधानों पर स्पष्ट रूप से बात करते और बिल को सशक्त बनाने के लिए अपनी स्पष्ट राय दिए होते. अब नेता गण अलग बयानों में तरह तरह की बात कर रहे हैं.

कमजोर लोकपाल बनाने के लिए संविधान की दुहाई दी जा रही है यदि किसी धारा के कारण संविधान संबंधी समस्या है तो सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले लेनी चाहिए. इस समय तक जो भी विचार आरहे हैं उससे लगता है कि संविधान का उलंघन नही होरहा है. लोगों में मतभेद है.

सर्वदलीय बैठक से यह भी लग रहा है कि दलों को कोई लोकपाल बिल पास कराने की कोई जल्दी नही है.


Friday, June 10, 2011

भारतीय जनतंत्र

नमस्कार!
मैं उस भारतीय जनतंत्र  का वासी हूँ जिस देश के राजतंत्र में भी जनता की आवाज का महत्व था. कहा जाता है कि एक राजा ने अपनी उस रानी का परित्याग कर दिया था जिसे वह प्राणों से भी अधिक चाहता था. उसी देश के एक कलाकार को देश छोड़कर जाना पड़ता है. उसी देश  की जनता को अपनी बात रखने के लिए बोलने की जगह भी नहीं मिलती है. उस देश के विधायक,सांसद अब कहने लगे हैं कि उनके सिवा बोलने वाला कौन है ? उस देश की जनता को अब मानवाधिकार के लिए लड़ना पड़ता है. उसी देश में जनता अपनी बात कहने के लिए जब जुटती है तो  उसे आधी रात को खदेड़ दिया जाता है. किन्तु जब वे जनता को जुटाते हैं तो उन्हें सर पर बिठाते हैं. जनता अब राजनैतिक दलों की गुलाम बन कर रह गयी है. जो  राजनेता के पक्ष में है उसे छोड़कर बाक़ी सब बेकार हैं .  

इस देश की सबसे बड़ी राजसत्ता नेहरू वंश के साथ है. नेहरू की समाजवाद तथा उनके सपनों का भी अंत हो चुका है. एक इमानदार राजीव मार डाले गए. अब नेहरू वंश की सोनिया जी वोट जुटाती हैं तथा कांग्रेसी राज करते हैं और भ्रष्टाचार करते हैं. इस वंश से सीख लेकर तमाम लोगों ने राजनैतिक दल बनाकर अपने को तथा अपनों को राजसिंहासन पर सुशोभित किया है.कुछ ऐसे राजनैतिक दल हैं जो व्यक्तिवादी हैं उनमें कुछ व्यक्ति ही दल हैं वे ही सिद्धांत हैं. वे ही सबकुछ हैं. सारी संगठन की गतिविधियाँ उनकी इशारों पे बनतीं बिगदतीं हैं. इनके दिखाने के दांत और खाने के दांत अलग अलग हैं . धीरे धीरे लोग इनके बारे में भी जानने लगे हैं. 

जब भी जनता कुछ जागरूक होने लगती है इनकी परेशानी बढ़ने लगती है. इन जननायकों की इक्छा रहती है कि पच्चीस वर्ष से जिदगी भर सत्तासीन बने रहें. कुछ पिछलग्गू कार्यकर्ता इनके साथ लगे रहें जो पोस्टिंग ट्रांसफर उद्योग में सहयोग करें तथा धनार्जन कास्रोत बने रहें.

