Sunday, November 14, 2010

चाचा नेहरू

चाचा नेहरू 
नमस्कार!
हालचाल ठीक है न 
आज १४ नवम्बर को भारत बाल दिवस मनाता है . जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में प्रस्तावित किया तबसे अब तक भारत के बच्चों की स्थिति में बहुत सुधार हो चुका है. लेकिन विश्व परिदृश्य की तुलना में भारतीय बालकों की स्थिति में अभी भी बहुत सुधार की आवश्यकता है.
भारत ही नहीं पूरे विश्व के बच्चों के लिए शुभकामनाएं. 

आज का भारत नेहरू के सपनों को तोड़ने में लगा हुआ है. उनके सपनों की योजनायें एक एक कर बिक रही हैं. लोग सामान्यतः कहते हैं की कोई एक उदाहरण दिखाएँ . नेहरू की सफलताओं के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं . लेकिन हम उन उदाहरणों के अनुसार काम नहीं करना चाहते हैं. मुख में राम बगल में छुरी जैसे सविधान में समाजवाद और व्यवहार वैश्वीकृत पूंजीवाद हमारी आज की आर्थिक नीति का सार है. समान काम के लिए समान वेतन की धज्जियां उडाई जा रहीं हैं.

नेहरू की आर्थिक नीति कोई एकमेव नीति नहीं है लेकिन जिस भी नीति से मानव के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो वही सही नीति है. नीतियों के पालन में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा रोग है. कुछ लोग कहते हैं इस भ्रष्टाचार का कारण  तंत्र है. 


चाहे जो हो नेहरू का योगदान इतना तो है की उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया जाय.
नमस्कार.

Saturday, November 13, 2010

Friday, February 12, 2010

शिव एवं गण


नमस्कार

हालचाल ठीक है
आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। आज महाशिवरात्रि है। हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। पुराण कथाओं के अनुसार आज के दिन शिव का विवाह हुआ। आज के दिन शिव जी प्रसन्न रहते हैं। आशुतोष भगवान शिव के भक्तों के लिए भी प्रसन्नता का विषय है। स्नान भारतीय पर्वों का सबसे महान कार्य है। इसलिए भक्तगण पवित्र नदियों, सरोवरों कूपों में स्नान करने को आतुर रहते हैं। भक्त गण आपस में प्रतियोगी भी हो जाते हैं। इस प्रतियोगिता में कुछ अप्रिय भी हो जाया करता है।

इस वर्ष हरिद्वार में कुम्भ स्नान का वर्ष है। आज वहां पर प्रथम शाही स्नान हुआ। साधु संतों का शाही स्नान नाम सुनकर कुछ अटपटा लगता है। स्नान का सबसे बड़ा पुण्य स्थल हरिद्वार में ब्रह्म कुण्ड है। इस स्थान पर शाही स्नान के लिए साधु समाज में भी प्रतियोगिता होती है। प्रशासन को नाकों चना चबा लेना पड़ता है। आज यहाँ स्नान जूना अखांड़े के संतो साधुओं नागाओं के स्नान से प्रारम्भ हुआ। वहां उपस्थित लोगों ने भी देखा दूसरों ने दूरदर्शन की कृपा से देखा ।

दूर से देखने पर कभी लगता है की ये क्या हो रहा है भाई? लेकिन मानव के जीवन में इस तरह के अनुभव भी बड़े काम के लगते हैं। अगर शरीर साथ दे तो इस प्रकार के अनुभव बड़े काम के होते हैं। धर्म का अफीम भी कभी कभी बड़ा लाभ करता है।

आज भारत में जनतंत्र की एक झूठी परीक्षा का दिन भी रहा। पूरे महाराष्ट्र की सरकार, केंद्र सरकार विशेष कर कांग्रेस आज मुम्बई में अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म माय नेम इज खान के प्रथम प्रदर्शन के लिए परेशान रहे। भारतीय जनतंत्र की एक अनोखी राजनैतिक पार्टी शिवसेना अपना बल दिखाती रही। मीडिया वाले आज दिन भर लोकतंत्र की जीत हार कराते रहे।

जनतंत्र हर ओर से हारता रहा। राजनैतिक दल व नेता जीतते रहे, आदमी हारता रहा। पत्रकार भी जीत गए। फिल्म भी जीत गयी। हीरो का दाम बढ़ गया। शरद पवार की पार्टी और शिवसेना का तालमेल थोड़ा बढ़ गया ।
हाथ मलते मलते राज ठाकरे भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा लिए तथा कांग्रेस को बता दिए की हाथ मिलाये रहो।

नमस्कार।

Tuesday, February 9, 2010

बीते दिन

बीते दिन
नमस्कार
हालचाल ठीक है न!

