Monday, October 14, 2013

भारतीय उच्च शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. किन्तु भारतीय उच्च शिक्षा का हाल ठीक नहीं है. आज बीबीसी के रेहान फजल का ब्लाग देखा और उसे शेयर भी किया किन्तु लगता है कि कुछ और भी कहना चाहिये, इसलिये ब्लाग पर आ गया.
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिये जबसे नाक (NAAC) का कार्य प्रारम्भ हुआ तबसे ही संदेह उपजने लगा. इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के बाद संदेह विश्वास में बदलने लगा कि भारत के राजदल शिक्षा को भार मानते हैं और इसे बेचकर अकूत धन कमाना चाहते हैं.

उच्चशिक्षा की गुणवत्ता की बात महामहिम राष्ट्रपति  श्री प्रणव मुखर्जी भी कर रहे हैं. इस देश के नागरिक जानते हैं कि वे कितनी बार वित्तमंत्री रह चुके हैं. उच्चशिक्षा के स्तर की जानकारी उन्हें तब भी थी. 1966 के कोठारी आयोग द्वारा सबके लिये स्नातक स्तर की निःशुल्क शिक्षा की बात की गयी थी. उसी शिक्षा को अब बेचने की बात चल रही है , वह भी तब जब आयकर, सेवाकर के साथ शिक्षा उपकर लिया जाता है. कांग्रेस को छोड दें तो भाजपा भारतीय परम्परा की बात तो बहुत करती है किन्तु शिक्षा का धंधा करती है इसलिये निःशुल्क शिक्षा से उसे परहेज है. वह अपने सरस्वती शिक्षा मंदिरों को निजी विश्वविद्यालय में बदलने का सपना देखती है.

उच्च शिक्षा की दुर्दशा का प्रमुख कारण इस मद में बजट प्रावधान को कम करना रहा है. प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने की जगह प्रौढ शिक्षा और आंगन बाडी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसका नब्बे प्रतिशत धन हवा में उड जाता है. पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिली. आज भी गावों और शहरों के प्राथमिक पाठशाला मूलभूत संसाधनों के अभाव में हैं. शाला-शिक्षक-पुस्तक के अभाव में दर्जाफनौवल कर दिया जाता है. माध्यमिक शिक्षा की स्थिति उससे भी बदतर है. उच्चशिक्षा की स्थिति सबसे खराब है. आज के चिन्तक केवल उच्च शिक्षा  की गुणवत्ता पर अचानक हायतौबा मचा रहे हैं तो क्यों?

सरकार अब से भी चाहे तो  चरणबद्ध रूप से काम करने पर 2025  तक हम मानक स्तर पर पहुंच सकते हैं. इसके लिये हमें यह जानना होगा कि हमारी तब तक की युवा शक्ति को कहां भेजना है? सबके लिये मानक प्राथमिक शिक्षा की  ( कक्षा आठ तक  ) निःशुल्क व्यवस्था करनी होगी. इसके लिये मानक विद्यालय भवन, शिक्षक, पाठ्यपुस्तक चाहिये. शिक्षकों की आवश्कता की पूर्ति हेतु प्रत्येक तहसील स्तर पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र चाहिये. साथ ही स्नातक स्तर पर एक प्राथमिक शिक्षा का डिग्री पाठ्यक्रम चलाना चाहिये जिसके तीसरे  वर्ष में अध्यापन अनुभव होना चाहिये. यह काम हमें युद्ध स्तर पर 2016 तक पूरा करना होगा.

माध्यमिक विद्यालयों को  चार वर्ष का (नौवीं से बारहवीं कक्षा तक)  का पाठ्यक्रम चलाना चाहिये. सभी माध्यमिक विद्यालयों में  सभी स्ट्रीम की शिक्षा मिलनी चाहिये. इसके विद्यालय  भवन,  शिक्षक, पाठ्यक्रम चाहिये. इन सभी कार्यों के लिये प्राइवेट एजेंसियां नहीं चाहिये. सरकार को करनी होगी . इसके लिये संविधान में उल्लिखित वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को ध्यान में रखना होगा. शिक्षा को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना होगा. 2020 तक इस काम को पूरा करना होगा.