अखबारों में भारत के भ्रष्टाचार की खबरें छपा करती हैं. दस प्रतिशत कमीशन कुछ नजराना कुछ शुकराना देना भारत के लोगों को भी भाता है अब जबराना चलने लगा है. इसी बीच स्वामी रामदेव घूम घूम कर जनता को जगाने लगे कि केवल बाहर गया काला धन आ जाय तो भारत का भाग्य बदल जाय. नौजवान पैसा देकर भी नौकरी नहीं पा रहे हैं पैसा डूब जा रहा है. नौकरी करने वाले अपने जीपीय्फ़ से क़र्ज़ भी घूस देकर पा रहे हैं ट्रांसफर तो बहुत पुराना घुसहा रोग है. इसी दौर में अन्ना हजारे एंड कम्पनी लोकपाल बिल संबंधी मांग लेकर कनात प्लेस पर बैठ जाते है. इंटरनेट का सहयोग लेते हैं और उनके समर्थकों की संख्या बढ़ने लगती है. सरकार उनकी बात मान लेती है. किन्तु बात मन में नहीं उतरती है. सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना चाहती ही नहीं है. कुछ समय बाद  स्वामी रामदेव का अनशन शुरू होता है सर्कार उनकी बात भी मन लेती है किन्तु मन से नहीं चाहती. क्योंकि कांग्रेसियों की बातों में ही परस्पर मतभेद है. फिर जनतंत्र की धज्जियां उड़ा दी जाती हैं.

भ्रष्टाचार में आगे रहनेवाला यह जनतंत्र शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार के अवसर में काफी पिछड़ा हुआ है. जनतांत्रिक मूल्य तो तब आयेंगे जब कोई राजनैतिक दल वास्तव में जनतांत्रिक मूल्य को स्वीकार कर पायेगा. वैसे तो रामलीला के मैदान में जनतंत्र का मुह काला कर दिया गया है. भ्रष्टाचार और भ्रष्ट दोनों ही खुश हैं.





Monday, May 30, 2011

जनता का दायित्व

नमस्कार!

दैनिक समाचार पत्र "हिन्दुस्तान" ने दो टूक कहा है की जनता को सेवायें प्राप्त करने के लिए व्यय करना चाहिए. वास्तव में सरकार जो भी व्यय कर रही है जनता ही देतीहै  प्रत्यक्ष कर के रूप में अप्रत्यक्ष कर के रूप में. केन्द्रीय कर के रूप में प्रांतीय कर के रूप में और तमाम ढंग हैं कर वसूली के. तमाम तरह के कर देने  पर भी जनता को सुविधा देने की बात आती है तो तरह तरह के बहाने बनाए जाते हैं. कर के रूप में बटोरी गई धन राशि को बेदर्दी से बरबाद किया जा रहा है. एक बरबादी का उदाहरण कामनवेल्थ खेल भी है  जो हमारी गुलामी का ढिंढोरा पीटता है तथा राजतन्त्र का प्रचार करते है. 

कर उगाही का अधिकार मात्र केंद्र को होना चाहिए तथा  सभी नागरिक सेवा संस्थाओं को उसका  अंश मिलना चाहिए जिससे की हर नागरिक को एक समान सुविधा प्राप्त हो सके. आज की स्थिति में तमाम कर बिचौलिए खा जाते हैं. वैट के नाम जितना कर जनता की जेब से जाता है उसका कितना अंश सरकारी कोष में पहुंचता है इसका न कोई हिसाब है न चर्चा. निश्चय ही जनता का बहुत सारा पैसा जनता की जेब से कर के नाम पर ले लिया जाता है किन्तु वह सरकारी कोष में नहीं पहुचता है. इतना सारा धन कर के रूप में देने के बाद शिक्षा, चिकित्सा एवं सड़क जलनिकास पानी के नाम पर कार्यदायी संस्थाएं धन का रोना रोती हैं.  सभी जानते हैं  इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार समाप्त हो जाय तो दशा कितनी सुधर सकती है. कुछ लोग कह सकते हैं  कि निःशुल्क सुविधा होने पर दुरुपयोग होगा. किन्तु सभी जानते हैं की बिजली पानी के मीटर कैसे चलते हैं और रुकते हैं. बकायेदारों में भी कौन होते हैं उसका खुलासा होप्ता ही रहता है. 

