महात्मा मोहन दास गांधी
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. आज दो अक्टूबर है. भारत का राष्ट्रीय पर्व है. भारत के लोग गांधी से पिंड छुडाना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें नोट में छापकर घर घर पहूंचा दिया है. आन्दोलन करना हो तो भारत में गांधी का मार्ग लेना पडेगा किन्तु साथ में भीड भी रखना होगा. अगर भीड हटी तो इरोम जैसे गान्घीगीरी करते रहिये कोई फर्क नहीं पडेगा, राहुल गांघी की एक आवाज पर सिट्टी पिट्टी गुम.
गांधी के लिये मेरे मन में आदर रहा है, अभी भी आदर है, ऐसा राजनेता जो समाजसेवा के लिये राजनीति करता है. औसत भारतीय जैसा रहने और खाने व पहनने की आदत डाल लेता है. सत्य पर कायम रहने की कोशिश करता है. लोग आदर से महात्मा कहते हैं अभी भी तमाम आन्दोलन कर्मी गान्धी को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं. भारत के लोग भगत सिंह को भी बहुत आदर देते हैं लेकिन उनके अनुसरणकर्ताओं की कमी है. सुभाष के नाम पर भी गांधी को बहुत अधिक बुरा भला कहा जाता है. ऐसा तो सम्भव नहीं है कि किसी भी राजनेता की हर बात सर्वकालिक हो, समय के साथ साथ परिवर्तन जरूरी होता है.
स्वदेशी और चरखा गांधी के बडे हथियार सिद्ध हुये थे. कुटीर उद्योग की भि वकालत की गयी थी. उस समय की आवश्यकता भी थी. स्वदेशी का विकल्प क्या है? हमारा दैनिक जीवन जितना ही अधिक स्वदेशी पर निर्भर अर्थात आत्मनिर्भर होगा हमारी उन्नति होगी. जापान और चीन हमारी सम्स्कृति के नजदीक हैं. हम उनसे काफी पीछे हैं, लगभग हर क्षेत्र में पीछे हैं. जापान का जनसंख्या घनत्व हमारी अपेक्षा बहुत अधिक है किन्तु हम जनसंख्या के नाम पर भ्रष्टाचार और घोटाले करते रहे. गांधी के नाम पर वोट लेने के लिये भाजपा नीत शासनकाल में भी भारत की नोट से गांघी नहीं हटाये गये. नोट पर तो मात्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह और रिजर्व बैंक का चिन्ह होना चाहिये. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का आदर होना चाहिये. अभी भी स्वदेशी की प्रासंगिकता उतनी ही है. हमें पूरे विश्व पर नजर रखते हुये तकनीक के हर क्षेत्र में स्वदेशी को बढावा देना चाहिये. हम जितना ही आत्म निर्भर होंगे मुद्रासंकट से उतना ही मुक्त रहेंगे.
गांधी एक वकील थे, वकालत उन्हें रास नहीं आयी. क्यों ? (आसाराम के वकील). आज जो भी वकील राजनीति में आ रहे हैं वकालत को छोडकर नहीं आ रहे हैं. उन्हें धन और राजसुख चाहिये, इसके लिये वे सत्ता को सत्य से दूर करने का हर उपाय शासन को बताते हैं ऐसी स्थिति में क्या जनता से उम्मीद की जा सकती है कि वह कानून और संविधान का सम्मान करे.
राजनेता अधिकारियों को निलंबित, स्थानान्तरित, मौखिक प्रताडना आदि से दबाव बनाकर लगातार अवैधानिक कार्य कराते हैं इसका प्रमाण खोजकर न्यायालय में सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है किन्तु जिस प्रकार यह काम किया जाता है उसका संदेश तो जनता में जाता ही है. गांधी के देश में राजपद पर रहते हुये गांधी के चित्र के नीचे ही यह काम हो तो गांधी की प्रासंगिकता को ही समाप्त करता है."लगे रहो मुन्नाभाई" का किरदार निभानेवाला अपनी गलती स्वीकार कर जेल जाने को तैयार नहीं होता. जब किरदार निभाने वाले के चरित्र में परिवर्तन नहीं हो पाता तो यह फिल्म मात्र मनोरंजन ही तो कर पायेगी.
मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ही अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये गान्धी को निरंतर अप्रासंगिक बनाने का काम करती रही है. जब किसी व्यक्ति को अप्रासंगिक बनाना हो तो उसकी मूर्ति बना लिया जाय. उसपर माला चढाया जाय, उसकी पूजा की जाय, उसके विचार कालवाह्य हो जायेंगे. गांधी स्मारक स्थल पर जितनी गैस जला दी जाती है उससे गांधी के जीवन भर के त्याग की तपस्या नष्ट हो जाती है.
लुटियन दिल्ली को बिल्कुल नष्ट कर राजशाही और अंग्रेजों के बनाये राजप्रतीकों नष्ट कर जनता के प्रतिनिधियों के लिये और जनता को अपनी बात कहने का स्थान बनाना चाहिये. स्वदेशी का प्रारम्भ यही से होना चाहिये.
बाकी बहुत कुछ है फिर कभी..
इस बकवास में कुछ सार्थक हो तो बताइयेगा.
नमस्कार!