उच्चशिक्षा के केन्द्र महाविद्यालय और विश्वविद्यालय  को राजनीति से मुक्त करने के लिये कुलपतियों की नियुक्ति से सरकार को अपने से अलग कर लेना चाहिये. इस समय कुलपति  से लेकर चपरासी तक सभी पदों पर बोली लग जा रही है. जहां बोली नहीं है वहां वेतन नहीं है. दो हजार, आठ हजार, दस हजार प्रति माह पर नेट या पीयचडी शिक्षक भारत में ही मिलेंगे, और आप गुणवत्ता कि बात करेंगे.

समसामयिक जीवन के लिये किस क्षेत्र में किस तरह के कितने लोगों आवश्यकता है इसकी जानकारी करनी होगी. तदनुरूप पाठ्यक्रम और सभी सम्बन्धित साजोसामान की व्यवस्था सरकार को करनी पडेगी. यदि 1500  विश्वविद्यालय चाहिये तो भारत की जनता तो इतना कर(Tax) देती है कि 3000 विश्वविद्यालय चल सकें. जो लोग रोज यह कहते हैं कि कठोर निर्णय लेने पडेंगे उन लोगों ने कालेधन की उत्पत्ति रोकने , बाहर गये काले धन को वापस लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कौन से कठोर निर्णय लिये हैं.

जितने भी गुणवता निर्धारण करने वाले संस्थान  हैं उन सभी की गुण्वत्ता संदिग्ध है. नाक का क्या मानक है ?उसे पहले देश और प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मूल्यांकन करना चाहिये. निदेशालयों का मूल्यांकन करना चाहिये. महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में तिथि निर्धारित कर पहुंच जाना चाहिये. अभी तक नाक के वेबसाइट का हिन्दी संसकरण काम नहीं करता है.

हमारे माननीय  संसद में बैठकर संसद की गुणवत्ता जब तक नहीं बनायेगे तबतक भारत के किसी संस्था में गुण्वत्ता नहीं आयेगी. शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर उसे बेचने की तैयारी चल रही है. इससे जनता को सावधान होना होगा.

नमस्कार.

Sunday, October 13, 2013

विजयादशमी

विजयादशमी

नमस्कार!
हालचाल ठीक ही है. आज विजयादशमी, आश्विन, शुक्लपक्ष, विक्रमीय संवत २०७०,  चौदह अक्टूबर २०१३  है. हर्ष का पर्व है. भारतीय परम्परानुसार क्षत्रिय लोग शस्त्रपूजन करते हैं. दशहरा का मेला और छुट्टी. एक हंसी खुशी का त्यौहार , दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन की तिथि. यह सब कुछ आज अधर में लटका हुआ है. एक भयंकर तूफान पायलिन/फेलिन उडीसा से उत्तर पश्चिम की ओर बढते हुये कमजोर पडता जा रहा है. उसके प्रभाव से देवरिया में कल से ही बरसात हो रही है. कल रात से अबतक लगातार मध्यम गति से मध्यम हवा के साथ वर्षा ने उत्सव और और समारोह पर वास्तव में पानी फेर दिया है. सरकार की चैतन्यता से तूफान से सम्भावित जनहानि को बचा लिया गया है. किन्तु मध्यप्रदेश में दतिया के पास देवीदर्शन के समय प्रशासन की चूक से भयंकर भगदड में ९० लोग मर गये सैकडों घायल हो गये. तूफान प्रभावित क्षेत्र को छोडदिया जाय तो लोग बरसात के बाद आनन्दोत्सव में व्यस्त हैं.

राम भारत में भक्ति, अध्यात्म, समाज और राजनीति सबको अत्यधिक प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व है. भारत में राम से निरपेक्ष रहना कठिन है. कभी राम के साथ कभी राम के विरोध में. इस समय जब मैं यह ब्लाग टंकित कर रहा हूं साथ साथ जगजीत सिंह का राम भजन सुन रहा हूं. कथा के अनुसार राम का अवतार एक काल विशेष में एक कार्य विशेष  के लिये हुआ था. वह कार्य सम्पन्न कर राम ने जलसमाधि ले लिया.