इन सस्थाओं के पास जब शिकायत की जाती है तो ये जनता के कर्तव्य की बात करने लगतीं हैं. किन्तु जनता को वह सब कुछ नही मिल पा रहा है जितना कर के रूप में दे रही है. कुछ लोगों को भ्रम है की कुछ ही करदाता हैं. किन्तु वास्तव में गर्भस्थ शिशु के लिए खरीदी जाने वाली दवा में से भी कर ले लिया जाता है. कर लेने के लिए तो सबके दायरे तय हैं किन्तु सुविधा के नाम पर सभी एक दूसरे को दिखाने लगते हैं. तब हम देश के नही किसी गाँव  या शहर के नागरिक हो जाते हैं.



Sunday, April 10, 2011

अण्णा का अनशन

नमस्कार!
अण्णा हजारे का अनशन समाप्त हो गया. अण्णा सरकार से जो आश्वासन चाहते थे मिल गया. अब परिचर्चा हो रही है. सफलता की असफलता की. अण्णा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक सशक्त लोकपाल की मांग कर रहे  हैं. जिसके लिए विधेयक  बनाने की सशक्त समिति का गठन अण्णा की शर्त के अनुसार होना है. भारत के तमाम राजनैतिक दल इसकी चर्चा तो करते हैं किन्तु कानून ऐसा चाहते हैं जो उनकी मुट्ठी में रहे और उनका कभी भी कोई अहित नहो सके चाहे वे जो करते रहें. कोई सार्थक परिणाम न मिलाने पर अण्णा आमरण अनशन  पर बैठ जाते हैं. उन्हें इतना समर्थन मिलाने लगता है कि सरकार उअनकी शर्तें मान लेती है. वह प्रत्येक व्यक्ति हर्षित हो जाता है जिसने केवल मानसिक समर्थन मात्र दिया है.    

एक नारा लगता है " अभी तो ये अंगड़ाई है आगे बड़ी लड़ाई है." वास्तव में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए ये अंगड़ाई ही है. इस सफलता के कारणों का विश्लेषण हो रहा है. काल, परिस्थिति, व्यक्ति, संसाधन सभी का ऐसा तालमेल हुआ कि यह लड़ाई सफल हो गई. वर्षा, शीत, और गरमी तीनो दृष्टि से उपयुक्त समय, देश विदेश में भ्रष्टाचार विरोधी और लोकतंत्र समर्थक वातावरण, देश में चुनाव की स्थिति. अण्णा जैसा व्यक्तित्व, अरविंद केजरीवाल, किरण वेदी स्वामी अग्निवेश जैसे सहयोगी. देश के प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को छूता हुआ मुद्दा. मीडिया को तो समर्थन करना करना ही था. समर्थन न करने वाले, आलोचना करने वाले इस समय संदेह के घेरे में हैं. अण्णा के अनशन से किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई, उन्हों ने किसी का रास्ता नहीं रोका, सहयोग के लिए भी कोई भारी भूमिका नही बनाई. उनके किये गए कार्यों ने ही उनका प्रचार कर दिया. और वो हो गया. मोबाइल और इंटरनेट ने भी योगदान किया. 

हजारों लोग अनशन करते हैं.किन्तु सफल नही होते इस अनशन में ऐसा क्या था कि चार दिन में ही बात बन गयी. तमाम संभावनाएं इस समय सुर्ख़ियों में हैं. तमाम लोग खुश हैं. कुछ दुखी हैं. कुछ ईर्ष्या से मर रहें हैं. कुछ इसलिए दुखी हैं कि उनके आन्दोलन को ऎसी सफलता क्यों नहीं मिली. किसी को मीडिया की साजिश लगती है. गांधी से मतभेद रखने वाले दुखी हैं की गांधी के  खाते में एक और सफलता जुड़ गई.

चलिए एक आन्दोलन को एक कदम रखने का स्थान मिल गया है. इसके साथ जो हर्षित  हैं उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्हें आग को जलाए रखने का अथक प्रयास करते रहना होगा. यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन है. भारत में भ्रष्टाचार संस्कृति बन चुका है. जिसके  कारण हर व्यक्ति इससे प्रभावित है.कहावत कही जाती है बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए.