Saturday, October 12, 2013

जनता, राजदल और सरकार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. शहर में ढोल नगाडे बज रहे हैं. महाष्टमी की तिथि . लोग व्रत हैं. हवन करेंगे. कुछ लोग को यह खर्च बिल्कुल बेकार लगता है. धर्म अफीम की तरह नशा है. सत्ता भी नशा है. प्रतिशोध की भावना भी नशा है. जो जन्म से इन बातों को देखते रहे हैं उनके स्वभाव में इनके प्रति प्रतिरोध नहीं है. अधिकांश जनता तो ऐसी ही है. कन्फ्यूजन में पडी हुई. डरी सहमी हुई. आलस्य में डूबी हुई. पिछले सौ वर्ष में कोई एक व्यक्ति है जिसकी बात से सभी सहमत हों. शायद नहीं. पहले भद्रलोक ( ज्ञानी, विज्ञानी ,धर्मी ,धर्मी, वादी , विवादी) रास्ता तय कर ले. जनता को भी राह मिल जाये. भारत के लिये क्या ठीक है , संविधान में तो "समाजवाद" का उल्लेख कर दिया गया और बताया ही नहीं गया कि यह क्या बला है. मुलायम समाजवाद और बहुजन अम्बेडकरवाद तो इतना धन देता है कि आयकर और सीबीआई समझ ही नहीं पाते कि यह क्या है. कचहरी मे जाते हैं और आते है.

जनता अपनी कुंठा, विषाद, चिंता आदि को हवन में जला देती हैं. पुरोहितवाद अशिक्षा की देन है, शिक्षा के प्रसार होने पर पुरोहितवाद धीरे धीरे खत्म हो सकता है यदि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये. भ्रष्टाचार भाग्य के रूप में स्थापित होता जा रहा है. जनता भ्रष्टाचार जनित परिस्थिति को भाग्य मान लेती है. हर व्यक्ति अपना काम कराने के लिये सोर्स, सिफारिस घूस का सहयोग ले लेता है और भगवान को प्रसाद चढा देता है तथा मित्रों बन्धु बान्धवों की नजर न लगे इसलिये उन्हें कुछ प्रसाद भोजन करा देता है. नजर से बचने के लिये चरणपूजन भी  करता है. नेता चाहे किसी भी दल का हो चरण पूजन करवाता है. जनता भी करती रहती है.

सभी राजदल धर्म को अपना साधन बनाने की कोशिश में लगे हैं. नवरात्रि का व्रत अनिवार्य तो नहीं है. किन्तु हर धर्म या विचारधारा या वाद को जन्म से मृत्यु पर्यन्त प्रमुख गतिविधियों के लिये विधि या कर्मकांड निर्धारित ही करने पडेंगे. जनता को जब तक नया और पूर्ण विकल्प जब तक नहीं मिलेगा तब तक पुराने कर्मकांड चलते ही रहेंगे. मूर्तियां तो बनती रहेंगी. विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, यीशु. मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा. गांधी , नेहरू, अम्बेडकर, ्कांसीराम,मायावती, मार्क्स,लेनिन आदि हर देश में हर वेष में. अच्छा लगे तो राम लीला, रावणलीला, दुर्गापूजा, असुर पूजा करते रहिये.

अब तो टीवी तरह तरह की लीला और बीच में विज्ञापन , हरतरह की पत्रिकाओं में सम्पादकों के धर्म और आडम्बर के विरुद्ध लेख और साथ में यौन जीवन के लिये दवा, टानिक जनता देख रही है और उसे भी आजमा  रही है. सभी पुरोहितों की कमाई से अधिक कमाई यौन टानिकों के माध्यम से होती है जिसे हमारे क्रांतिकारी सम्पादक अपनी विश्वसनीयता बांट देते हैं.

पुराने जमाने में वोट देने के लिये पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लेना आम बात थी. आज कल का सभ्य इन्टर्नेटिया समाज बूथ्कैप्चरिंग मेम माहिर हो गया है. एक ही आदमी जितना चाहे उतना वोट दे सकता है. इस फर्जी मतदान के आधार पर जिसे चाहे उसे महान बना दीजिये. जनता क्या करे. पढे लिखे बुद्धिजीवी समाज के इन्टरनेटिया फर्जी मतदान को कैसे रोके?

हमारे राजदल पंजीकृत होते हैं, चुनाव आयोग पंजीकरण करता है. नेता तय करते हैं कि दल क्या करेंगे. किसी में भी आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. ईनके धन का कोई हिसाब नहीं. जो चाहे सो करें. मंत्री जी सरकार के खर्चे पर सरकार का वेतन लेते हुये मनमानी बोलते रहते हैं. लोकसेवक यदि सरकार से वेतन पाता है तो उसकी आचार संहिता है. जो नेता सरकार से वेतन लेता है वह कुछ भी बोलने के लिये स्वतंत्र नही होना चहिये.

आइये आशा करें कि हमारे पथप्रदर्शक निष्पक्षता पूर्वक ऐसा व्यवहार करेंगे जो अनुकरणीय होगा. चैनल और मीडिया के लोग अपने आचार पर भी विचार करेंगे. जनता जो कनफ्यूजन में निर्णय के लिये दूसरों का मुंह देख रही है उसे उचित मार्ग मिलेगा. वह ठगा नहीं जायेगा छला नहीं जायेगा.

हमें अन्याय से लडने की शक्ति चाहिये , शक्ति चाहिये, शक्ति चाहिये.

नमस्कार.

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