Monday, September 17, 2012

बरसात में गैस की आग

बरसात में गैस की आग
नमस्कार !

हालचाल ठीक है न.

मानसून की कमी में कोयले  के भ्रष्टाचार को लेकर संसद का सत्र व्यर्थ हो गया. कोयला सुलगते सुलगते आग में बदल गया. सरकार आग में पानी डालने के बजाय एक अधिक ज्वलनशील पदार्थ डीजल और गैस में आग लगा दिया. गैस की आग खतरनाक होती है अतः सभी विरोधी दल गैस से हाथ सेंकने चल दिए. २० सितम्बर को देश की दुकाने बंद रखने के लिए भारत बंद होगा. स्पष्ट है देशवासी और राज-दल दोनों के लिए भ्रष्टाचार अधिक ज्वलन शील मुद्ददा गैस है.

पेट्रोलियम पदार्थों का दाम हरदम अबूझ पहेली रहा है. इसमें सब्सिडी दी जाती है. तेल कम्पनियां घाटे का रोना रोती हैं.  हरदम दाम बढाने या सब्सिडी घटाने की चर्चा होती रहती है. पेट्रोल पम्प और गैस की एजेंसी के लिए पचास लाख  से लेकर एक करोड़ तक घूस दिया जाता है. एजेंसी पाने वाला करोड़ पति हो जाता है  .यह सब हो जाता है, किन्तु जनता को गैस और मिट्टी का तेल जिसे किरोसिन भी कहते हैं सुविधापूर्वक नहीं  मिल पाता है. छोटे शहरों की हालत तो और ही खराब है. समाज के प्रभावशाली चारो खम्भे ( विधायिका,कार्यपालिका, न्यायपालिका, और मीडिया ) तथा पांचवा खम्भा ( असामाजिक तत्व ) के लोगों को छोड़कर बाक़ी गैस पाने का हर जुगाड़ करते हैं और जी लेते हैं.

जब गैस के दाम बढाने की बात होती है तो राज-दल खूब हल्ला मचाते हैं किन्तु नया कनेक्सन लेना और भरे गैस का सिलिंडर मिलता रहे इसकी व्यवस्था बनवा लेने में अबतक असफल रहे हैं.

इस समय यह लिखना जरूरी है कि भाजपा के शासन काल में गैस की किल्लत आश्चर्यजनक रूप से दूर हो गयी थी .इसका राज नही खुल पाता है.

सरकार ने डीजल दाम बढ़ा दिए और गैस में हिचकी ले रही है. सरकार बचाने का रास्ता शायद गैस दे दे किन्तु जनता के गैस की समस्या दूर कैसे होगी इसकी चिंता किसी को नहीं है.

मैं देवरिया नाम के एक छोटे से शहर में रहता हूँ. गैस को लेकर जो जो दुर्गति हो चुकी है उसका संस्मरण कभी फिर. अभी तो मैं इस समस्या समाधान के लिए अपना विचार रखने जा रहा हूँ.

पेट्रो पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दिया जाय, क्योंकि  सब्सिडी  व्यापारी, अफसर, नेता, मंत्री और राज-दल के चक्रव्यूह में फंसकर रह जाता है. सरकार केवल डीजल और मिट्टी के तेल पर लगने वाले टैक्स को कम कर दे अथवा करमुक्त कर दे. राजकोषीय घाटा का हल्ला कर मंहगाई बढाने वालों का मुंह बंद हो जायगा.

गैस का वितरण जैसे हो रहा है उसे होने दिया जाय और प्रत्येक तहसील पर कंपनियों के नए गोदामों द्वारा सीधे जनता को छोटे, मझोले और बड़े सिलिंडरों में दिए जाय. जो चाहे जितना चाहे ले जाय. गैस उसके एक फोन काल पर उसके  घर पहुंचा दिया जाय. छोटे सिलिंडरों का  ग्राहक वही तबका है जिसके नाम पर गैस सस्ता बेचनें कि राजनीति की जा रही है. ये ग्राहक बाजार से अप्रामाणिक छोटा सिलिंडर खरीदते हैं और अवैध रूप से  तिगुने दाम पर बेचे जाने वाले गैस को भरवा लेते  हैं.


