नमस्कार!
हालचाल ठीक है. त्यौहार का मौसम है. नवरात्रि से छठ तक भक्तिमय वातावरण है. गत दो दिन से महातूफान की चेतावनी चल रही एक भयंकर प्रलयंकर तूफान आज १२/१०/१३ की रात कभी भी भारत की धरती को छूने वाला है. आज नवरात्रि की अष्टमी तिथि है जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं. हमलोग बचपन से इस व्रत को करते आ रहे हैं. मेरे बचपन में इस व्रत का प्रचलन बहुत कम था. इस क्षेत्र में व्यवसायी (वैश्य) लोग दुर्गा पाठ कराते थे. पहले इस पाठ को बडे गोपनीय ढंग से कराया जाता था. कुछ लोग मूर्ति स्थापित कराते थे. धीरे धीरे इसका प्रसार होता चला गया . मानव उत्सव धर्मी है. उसे उत्सव मनाना ही है चाहे जिस रूप में मनाये.
भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाया गया. संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार दे दिये गये. राजनैतिक समानता मिल गयी. भारत में इस कारण पुराने भद्रजनों के साथ साथ नये भद्रजन जुडते चले गये. नये भद्र जन भी पुराने भद्रजनों की लीक पर चलने लगे.
वर्ण और जाति व्यवस्था का वैधानिक रूप समाप्त हो गया. आधुनिक वैज्ञानिक जीवन पद्धति का विकास होने लगा. समाजवाद की साम्यवाद की चर्चा आम होने लगी. राजा और राज व्यवस्था समाप्त हो गयी. प्रिवीपर्स की समाप्ति के साथ साथ राजा नाम भी समाप्त हो गया. सांसद और विधायक अपने को राजा कहने/मानने लगे. जो एक बार राजनैतिक पैठ बनाया वह आजीवन पद और सुविधाओं को अपने पास करने के लिये नाना प्रकार के अनैतिक उपाय में जुट गया. इस क्रम में वर्ण और जाति को पुनः जीवित किया गया और राजभद्र लोगों ने इसके बहाने लोगों में आन्तरिक द्वेष फैलाने में पूर्णतः सफल हो गये. सम्प्रदाय के नाम पर बंटे भारत में समूह बनाकर राजभद्र लोग पद प्रतिष्ठा और धन की मनभर लूट की और कर रहे हैं. सबके पास नामी और बेनामी तथा विदेशी बैंको में अकूत सम्पत्ति भरी हुई है.
अपने धन और पद की रक्षा के लिये रोज नये हथकंडे अपनाये जाते हैं. पिछले दो या तीन वर्षों में मूल निवासी और महिषासुर पूजन की चर्चा शुरु हो गयी है. आज इस संदर्भ राजीव रंजन प्रसाद का एक अच्छा लेख पढ्ने को मिला.
समकालीन स्थिति में केजी से लेकर पीजी तक शिक्षा की स्थिति बदहाल है न स्कूल हैं न शिक्षक हैं न आधुनिक पाठ्यक्रम है. इस बदहाली को तभी समाप्त किया जा सकता है जब सभी इसकी लडाई लडे. जब सभी के लिये व्यवस्था हो जायेगी तो जाति, वर्ग, लिंग, सम्प्रदाय की बात समाप्त हो जायेगी. चिकित्सा सबकी आवश्यकता है. इसकी चपेट में आते ही अच्छे अच्छों की हालत खराब हो जाती है. भारत में सबके लिये निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था की लडाई सभी की लडाई है. सभी एक हो जायेगे तो दवा मे लूट समाप्त हो जायेगी.
धार्मिक/ मिथकीय आधारों पर मनाये जाने वाले समारोहों को राजनैतिक न बनाकर भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. "प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य" हे मां सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करें.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है. त्यौहार का मौसम है. नवरात्रि से छठ तक भक्तिमय वातावरण है. गत दो दिन से महातूफान की चेतावनी चल रही एक भयंकर प्रलयंकर तूफान आज १२/१०/१३ की रात कभी भी भारत की धरती को छूने वाला है. आज नवरात्रि की अष्टमी तिथि है जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं. हमलोग बचपन से इस व्रत को करते आ रहे हैं. मेरे बचपन में इस व्रत का प्रचलन बहुत कम था. इस क्षेत्र में व्यवसायी (वैश्य) लोग दुर्गा पाठ कराते थे. पहले इस पाठ को बडे गोपनीय ढंग से कराया जाता था. कुछ लोग मूर्ति स्थापित कराते थे. धीरे धीरे इसका प्रसार होता चला गया . मानव उत्सव धर्मी है. उसे उत्सव मनाना ही है चाहे जिस रूप में मनाये.
भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाया गया. संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार दे दिये गये. राजनैतिक समानता मिल गयी. भारत में इस कारण पुराने भद्रजनों के साथ साथ नये भद्रजन जुडते चले गये. नये भद्र जन भी पुराने भद्रजनों की लीक पर चलने लगे.
वर्ण और जाति व्यवस्था का वैधानिक रूप समाप्त हो गया. आधुनिक वैज्ञानिक जीवन पद्धति का विकास होने लगा. समाजवाद की साम्यवाद की चर्चा आम होने लगी. राजा और राज व्यवस्था समाप्त हो गयी. प्रिवीपर्स की समाप्ति के साथ साथ राजा नाम भी समाप्त हो गया. सांसद और विधायक अपने को राजा कहने/मानने लगे. जो एक बार राजनैतिक पैठ बनाया वह आजीवन पद और सुविधाओं को अपने पास करने के लिये नाना प्रकार के अनैतिक उपाय में जुट गया. इस क्रम में वर्ण और जाति को पुनः जीवित किया गया और राजभद्र लोगों ने इसके बहाने लोगों में आन्तरिक द्वेष फैलाने में पूर्णतः सफल हो गये. सम्प्रदाय के नाम पर बंटे भारत में समूह बनाकर राजभद्र लोग पद प्रतिष्ठा और धन की मनभर लूट की और कर रहे हैं. सबके पास नामी और बेनामी तथा विदेशी बैंको में अकूत सम्पत्ति भरी हुई है.
अपने धन और पद की रक्षा के लिये रोज नये हथकंडे अपनाये जाते हैं. पिछले दो या तीन वर्षों में मूल निवासी और महिषासुर पूजन की चर्चा शुरु हो गयी है. आज इस संदर्भ राजीव रंजन प्रसाद का एक अच्छा लेख पढ्ने को मिला.
समकालीन स्थिति में केजी से लेकर पीजी तक शिक्षा की स्थिति बदहाल है न स्कूल हैं न शिक्षक हैं न आधुनिक पाठ्यक्रम है. इस बदहाली को तभी समाप्त किया जा सकता है जब सभी इसकी लडाई लडे. जब सभी के लिये व्यवस्था हो जायेगी तो जाति, वर्ग, लिंग, सम्प्रदाय की बात समाप्त हो जायेगी. चिकित्सा सबकी आवश्यकता है. इसकी चपेट में आते ही अच्छे अच्छों की हालत खराब हो जाती है. भारत में सबके लिये निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था की लडाई सभी की लडाई है. सभी एक हो जायेगे तो दवा मे लूट समाप्त हो जायेगी.
धार्मिक/ मिथकीय आधारों पर मनाये जाने वाले समारोहों को राजनैतिक न बनाकर भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. "प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य" हे मां सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करें.
नमस्कार.
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