इस समय मैं अपने जीवन के सत्तावनवें वर्ष के अंतिम घंटे को जी रहा हूँ । नव फरवरी बीत रही है दस फरवरी का इन्तजार है। एक बढिया गुजरा वर्ष । खुशियों भरा वर्ष। एक सपने के पूरे होने का वर्ष। एक सपने के टूटने का वर्ष।
बेटी प्रियंका की शादी का वर्ष। लोकेश के भारतीय प्रशासनिक सेवा के चौथे असफल होने का वर्ष। सपने टूटते रहते हैं। नयी आशाएं बनती /बंधती रहती हैं। यही तो जिन्दगी है। यह मेरे ब्लॉग के शुरू होने का वर्ष है। अभी तक तो शायद ही कोई पाठक है। कुछ लिखकर सार्वजनिक तो हो रहा है। अपनी इक्षा तो पूरी होही जाती है। ब्लॉग की यही तो खूबी है।

कभी कभी मन में प्रश्न उठता है ब्लॉग की भी हिन्दी होनी चाहिए। अभी तो हिंदी लिखने के लिए रोमन का सहारा ले रहा हूँ। हिंदी के लिए ही समस्या क्यों होती है। अभी भी रेमिंगटन और रोमन में समस्या हो जाती है। इनस्क्रिप्ट जानने की कोशिश में हूँ अभी तक सफलता नही मिली है।

रोज के विचार लिखित रूप में नहीं आ पा रहें हैं। शायद आगे हो सकेंगे। फिलहाल इस समय वर्षा होरही है।

नमस्कार

Sunday, December 13, 2009

कितने प्रदेश

कितने प्रदेश
नमस्कार!
हालचाल ठीक है !

नए नए प्रदेशों के बनाने की मांग होती हैपक्ष विपक्ष में तमाम प्रमाण दिए जाते हैंराजनीतिक दलों की अपनीपक्षधरता होती है की नए प्रान्त बनने से उन्हें कुर्सी मिल सकती है या नहींलोग शहीद होते हैंलाठियां चलतीं हैंप्रदेश के नाम पर झगड़े होते हैंफिर एक दिन प्रदेश बन जाता हैतर्कसंगत मांग को भी भारत के लोकतंत्र मेंपूरा पूरा दबाने का काम होता रहता है


मैं उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में बैठकर यह ब्लॉग लिख रहा हूँउत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावतीजी ने केन्द्र सरकार के पास एक पत्र भेजा हैपत्र भेजकर वह क्या दिखलाना चाहती हैं ? क्यों नही विभाजन केलिए विधान सभा का प्रस्ताव भेजती हैंउत्तर प्रदेश के विभाजन के लिए कुछ दिनों से मांग के भाषण चालू हैं

जब भी प्रदेशों के आकार पर चर्चा होती है तो मैं भारत का मानचित्र सामने लेकर बैठ जाता हूँविभिन्न प्रदेशों काआकार देखकर कुछ समझ में नहीं आता हैहमारे देश भारत को जिलों में भी बांटा गया है और संसदीय क्षेत्रों मेंभीक्या लोकसभा के सीट के क्षेत्र की सीमा और जिले की सीमा एक नहीं हो सकती है ? जब सांसद से क्षेत्र केविकास का हिसाब पूछा जाता है तथा जिलाधिकारी से भी तो दोनों का क्षेत्र एक होना ही चाहिएइसी प्रकारतहसील और विधायक के क्षेत्र की सीमा भी एक समान होनी चाहिए

बीस या पचीस जिलों का एक राज्य होना चाहिएयह विभाजन शीघ्र हो सके इसके लिए एक समिति का गठनहोना चाहिए जो भौगोलिक , सांस्कृतिक ,एवं प्रशासनिक दृष्टि पूरे देश का अध्ययन कर के बंटवारे का खाका एवंअपना पक्ष प्रस्तुत करेउस रिपोर्ट को प्रकाशित करके जनता की अदालत में लाया जाए तथा जनता की रायजानने के लिए प्रश्नावली प्रकाशित कर उत्तर प्राप्त की जाए