अब राम के नाम पर केवल राजनीति चल रही है. वह राजनीति भक्ति की हो या शक्ति की. लोग अपनी बुद्धि के अनुरूप राम की व्याख्या में लगे हैं. इसके अतिरिक्त  शैव, वैष्णव, शाक्त,  तांत्रिक, मान्त्रिक, वामाचारी, अघोरी आदि न जाने कितने लोग लोगों को लुभाकर उनकी श्रद्धा के कारण अपने नाम और धाम को चमका रहे हैं. मनुष्य के जन्म के साथ ही तरह तरह की समस्यायें शुरु हो जाती हैं, इन सभी समस्याओं का निराकरण किसी स्पष्ट वैज्ञानिक विधि से सम्भव नहीं हो पाता. जिन समस्याओं का निराकरण सपष्ट है उसके लिये कोई राम के पास नहीं जाता. लेकिन असमाधानशील समस्याओं ्के निवारण के लिये लोग अवैज्ञानिक विधियों का सहयोग लेते हैं इसमें लगभग सभी आ जाते हैं.

राम रामलीला के बहाने बचपन में जो आनन्द दे जाते हैं वह आजीवन रस देता रहता है. और दशहरा मनाया जाता रहेगा. जब हम किसी भी खेल में जीत होने पर इतने मगन हो जाते हैं तो एक समय के राष्ट्र के जीत पर लोगों ने खुशी मनायी और वह चल रही है. आधुनिक लोग तो सचिन को भी भगवान बना चुके हैं. जो बचपन में आत्मसात हो जाता है उसे बाद के ज्ञान और तर्क द्वारा भले ही मानस से निकालने का प्रयास किया जाय वह पुनः स्थापित हो जाता है. साम्स्कृतिक परिवर्तन और जीवन की आवश्यकता के कारण बहुत सी विचित्र बातें दिखाई देने लगती हैं. यह व्यक्ति के मूल्य का प्रश्न है.

भोजपुरी में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को दुर्गा भसान कहते हैं. आज दुर्गा भसान का दिन भी है वर्षा हो रही है. आज स्थगित ही होगा लोग इसे अब पूर्णिमा तक ले जा सकते हैं.

इन सारी गतिविधियों के सक्रिय भागीदार, समर्थक, निरपेक्ष, विरोधी, निन्दक,  सभी को अपना लक्ष्य मिल जाय और किसी के मन में कोई ग्रंथि न रहे, सभी मानसिक रूप से स्वस्थ रहें यही त्यौहार की उपयोगिता है.

नमस्कार.

Saturday, October 12, 2013

जनता, राजदल और सरकार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. शहर में ढोल नगाडे बज रहे हैं. महाष्टमी की तिथि . लोग व्रत हैं. हवन करेंगे. कुछ लोग को यह खर्च बिल्कुल बेकार लगता है. धर्म अफीम की तरह नशा है. सत्ता भी नशा है. प्रतिशोध की भावना भी नशा है. जो जन्म से इन बातों को देखते रहे हैं उनके स्वभाव में इनके प्रति प्रतिरोध नहीं है. अधिकांश जनता तो ऐसी ही है. कन्फ्यूजन में पडी हुई. डरी सहमी हुई. आलस्य में डूबी हुई. पिछले सौ वर्ष में कोई एक व्यक्ति है जिसकी बात से सभी सहमत हों. शायद नहीं. पहले भद्रलोक ( ज्ञानी, विज्ञानी ,धर्मी ,धर्मी, वादी , विवादी) रास्ता तय कर ले. जनता को भी राह मिल जाये. भारत के लिये क्या ठीक है , संविधान में तो "समाजवाद" का उल्लेख कर दिया गया और बताया ही नहीं गया कि यह क्या बला है. मुलायम समाजवाद और बहुजन अम्बेडकरवाद तो इतना धन देता है कि आयकर और सीबीआई समझ ही नहीं पाते कि यह क्या है. कचहरी मे जाते हैं और आते है.

जनता अपनी कुंठा, विषाद, चिंता आदि को हवन में जला देती हैं. पुरोहितवाद अशिक्षा की देन है, शिक्षा के प्रसार होने पर पुरोहितवाद धीरे धीरे खत्म हो सकता है यदि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये. भ्रष्टाचार भाग्य के रूप में स्थापित होता जा रहा है. जनता भ्रष्टाचार जनित परिस्थिति को भाग्य मान लेती है. हर व्यक्ति अपना काम कराने के लिये सोर्स, सिफारिस घूस का सहयोग ले लेता है और भगवान को प्रसाद चढा देता है तथा मित्रों बन्धु बान्धवों की नजर न लगे इसलिये उन्हें कुछ प्रसाद भोजन करा देता है. नजर से बचने के लिये चरणपूजन भी  करता है. नेता चाहे किसी भी दल का हो चरण पूजन करवाता है. जनता भी करती रहती है.

