परिधान, पहनावा, फैशन बनता बिगड़ता रहता है और बनाता बिगाड़ता रहता है. वर्गीकरण आदमी का स्वभाव है. फैशन के आधार पर भी लोगों का वर्गीकरण किया जा सकता है. भारत में चार वर्ण और सरकारी नौकरियों में चार वर्ग हैं. वेतनक्रम चाहे जितने हों. उसे दस वर्गों में बांधने की कोशिश आयोग दर आयोग होती रही है किन्तु अभी सफलता नहीं मिली है. ऊपर से हम समान रहना चाहते हैं. किन्तु भीतर असमान बनने की चाहत भी जोर मारती रहती है. हम सबसे बड़ा बनाना चाहते हैं. वैसे हम सभी अनन्य हैं. किन्तु हम भीतरी अनन्यता से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं. बाहरी समाज हमें समान बनाना चाहता है. इसलिए समाज चाहता है कि परिधान की डिजाईन एक जैसी हो अर्थात हम कुर्ता या कमीज ही पहने कपड़ा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार मंहगा या सस्ता हो सकता है. भीतर की अनन्यता चाह अलग ले जाना चाहती है और फैशन उसमें सहयोगी बनता है.
फैशन वालों के भी वर्ग हैं. कुछ उसे पहले अपनाते हैं धीरे धीरे दूसरे, तीसरे से होते हुए चौथे वर्ग तक फैशन का जाल पहुँच जाता है. इस प्रकार चौथा फैशनी वर्ग हरदम चौथे पायदान पर रहता है. कभी कभी शरीर अधिक से अधिक दिखाने का फैशन चलता है या कहें नंगई का फैशन चल पड़ता है. परिधान की मुख्य आवश्यकता के आधार पर वैज्ञानिक विधि से वस्त्रों के चलन पर किसी को विश्वास नहीं रहता है. अत: कपड़ों के आधार पर कुछ भी कहने पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात की जाने लगती है. वैसे किसी भी समूह अथवा संगठन को यदि कुछ अच्छा नहीं लगा तो मारपीट आगजनी आजकल आम बात हो चुकी है.
कपड़ों के अतिरिक्त बाल भी फैशन का शिकार होता रहा है . बाल की कटाई और सवांरने की शैली, चोटी बनाने की शैली, को लेकर प्रयोग होते रहे हैं. प्रायः महिलाओं के बड़े बाल और पुरुषों के छोटे बाल अंतर्राष्ट्रीय हैं किन्तु पहले महिलाओं ने बाल छोटे कराये तो पुरुषों ने बढ़ाना और चोटी बनाना शुरू किया.
परिधान और बाल के आधार पर संगठनों या समूहों की पहचान भी होती है या कहे कि विभिन्न सस्थाएं ,समूह और संगठन अपने परिधान नियम बनाएं हैं और उसका पालन भी करते हैं . यह उनकी कार्य प्रणाली के लिए भी जरूरी है.
सामान्य व्यक्ति के लिए वस्त्रों में समाज वाद जैसी चीज ही अधिक प्रशंशित है. यहाँ तक कि वस्त्रों और बाल के आधार पर व्यक्ति का प्रथम दृष्टया मूल्यांकन भी किया जाता है. इसीलिए फैशनी मध्यवर्ग लगभग एक जैसा दीखता है.
धनी अपनी अनन्यता धन आधारित सज्जा से, ज्ञानी अपनी अनन्यता अपने विचार से प्रकट कर सकता है. इसके लिए उसे ऊल जलूल कार्य करने की आवश्यकता नहीं होती है. गांधी के नाम पर टोपी चल पायी लंगोटी नहीं. हालांकि शायद ही गांधी ने कभी टोपी पहना हो.
