Monday, October 14, 2013

भारतीय उच्च शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. किन्तु भारतीय उच्च शिक्षा का हाल ठीक नहीं है. आज बीबीसी के रेहान फजल का ब्लाग देखा और उसे शेयर भी किया किन्तु लगता है कि कुछ और भी कहना चाहिये, इसलिये ब्लाग पर आ गया.
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिये जबसे नाक (NAAC) का कार्य प्रारम्भ हुआ तबसे ही संदेह उपजने लगा. इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के बाद संदेह विश्वास में बदलने लगा कि भारत के राजदल शिक्षा को भार मानते हैं और इसे बेचकर अकूत धन कमाना चाहते हैं.

उच्चशिक्षा की गुणवत्ता की बात महामहिम राष्ट्रपति  श्री प्रणव मुखर्जी भी कर रहे हैं. इस देश के नागरिक जानते हैं कि वे कितनी बार वित्तमंत्री रह चुके हैं. उच्चशिक्षा के स्तर की जानकारी उन्हें तब भी थी. 1966 के कोठारी आयोग द्वारा सबके लिये स्नातक स्तर की निःशुल्क शिक्षा की बात की गयी थी. उसी शिक्षा को अब बेचने की बात चल रही है , वह भी तब जब आयकर, सेवाकर के साथ शिक्षा उपकर लिया जाता है. कांग्रेस को छोड दें तो भाजपा भारतीय परम्परा की बात तो बहुत करती है किन्तु शिक्षा का धंधा करती है इसलिये निःशुल्क शिक्षा से उसे परहेज है. वह अपने सरस्वती शिक्षा मंदिरों को निजी विश्वविद्यालय में बदलने का सपना देखती है.

उच्च शिक्षा की दुर्दशा का प्रमुख कारण इस मद में बजट प्रावधान को कम करना रहा है. प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने की जगह प्रौढ शिक्षा और आंगन बाडी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसका नब्बे प्रतिशत धन हवा में उड जाता है. पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिली. आज भी गावों और शहरों के प्राथमिक पाठशाला मूलभूत संसाधनों के अभाव में हैं. शाला-शिक्षक-पुस्तक के अभाव में दर्जाफनौवल कर दिया जाता है. माध्यमिक शिक्षा की स्थिति उससे भी बदतर है. उच्चशिक्षा की स्थिति सबसे खराब है. आज के चिन्तक केवल उच्च शिक्षा  की गुणवत्ता पर अचानक हायतौबा मचा रहे हैं तो क्यों?

सरकार अब से भी चाहे तो  चरणबद्ध रूप से काम करने पर 2025  तक हम मानक स्तर पर पहुंच सकते हैं. इसके लिये हमें यह जानना होगा कि हमारी तब तक की युवा शक्ति को कहां भेजना है? सबके लिये मानक प्राथमिक शिक्षा की  ( कक्षा आठ तक  ) निःशुल्क व्यवस्था करनी होगी. इसके लिये मानक विद्यालय भवन, शिक्षक, पाठ्यपुस्तक चाहिये. शिक्षकों की आवश्कता की पूर्ति हेतु प्रत्येक तहसील स्तर पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र चाहिये. साथ ही स्नातक स्तर पर एक प्राथमिक शिक्षा का डिग्री पाठ्यक्रम चलाना चाहिये जिसके तीसरे  वर्ष में अध्यापन अनुभव होना चाहिये. यह काम हमें युद्ध स्तर पर 2016 तक पूरा करना होगा.

माध्यमिक विद्यालयों को  चार वर्ष का (नौवीं से बारहवीं कक्षा तक)  का पाठ्यक्रम चलाना चाहिये. सभी माध्यमिक विद्यालयों में  सभी स्ट्रीम की शिक्षा मिलनी चाहिये. इसके विद्यालय  भवन,  शिक्षक, पाठ्यक्रम चाहिये. इन सभी कार्यों के लिये प्राइवेट एजेंसियां नहीं चाहिये. सरकार को करनी होगी . इसके लिये संविधान में उल्लिखित वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को ध्यान में रखना होगा. शिक्षा को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना होगा. 2020 तक इस काम को पूरा करना होगा.

उच्चशिक्षा के केन्द्र महाविद्यालय और विश्वविद्यालय  को राजनीति से मुक्त करने के लिये कुलपतियों की नियुक्ति से सरकार को अपने से अलग कर लेना चाहिये. इस समय कुलपति  से लेकर चपरासी तक सभी पदों पर बोली लग जा रही है. जहां बोली नहीं है वहां वेतन नहीं है. दो हजार, आठ हजार, दस हजार प्रति माह पर नेट या पीयचडी शिक्षक भारत में ही मिलेंगे, और आप गुणवत्ता कि बात करेंगे.

समसामयिक जीवन के लिये किस क्षेत्र में किस तरह के कितने लोगों आवश्यकता है इसकी जानकारी करनी होगी. तदनुरूप पाठ्यक्रम और सभी सम्बन्धित साजोसामान की व्यवस्था सरकार को करनी पडेगी. यदि 1500  विश्वविद्यालय चाहिये तो भारत की जनता तो इतना कर(Tax) देती है कि 3000 विश्वविद्यालय चल सकें. जो लोग रोज यह कहते हैं कि कठोर निर्णय लेने पडेंगे उन लोगों ने कालेधन की उत्पत्ति रोकने , बाहर गये काले धन को वापस लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कौन से कठोर निर्णय लिये हैं.

जितने भी गुणवता निर्धारण करने वाले संस्थान  हैं उन सभी की गुण्वत्ता संदिग्ध है. नाक का क्या मानक है ?उसे पहले देश और प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मूल्यांकन करना चाहिये. निदेशालयों का मूल्यांकन करना चाहिये. महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में तिथि निर्धारित कर पहुंच जाना चाहिये. अभी तक नाक के वेबसाइट का हिन्दी संसकरण काम नहीं करता है.

हमारे माननीय  संसद में बैठकर संसद की गुणवत्ता जब तक नहीं बनायेगे तबतक भारत के किसी संस्था में गुण्वत्ता नहीं आयेगी. शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर उसे बेचने की तैयारी चल रही है. इससे जनता को सावधान होना होगा.

नमस्कार.

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