सभी राजदल धर्म को अपना साधन बनाने की कोशिश में लगे हैं. नवरात्रि का व्रत अनिवार्य तो नहीं है. किन्तु हर धर्म या विचारधारा या वाद को जन्म से मृत्यु पर्यन्त प्रमुख गतिविधियों के लिये विधि या कर्मकांड निर्धारित ही करने पडेंगे. जनता को जब तक नया और पूर्ण विकल्प जब तक नहीं मिलेगा तब तक पुराने कर्मकांड चलते ही रहेंगे. मूर्तियां तो बनती रहेंगी. विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, यीशु. मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा. गांधी , नेहरू, अम्बेडकर, ्कांसीराम,मायावती, मार्क्स,लेनिन आदि हर देश में हर वेष में. अच्छा लगे तो राम लीला, रावणलीला, दुर्गापूजा, असुर पूजा करते रहिये.

अब तो टीवी तरह तरह की लीला और बीच में विज्ञापन , हरतरह की पत्रिकाओं में सम्पादकों के धर्म और आडम्बर के विरुद्ध लेख और साथ में यौन जीवन के लिये दवा, टानिक जनता देख रही है और उसे भी आजमा  रही है. सभी पुरोहितों की कमाई से अधिक कमाई यौन टानिकों के माध्यम से होती है जिसे हमारे क्रांतिकारी सम्पादक अपनी विश्वसनीयता बांट देते हैं.

पुराने जमाने में वोट देने के लिये पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लेना आम बात थी. आज कल का सभ्य इन्टर्नेटिया समाज बूथ्कैप्चरिंग मेम माहिर हो गया है. एक ही आदमी जितना चाहे उतना वोट दे सकता है. इस फर्जी मतदान के आधार पर जिसे चाहे उसे महान बना दीजिये. जनता क्या करे. पढे लिखे बुद्धिजीवी समाज के इन्टरनेटिया फर्जी मतदान को कैसे रोके?

हमारे राजदल पंजीकृत होते हैं, चुनाव आयोग पंजीकरण करता है. नेता तय करते हैं कि दल क्या करेंगे. किसी में भी आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. ईनके धन का कोई हिसाब नहीं. जो चाहे सो करें. मंत्री जी सरकार के खर्चे पर सरकार का वेतन लेते हुये मनमानी बोलते रहते हैं. लोकसेवक यदि सरकार से वेतन पाता है तो उसकी आचार संहिता है. जो नेता सरकार से वेतन लेता है वह कुछ भी बोलने के लिये स्वतंत्र नही होना चहिये.

आइये आशा करें कि हमारे पथप्रदर्शक निष्पक्षता पूर्वक ऐसा व्यवहार करेंगे जो अनुकरणीय होगा. चैनल और मीडिया के लोग अपने आचार पर भी विचार करेंगे. जनता जो कनफ्यूजन में निर्णय के लिये दूसरों का मुंह देख रही है उसे उचित मार्ग मिलेगा. वह ठगा नहीं जायेगा छला नहीं जायेगा.

हमें अन्याय से लडने की शक्ति चाहिये , शक्ति चाहिये, शक्ति चाहिये.

नमस्कार.

Friday, October 11, 2013

"प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. त्यौहार का मौसम है. नवरात्रि से छठ तक भक्तिमय वातावरण है. गत दो दिन से महातूफान की चेतावनी चल रही एक भयंकर प्रलयंकर तूफान आज १२/१०/१३ की रात कभी भी भारत की धरती को छूने वाला है. आज नवरात्रि की अष्टमी तिथि है जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं. हमलोग बचपन से इस व्रत को करते आ रहे हैं. मेरे बचपन में इस व्रत का प्रचलन बहुत कम था. इस क्षेत्र में व्यवसायी (वैश्य) लोग दुर्गा पाठ कराते थे. पहले इस पाठ को बडे गोपनीय ढंग से कराया जाता था. कुछ लोग मूर्ति स्थापित कराते थे. धीरे धीरे इसका प्रसार होता चला गया . मानव उत्सव धर्मी है. उसे उत्सव मनाना ही है चाहे जिस रूप में मनाये.

भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाया गया. संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार दे दिये गये. राजनैतिक समानता मिल गयी. भारत में इस कारण पुराने भद्रजनों के साथ साथ नये भद्रजन जुडते चले गये. नये भद्र जन भी पुराने भद्रजनों की लीक पर चलने लगे.

वर्ण और जाति व्यवस्था का वैधानिक रूप समाप्त हो गया. आधुनिक  वैज्ञानिक जीवन  पद्धति का विकास होने लगा. समाजवाद की साम्यवाद की चर्चा आम होने लगी. राजा और राज व्यवस्था समाप्त हो गयी. प्रिवीपर्स की समाप्ति के साथ साथ राजा नाम भी समाप्त हो गया. सांसद और विधायक अपने को राजा कहने/मानने  लगे. जो एक बार राजनैतिक पैठ बनाया वह आजीवन पद और सुविधाओं को अपने पास करने के लिये नाना प्रकार के अनैतिक उपाय में जुट गया. इस क्रम में वर्ण और जाति को पुनः जीवित किया गया और राजभद्र लोगों ने इसके बहाने लोगों में आन्तरिक द्वेष फैलाने में पूर्णतः सफल हो गये. सम्प्रदाय के नाम पर बंटे भारत में समूह बनाकर राजभद्र लोग पद प्रतिष्ठा और धन की मनभर लूट की और कर रहे हैं. सबके पास नामी और बेनामी तथा विदेशी बैंको में अकूत सम्पत्ति भरी हुई है.

अपने धन और पद की रक्षा के लिये रोज नये हथकंडे अपनाये जाते हैं. पिछले दो या तीन वर्षों में मूल निवासी और महिषासुर पूजन की चर्चा शुरु हो गयी है. आज इस संदर्भ राजीव रंजन प्रसाद का एक अच्छा लेख पढ्ने को मिला.

समकालीन स्थिति में केजी से लेकर पीजी तक शिक्षा की स्थिति बदहाल है न स्कूल हैं न शिक्षक हैं न आधुनिक पाठ्यक्रम है. इस बदहाली को तभी समाप्त किया जा सकता है जब सभी इसकी लडाई लडे. जब सभी के लिये व्यवस्था हो जायेगी तो जाति, वर्ग, लिंग, सम्प्रदाय की बात समाप्त हो जायेगी. चिकित्सा सबकी आवश्यकता है. इसकी चपेट में आते ही अच्छे अच्छों की हालत खराब हो जाती है. भारत में सबके लिये निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था की लडाई सभी की लडाई है. सभी एक हो जायेगे तो दवा मे लूट समाप्त हो जायेगी.

धार्मिक/ मिथकीय आधारों पर मनाये जाने वाले समारोहों को राजनैतिक न बनाकर भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. "प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य" हे मां सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करें.
नमस्कार.

Wednesday, October 2, 2013

महात्मा मोहन दास गांधी

महात्मा मोहन दास गांधी
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. आज दो अक्टूबर है. भारत का  राष्ट्रीय पर्व है. भारत के लोग गांधी से पिंड छुडाना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें नोट में छापकर घर घर पहूंचा दिया है. आन्दोलन करना हो तो भारत में गांधी का मार्ग लेना पडेगा किन्तु साथ में भीड भी रखना होगा. अगर भीड हटी तो इरोम जैसे गान्घीगीरी करते रहिये कोई फर्क नहीं पडेगा, राहुल गांघी की एक आवाज पर सिट्टी पिट्टी गुम.