सरकार जितना सबसिडी देती है लगभग उतना ही धन ब्लैक सिलिंडर के बिकने से बाजार में आता है. यही हाल मिट्टी के तेल का भी है.

इसी प्रसंग में यह भी कहना जरूरी है कि रिफाइनरी से सीधे हवा में जला दी जाने वाली ऊर्जा को भी उपयोग में लाया जाना जरूरी है.

जनता को भीख नहीं अधिकार चाहिए. उसे हर खरीद अथवा बिक्री पर उचित  मूल्य चाहिए. जनता द्वारा दिया गया कर राजकोष में ही पहुचना चाहिए. तेल के सब्सिडी के खेल की भी जांच जरूरी है. आखिर तेल का पैसा कौन खा रहा है? 

नमस्कार !

Sunday, August 5, 2012

सपने से सपने तक


नमस्कार ! अगस्त माह भारत में अति महत्वपूर्ण है. हम अपनी स्वतंत्रता की याद करते हैं. अपने विकास की समीक्षा करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत ने विकास नहीं किया है. किन्तु हम कितने पीछे हैं और क्यों इतने पीछे हैं?

बहुत दिनों से बहुत सारे लोग भ्रष्टाचार को इसका कारण मानते हैं. कुछ लोग संसदीय लोकतंत्र को ही इसका कारण मानते हैं. भारत के राजनैतिक दल निराशा के दौर में थे , भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक आन्दोलन की अगुआयी की , आपातकाल लागू हुआ , सारे विरोधी  दल के नेता गण फर्जी मुकदमों में जेल में डाले गए. तब यह ज्ञात हुआ कि कि शासन के कहने पर कैसे लोगों को झूठे आरोपों में डाल दिया जाता है. जिले स्तर पर कांग्रस के नेता सूची बनाकर दे देते थे और लोग जेल में बंद कर दिए गए. जनता दल का गठन हुआ. जनता दल के टिकट देने के समय खूब धांधली हुई.  सभी दलों के एक हो जाने के कारण कांग्रेस हारी. जनता दल का शासन आया,  इंदिरा जी जेल गयीं , व्यक्तियों की राजनैतिक पदलिप्सा ने उसका अंत किया और कांग्रेस पुनः शासन में लौट गई. संजय गांधी ने जनता दल को तोड़ने की कूटनीति काफी योगदान किया. भारत के आगामी प्रधानमंत्री के रूप पूजे जाने वाले संजय गांधी का दुखद अंत हो गया. इंदिरा जी के पश्चात राजीव गांधी  देश के प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस के लोगों को उनकी इमानदारी नहीं पची और वे षड़यंत्र के शिकार हो गए. देश में पुनः बोफोर्स तोप काण्ड के बहाने भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात पर सरकार बनी . वामपंथी और भाजपा दोनों एक साथ खड़े हो गए. वह सरकार भी भ्रष्टाचार को समर्पित हो गयी. इसके बाद तो भ्रष्टाचार किस गति से बढ़ा कुछ पता ही नहीं. भारत के नेताओं ने  संविधान के संकल्प के विपरीत  समाजवाद को छोड़कर पूंजीवाद अपना कर जनता की संपत्तियों को बेंचकर काला धन बनाया. विदेश भेजा और उसे फिर मंगा कर भारत में लगाया , एन आर आई के नाम पर भारत  का पैसा भारत में फिर आ गया. नेताओं ने प्रतियोगिता कर के धन कमाया. इस बीच बहुत से आन्दोलन हुए किन्तु निष्प्रभावी रहे . एक हिन्दुस्तानी आन्दोलन नामक संस्था कुछ  दिन तक चर्चा में रही. भाजपा भी भारत को भ्रष्टाचार से चमका कर चली गयी . लोग पुनः कांग्रेस की और झुक गए . यद्यपि साझा सरकारों का ज़माना आ गया. भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता और बढ़ गयी. उसी समय अंधरे में एक किरण के रूप में अन्ना का आन्दोलन आया और लोग उस किरण की और लपके. इसी के साथ काले धन पर बाबा रामदेव की चर्चा बढी . बाबा देश में काला धन बनने से चिंतित नही. केवल बाहर गया काला धन वापस लाना चाहते हैं.