भाषा के आधार पर राज्य का गठन अब उचित नहीं लगता हैबंगाल का नक्शा देखें उत्तर बंगाल के लोगों को "कलकत्ता" या "कोलकाता" से क्या लेना देना हैपश्चिम बंगाल के वर्तमान या भावी मुख्यमंत्री केवल दार्जीलिंग के चायकी आय से मतलब रखते हैं वहाँ के गाँवों के लोग क्या सोचते हैं उससे उनका क्या मतलबराजनैतिक सोच भी यदि विकास के लिए होगी तो उसका परिणाम दूसरा होगाराजनैतिक दलों में ऐसे राजनेताओं की कमी है जो देशके विकास को वास्तव में सर्वोपरि मानते हैंवर्त्तमान परिदृश्य तो पैसा, पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई का हैदेशऔर प्रदेश का विकास गौड़ प्रश्न हैभारत के दुर्भाग्य से भारत के सभी राष्ट्रीय राजनैतिक दल अपने चरित्र काप्रदर्शन कर चुके हैंउन्हें कोई शर्म भी नहीं है


इस समय राज्यों के पुनर्गठन की बात मुख्य चर्चा में है। अब यह मीडिया पर है की वह पूरे परिदृश्य को किस और मोड़ देने का प्रयास करती है। उसे भारत विकास अच्छा लगता है या अपने समाचार की कीमत।
नमस्कार













Saturday, December 5, 2009

namaskaar ravis bhaaii
ii angarejii eisan baa ki garadan chhodate naiikhe. tahaar gardaniyaa vaalaa lekh padike bhojapuriye men likh taanii baaki ii angrejii gardan chodate naiikhe. tahaar qasba padhike niiche ke angarejii baancheke parelaa. aa okarii baad post comment aa tab leave your comment. ta jab tuu hindii men likhtaar aa etana badahan aadamii hauaa ta kaahena kuchhu eiisan karataad ki ii kamentao hindie men likhaa sake. ho sakelaa taharii lage ii ckament bancheke samayao na milat hokhe bakir jab likh tad ta kamentao banchal kar. aa ho sake ta kbbo kalhi ke uttaro de dihal kara.

uttar chaahe da chahe mati da baaki hindi padike kament hindi men kaise likhal jaai ii jaruur bataiiha.

je bhii e kament ke banchata o sabase ii binatii baa kii hamaro madad kariin sabhe kii hamahuun hindi men kament chahe aapan baati kahi sakiin.
namaskaar.
Jai Prakash Pathak

December 5, 2009 4:46 PM

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Friday, November 27, 2009

शिक्षा की परीक्षा

शिक्षा की परीक्षा
नमस्कार !
हालचाल ठीक है?
शिक्षा सबको मिले, कहाँ मिले, कैसे मिले, किसके द्वारा मिले। इसकी चर्चा छोड़कर केवल परीक्षा की चर्चा होती रहती है। जबसे शिक्षा की गुड़वत्ता बढ़ाने का प्रयास किया जाने लगा है शिक्षा समाप्त होने लगी है तथा शिक्षकों की नियुक्ति में सुबिधा शुल्क के चर्चे बढ़ने लगे हैं।वास्तविक स्थिति का ज्ञान न है न हो सकता है। शिक्षा बिना परीक्षा के नहीं हो सकती है, आपने क्या जाना इसे कैसे जानेंगे। मूल्यांकन या परीक्षा ही वह साधन है जिससे हम जान पाते हैं की हम कितना जानते हैं। यह बात भी है की हम परीक्षा से भरसक बचना चाहते हैं। परीक्षा हमारे भ्रम को तोड़ती है चाहे भ्रम अवमूल्यन का हो या अतिमूल्यांकन का। परीक्षा से चिंता और तनाव भी होता है। बिना परीक्षा के जीवन सम्भव नहीं है। तो तनाव से बचें या परीक्षा से। मैं समझता हूँ कि परीक्षा से जुड़ी दुश्चिंता व तनाव से जूझने की ताकत ही बढाने का उपाय सोचना चाहिए न कि परीक्षा से बचने के रास्ते खोजने काम करना चाहिए।

हमारे केन्द्रीय शिक्षा मंत्री जी केन्द्रीय परीक्षा परिषद् में हाईस्कूल में परीक्षा को वैकल्पिक बनाने की बात कर वोटबैंक की राजनीति भी कर लेना चाहते हैं। इससे किसका लाभ होनेवाला है। हमारे धनीमानी लोगों के बच्चे तो परीक्षा पास करें। गरीब बेचारे परीक्षाहीन प्रणाली का लाभ लेकर, हाईस्कूल का प्रमाणपत्र लेकर जब आजके प्रतियोगिता के युग में जाएँ तो उन्हें सबसे निचले पायदान पर खडा होने की जगह मिले।