गांधी के लिये मेरे मन में आदर रहा है, अभी भी आदर है, ऐसा राजनेता जो समाजसेवा के लिये राजनीति करता है. औसत भारतीय जैसा रहने और खाने व पहनने की आदत डाल लेता है. सत्य पर कायम रहने की कोशिश करता है. लोग आदर से महात्मा कहते हैं अभी भी तमाम आन्दोलन कर्मी गान्धी को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं. भारत के लोग भगत सिंह को भी बहुत आदर देते हैं लेकिन उनके अनुसरणकर्ताओं की कमी है. सुभाष के नाम पर भी गांधी को बहुत अधिक बुरा भला कहा जाता है. ऐसा तो सम्भव नहीं है कि किसी भी राजनेता की हर बात सर्वकालिक  हो, समय के साथ साथ परिवर्तन जरूरी होता है.

स्वदेशी और चरखा गांधी के बडे हथियार सिद्ध हुये थे. कुटीर उद्योग की भि वकालत की गयी थी. उस समय की आवश्यकता भी थी. स्वदेशी का विकल्प क्या है? हमारा दैनिक जीवन जितना ही अधिक स्वदेशी पर निर्भर अर्थात आत्मनिर्भर होगा हमारी उन्नति  होगी. जापान और चीन हमारी सम्स्कृति के नजदीक हैं. हम उनसे काफी पीछे हैं, लगभग हर क्षेत्र में पीछे हैं. जापान का जनसंख्या घनत्व हमारी अपेक्षा बहुत अधिक है किन्तु हम जनसंख्या के नाम पर भ्रष्टाचार और घोटाले करते रहे. गांधी के नाम पर वोट लेने के लिये भाजपा नीत शासनकाल में भी भारत की नोट से गांघी नहीं हटाये गये. नोट पर तो मात्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह और रिजर्व बैंक का चिन्ह होना चाहिये. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का आदर होना चाहिये. अभी भी स्वदेशी की प्रासंगिकता उतनी ही है. हमें पूरे विश्व पर नजर रखते हुये तकनीक के हर क्षेत्र में स्वदेशी को बढावा देना चाहिये. हम जितना ही आत्म निर्भर होंगे मुद्रासंकट से उतना ही मुक्त रहेंगे.

गांधी एक वकील थे, वकालत उन्हें रास नहीं आयी.  क्यों ? (आसाराम के वकील). आज जो भी वकील राजनीति में आ रहे हैं वकालत को छोडकर नहीं आ रहे हैं. उन्हें धन और राजसुख चाहिये, इसके लिये वे सत्ता को सत्य से दूर करने का हर उपाय शासन को बताते हैं ऐसी स्थिति में क्या जनता से उम्मीद की जा सकती है कि वह कानून और संविधान का सम्मान करे.

राजनेता अधिकारियों को निलंबित, स्थानान्तरित,  मौखिक प्रताडना आदि से दबाव बनाकर लगातार अवैधानिक कार्य कराते हैं इसका प्रमाण खोजकर न्यायालय में सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है किन्तु जिस प्रकार यह काम किया जाता है उसका संदेश तो जनता में जाता ही है. गांधी के देश में राजपद पर रहते हुये गांधी के चित्र के नीचे ही यह काम हो तो गांधी की प्रासंगिकता को ही समाप्त करता है."लगे रहो मुन्नाभाई" का किरदार निभानेवाला अपनी गलती स्वीकार कर जेल जाने को तैयार नहीं होता. जब किरदार निभाने वाले के चरित्र में परिवर्तन नहीं हो पाता तो यह फिल्म मात्र मनोरंजन ही तो कर पायेगी.

मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ही अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये गान्धी को निरंतर अप्रासंगिक बनाने का काम करती रही है. जब किसी व्यक्ति को अप्रासंगिक बनाना हो तो उसकी मूर्ति बना लिया जाय. उसपर माला चढाया जाय, उसकी पूजा की जाय, उसके विचार कालवाह्य हो जायेंगे. गांधी स्मारक स्थल पर जितनी गैस जला दी जाती है उससे गांधी के जीवन भर के त्याग की   तपस्या नष्ट हो जाती है.

लुटियन दिल्ली को बिल्कुल नष्ट कर राजशाही और अंग्रेजों के बनाये राजप्रतीकों नष्ट कर जनता के प्रतिनिधियों के लिये और जनता को अपनी बात कहने का स्थान बनाना चाहिये. स्वदेशी का प्रारम्भ यही से होना चाहिये.

बाकी बहुत कुछ है फिर कभी..
इस बकवास में कुछ सार्थक हो तो बताइयेगा.
नमस्कार!