बुद्धिजीवी अन्ना आन्दोलन से ज्यादा जुड़े. अन्ना देश के दूसरे गांधी बन गए. कांगेस के वकील मंत्री अपने वाकजाल में आन्दोलन को उलझाने में लग गए. अन्ना और साथी उनके जाल में फंसकर उतावली में आ गए. और हमारे सामने एक और अनशन आ गया जिसमे अरविंद केजरीवाल नेता बनकर आये. जनता का साथ अब उतना नहीं मिला. लेकिन बहुत सारे लोग सपना देखने लगे. कांग्रेस बहुत सारे अनशनकारियों  को मार चुकी है. यह सोचकर लोगों ने कई विकल्प सुझाए जिसमें अनशन स्थगित कर राजनैतिक दल गठन करने का सुझाव आया. अचानक यह समाचार बहुत सारे लोगों के गले नहीं उतारा.


आन्दोलन के पुराने आलोचक दिवाली के मूड में आ गए. राजनैतिक दलों का तो कहना ही क्या.

 अब एक नया दल बनने वाला है जो राय मांग रहा है.

सभी समाचार पत्र इस नए दल हेतु राय बताएं. जब दल की रूपरेखा आ जाए तो सवाल उठायें.

जो यह कहते हैं कि इस आन्दोलन के नाते उनके प्रभावशाली आन्दोलन की हवा निकल गयी, वे पुनः अपने काम पर लग जाय. रास्ता बनाने वालों को रास्ता मिल जाता है.

सभी दलों और चिंतको को नमस्कार और देश के उज्जवल भविष्य की शुभकामना के साथ.

Friday, May 11, 2012

और अवंतिका बिक गयी


नमस्कार ! 

अवंतिका के बिकने पर भी मुझे खुशी हुई. यद्यपि अवंतिका का बिकना भारतीय समाज में फैले अन्धविश्वास में से एक है. किन्तु ऐसे अंधविश्वास  बुरे नहीं लगते हैं. कोई अपनी संतति को क्यों बेंचता है ? निश्चय ही अत्यंत मजबूरी में, सभी मार्ग बंद होजाने पर संततियां बिक जातीं हैं. मेरा यह कथन निरापद नहीं है. (दहेज लेना बेटा बेचने के रूप में प्रचलित नहीं है.)

आजके जमाने में जब बेटियों को कुछ लोग पसंद नहीं करते उसी जमाने में बेटियां हर क्षेत्र में धूम मचा रहीं हैं.  फिर भी बेटी का जन्म बहुत प्रीतिकर नहीं होता. थोड़ी कसक रहती है. अभी भी जब हम सब केवल मतदान मात्र के लिए समान अधिकारी हैं, तब अवंतिका को जीवित बचाने के लिए उसके पिता का संघर्ष प्रशंसनीय है.