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. आज दो अक्टूबर है. भारत का राष्ट्रीय पर्व है. भारत के लोग गांधी से पिंड छुडाना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें नोट में छापकर घर घर पहूंचा दिया है. आन्दोलन करना हो तो भारत में गांधी का मार्ग लेना पडेगा किन्तु साथ में भीड भी रखना होगा. अगर भीड हटी तो इरोम जैसे गान्घीगीरी करते रहिये कोई फर्क नहीं पडेगा, राहुल गांघी की एक आवाज पर सिट्टी पिट्टी गुम.
गांधी के लिये मेरे मन में आदर रहा है, अभी भी आदर है, ऐसा राजनेता जो समाजसेवा के लिये राजनीति करता है. औसत भारतीय जैसा रहने और खाने व पहनने की आदत डाल लेता है. सत्य पर कायम रहने की कोशिश करता है. लोग आदर से महात्मा कहते हैं अभी भी तमाम आन्दोलन कर्मी गान्धी को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं. भारत के लोग भगत सिंह को भी बहुत आदर देते हैं लेकिन उनके अनुसरणकर्ताओं की कमी है. सुभाष के नाम पर भी गांधी को बहुत अधिक बुरा भला कहा जाता है. ऐसा तो सम्भव नहीं है कि किसी भी राजनेता की हर बात सर्वकालिक हो, समय के साथ साथ परिवर्तन जरूरी होता है.
स्वदेशी और चरखा गांधी के बडे हथियार सिद्ध हुये थे. कुटीर उद्योग की भि वकालत की गयी थी. उस समय की आवश्यकता भी थी. स्वदेशी का विकल्प क्या है? हमारा दैनिक जीवन जितना ही अधिक स्वदेशी पर निर्भर अर्थात आत्मनिर्भर होगा हमारी उन्नति होगी. जापान और चीन हमारी सम्स्कृति के नजदीक हैं. हम उनसे काफी पीछे हैं, लगभग हर क्षेत्र में पीछे हैं. जापान का जनसंख्या घनत्व हमारी अपेक्षा बहुत अधिक है किन्तु हम जनसंख्या के नाम पर भ्रष्टाचार और घोटाले करते रहे. गांधी के नाम पर वोट लेने के लिये भाजपा नीत शासनकाल में भी भारत की नोट से गांघी नहीं हटाये गये. नोट पर तो मात्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह और रिजर्व बैंक का चिन्ह होना चाहिये. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का आदर होना चाहिये. अभी भी स्वदेशी की प्रासंगिकता उतनी ही है. हमें पूरे विश्व पर नजर रखते हुये तकनीक के हर क्षेत्र में स्वदेशी को बढावा देना चाहिये. हम जितना ही आत्म निर्भर होंगे मुद्रासंकट से उतना ही मुक्त रहेंगे.
गांधी एक वकील थे, वकालत उन्हें रास नहीं आयी. क्यों ? (आसाराम के वकील). आज जो भी वकील राजनीति में आ रहे हैं वकालत को छोडकर नहीं आ रहे हैं. उन्हें धन और राजसुख चाहिये, इसके लिये वे सत्ता को सत्य से दूर करने का हर उपाय शासन को बताते हैं ऐसी स्थिति में क्या जनता से उम्मीद की जा सकती है कि वह कानून और संविधान का सम्मान करे.
राजनेता अधिकारियों को निलंबित, स्थानान्तरित, मौखिक प्रताडना आदि से दबाव बनाकर लगातार अवैधानिक कार्य कराते हैं इसका प्रमाण खोजकर न्यायालय में सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है किन्तु जिस प्रकार यह काम किया जाता है उसका संदेश तो जनता में जाता ही है. गांधी के देश में राजपद पर रहते हुये गांधी के चित्र के नीचे ही यह काम हो तो गांधी की प्रासंगिकता को ही समाप्त करता है."लगे रहो मुन्नाभाई" का किरदार निभानेवाला अपनी गलती स्वीकार कर जेल जाने को तैयार नहीं होता. जब किरदार निभाने वाले के चरित्र में परिवर्तन नहीं हो पाता तो यह फिल्म मात्र मनोरंजन ही तो कर पायेगी.
मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ही अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये गान्धी को निरंतर अप्रासंगिक बनाने का काम करती रही है. जब किसी व्यक्ति को अप्रासंगिक बनाना हो तो उसकी मूर्ति बना लिया जाय. उसपर माला चढाया जाय, उसकी पूजा की जाय, उसके विचार कालवाह्य हो जायेंगे. गांधी स्मारक स्थल पर जितनी गैस जला दी जाती है उससे गांधी के जीवन भर के त्याग की तपस्या नष्ट हो जाती है.
लुटियन दिल्ली को बिल्कुल नष्ट कर राजशाही और अंग्रेजों के बनाये राजप्रतीकों नष्ट कर जनता के प्रतिनिधियों के लिये और जनता को अपनी बात कहने का स्थान बनाना चाहिये. स्वदेशी का प्रारम्भ यही से होना चाहिये.
बाकी बहुत कुछ है फिर कभी..
इस बकवास में कुछ सार्थक हो तो बताइयेगा.
नमस्कार!
No comments:
Post a Comment