अवंतिका अपनी माँ की दूसरी किन्तु पहली जीवित सन्तति है. आपरेशन से जन्मी अवंतिका को कुछ  ही समय में अपनी माँ  की सुखद गोद को छोड़कर दो किलोमीटर दूर एक ऐसे बाल चिकित्सक की शरण में जाना पड़ा जो अपने दुर्व्यवहार के लिए पूरे देवरिया में जाने जाते हैं. उसे क्या हुआ था यह तो चिकित्सक ही जानते हैं . भारत में चिकित्सक  रोगी को पूरी बात बताने परहेज करते है. पर्चा ऐसी अंग्रेजी में लिखते हैं जिसे कोई पढ़ नही सके. कोई कुछ नही कर सकता है . माननीय  सर्वोच्च न्यायालय की भाषा भी अंग्रेजी ही है. संसद में माननीय सांसद जिस भाषा में चाहे सुन सकते हैं किन्तु लोकसभा की कार्यवाही का प्रसारण  सुनाने वालों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है . डिस्कवरी चैनल को आप हिन्दी में सुन सकते हैं. ऎसी स्थिति में अवंतिका की माँ को कोई कैसे समझा सकता है की अवंतिका जीवित है. उसे तो यही लगता है की उसकी पहली सन्तति जैसे यह भी मर गयी है और घरवाले बता रहे हैं  कि वह दूसरे हास्पिटल में है.

जब मैं अवंतिका को देखने गया तो तो सुन्दर सी अवंतिका के चहरे पर रोग के नहीं शान्ति के लक्षण  थे किन्तु वह आक्सीजन  पर जी रही थी.  बहत्तर घंटे बाद  ही वह अपने इस बंधन से मुक्ति पा सकी तबतक उसे पीलिया हो गया . दस बारह हजार रूपये खर्च हो जाने के बाद अवंतिका अपने प्रसन्न पिता कि गोद में सवार होकर अपनी जननी सेमिलने पहुंची किन्तु तबतक  भयाक्रांत माँ को बताया जाचुका था कि यह सन्तति आपकी होते हुए जी नहीं सकती अतः इसे बेंच दें. 

और अवंतिका हास्पिटल के दाई के हाथों दस रूपयें बिक गयी.

अवंतिका के माँ बाप किसी तरह से धन एकत्र किये थे कि इस द्वितीय प्रसव के समय सामान्य प्रसव और जिला चिकित्सालय का परित्याग कर दिया जायगा जिससे कि सन्तति की हानि न हो. प्रसव चिकित्सालय पैसा तो लेते हैं किन्तु सामान्य और आवश्यक सुविधाए नहीं प्रदान करते . माँ किसी और जगह और नवजात शिशु  कहीं और एक दडबे में . उस दडबे में दो शिशु और दोनों के अभिभावक  एक साथ  इन्फेक्शन की पूरी संभावना के साथ.

इस लोकतंत्र में अवंतिका के  पिता ऋण  लेकर यदि अवंतिका की जान बचानें के लिए दिन रात एक नहीं करते तो अवंतिका का क्या होता ? संसद में  केंद्र और राज्य लड़ते रहते हैं  . चिकित्सा की धन राशि लूटी जाती रहती है और हजारों अवन्तिकाएं मरती रहती हैं. 

हम किसी देश के कानून के अनुसार शिशुओं की देखरेख  न करने वाले माता पिता के लिए शोर मचा सकते हैं किन्तु अपने देश की प्रसूताओं और शिशुओं की रक्षा के उपाय नही कर सकते हैं .

क्या हम अवंतिका को कह सकते हैं कि अवंतिका तुम निश्चिन्त रहो हम तुम्हारे साथ हैं. 

नहीं अवंतिका नहीं हम तम्हे  कानून दे देगे- स्वास्थ्य  रक्षा का कानून , शिक्षा के अधिकार का कानून, दहेज  निरोध का कानून.

कानून और केवल  कानून.  और अवंतिका जब इस कानून को लागू कराने के लिए जब  तुम न्यायालय जाओगी तो हो सकता है कि तुम्हारे जीवन काल  में ही न्याय मिल जाए. न्यायालय  में लगने वाले समय पर तो फर्नीचर वाले टिकाऊ फर्नीचर का विज्ञापन करते हैं.

Thursday, December 1, 2011

खुदरा बाजार बनाम माल

नमस्कार!

हालचाल ठीक है ?

देश का हाल और कांग्रेस की चाल ठीक नहीं है. एफडीआई की चर्चा बड़े जोरों पर है. आज भारत  बंद है, कटोरे में पैसा दिखाकर आढतिया और खुदरा वाले भिखारी बन जाने के डर में हैं. कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनैतिक दल इसके विरोध में हैं. टीवी और अखबार सभी इसपर परिचर्चा कर रहे हैं. कुछ इसे गुलामी का आरम्भ मान रहें हैं तो कुछ भारत के स्वर्णिम भविष्य का आरम्भ.

लोकतान्त्रिक भारत की अलोकतांत्रिक पार्टी कांग्रस ने अपने सांसदों और और सरकार के सहयोगी दलों बिना विचार विमर्श किये संसद के सत्र काल में निर्णय लेती है कि भारत में खुदरा व्यापार में भाग लेने हेतु विदेशी कंपनियां ५१% तक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश कर सकती हैं. इससे भारत में खाद्य सामग्री की सुरक्षा होगी, सामान सस्ता मिलेगा और किसान लाभान्वित होंगे. कांग्रेस के इस कथन से कांग्रेसी भी सहमत नहीं हैं. किन्तु  वे कुछ बोल नहीं सकते. सांसद और विधायक अपने दल के मुखिया और खास लोगों की राय को गलत होने पर भी मानने को को बाध्य हैं क्योंकि किसी भी राज नैतिक दल में आन्तारिक लोकतंत्र है ही नहीं. दूसरी ओर संसद संचालन के तमाम नियम ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में लोकतांत्रिक कत्तई नहीं कहा जा सकता है.

कोई भी विदेशी धन कमाने के लिए ही धन लगायेगा. विदेशी धन कमाकर विदेश ही  ले जाएगा. ४९% वाले भारतीय भी कमायेगें. व्यापार कमाने के लिए किया जाता है. किन्तु यहाँ तो व्यापार लूटने के लिए किया जा रहा है.  जो राजनैतिक दल आज इसके लिए संसद नहीं चलने दे रहे हैं. वे कभी उर्वरक की अनुपलब्धता  पर संसद ठप नही कर सकते. कुछ और प्रश्न हैं-
१. क्या भारत में खाद्य पदार्थ के संरक्षण की व्यवस्था अपने स्तर पर नहीं की जा सकती है ? आधुनिक गोदामों और शीत गृहों कि व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही हैं?
२. क्या अमूल जैसे सहकारी विपणन  केंद्र नहीं विकसित किये जा सकते हैं ?
३. यदि यह किसानों के लिए हितकारी योजना है तो इसे विस्तृत रूप से समझाकर पूरे देश में ही क्यों नहीं लागू किया जा रहा है?
४. यदि भारत को विदेशी मुद्रा के लिए ही यह कार्य मजबूरी में करना पड़ रहा है तो भी जनता को जानने का हक है.
५. यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के चलते ऐसा करना मजबूरी है तो भी जनता को जानने का हक है.
६. यदि एफडीआई मजबूरी ही है तो ४९% की ही अनुमति दी जाय.
७ . जब आधे से अधिक सांसद चाहते हैंकि एफडीआई न आवे तो इसे क्यों नहीं वापस कर लिया जा रहा है. अब तो साफ़ लग रहा है कि इसे लागू कराने के लिए सरकार अलोकतांत्रिक विधाओं का उपयोग करने जा रही है.

अब समय आ गया है कि भारत में थोक और खुदरा व्यापार की नीति स्पष्ट रूप से बन जाय जिससे सभी पक्षों का न्यायपूर्ण हित हो सके. इसके लिए सभी दलों को अपने ड्राफ्ट बिल तैयार कर लेने चाहिए जिससे सभी अपनी बात स्पष्ट रूप से कह सकें.

जबसे माल या सुपर बाजार  खुलने लगे हैं भारत के उच्च मध्यवर्ग के लोग माल को प्रतिष्ठा का विषय भी मान लिए हैं अतः इन्हें खुलना ही है.  इसलिए देश और प्रदेश के राजनेता शीघ्रातिशीघ्र सम्बंधित कानूनों में भी संशोधन करें जिससे जनता का लाभ हो सके. अब यह जरूरी हो गया है कि प्रत्येक कानून का पुनरीक्षण दस  वर्षों पर अवश्य ही हो जाय. आवश्यकता होने पर पहले भी  संशोधन किया जाय. संसद और विधान सभाओं के सत्र निर्धारित समय तक अवश्य चलाये जाय  यदि किसी भी कारण से सत्र में बाधा  आती है तो सत्रकाल स्वतः आगे बढ़ जाय.

Friday, November 4, 2011

विश्वविद्यालय की परीक्षा

नमस्कार !

क्या हालचाल है?

अभी थोड़ी देर पहले रवीश जी के ब्लॉग पर ( http://naisadak.blogspot.com/ ) दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू सेमेस्टर सिस्टम को भारत के लिए बेकार बताया गया है. इसपर पहले मैं अपना अनुभव बताता हूँ - मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में १९७०-१९७२ तक विज्ञान वर्ग में स्नातक की परीक्षा सेमेस्टर प्रणाली से दिया हूँ. इस प्रणाली में  प्रत्येक विषय के एक प्रश्नपत्र की पढ़ाई तथा उसकी परीक्षा होती है. पहले सेमेस्टरकी परीक्षा दिसंबर में होनी थी अधिकाधिक छात्र परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे थे उसी समय कुछ छात्र जाड़े के नाम पर परीक्षा स्थगित कराने के अभियान  पर निकल गए और कहने लगे कि जनतांत्रिक अधिकार है परीक्षा टाली जाय. विज्ञान संकाय के डीन के पास छात्रावास के छात्र गए और परीक्षा टलवा दिए . हमलोग भी खुश हो गए कि चलो परीक्षा से गला छूटा. दूसरे सेमेस्टर की पढाई शुरू हो गई . यहाँ पर एक बात और उल्लेखनीय है कि प्रैक्टिकल की परीक्षा न होकर प्रतिदिन मूल्यांकन प्रणाली लागू थी.

जब दूसरे सेमेस्टर के परीक्षा की बारी आयी तो परीक्षा टलवाऊ समूह फिर सक्रिय हो गया और एक प्रश्नपत्र का बहिष्कार करा दिया. इसबार प्रशासन कठोर निर्णय पर उतारू हो गया और परीक्षा नही टली. वहाँ पर जो सेमेस्टर प्रणाली थी उसमे अगले सेमेस्टर  में पढ़ने और परीक्षा देने में कोई बाधा नही थी इसलिए सभी लोग एक प्रश्नपत्र में अनुपस्थित होने पर भी अगले सेमेस्टर में चले गए. परिणाम यह हुआ कि हमलोगों को एक प्रश्नपत्र के स्थान पर दो प्रश्नपत्रों को एक साथ तैयार करना पड़ा. बाद में पता चला कि परीक्षा टलवाउ नेता को अगले वर्ष छात्रसंघ का चुनाव लड़ना था. इसके लिए उन्होंने सबके कैरियर को दांव पर लगा दिया था.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में १९७४ के जेपी आन्दोलन के बाद सत्र अनियमित हो गए और आज तक नियमित नहीं हो पाए हैं. यहाँ पर विधि संकाय में सेमेस्टर प्रणाली है किन्तु यहाँ की सेमेस्टर प्रणाली में प्रतिवर्ष आगणन पद्धति  है अर्थात विधि प्रथम वर्ष पास किये बिना द्वितीय वर्ष में नहीं जा सकते. सेमेस्टर प्रणाली के होते हुए भी आज तक  विधि का सत्र भी नियमित नहीं है.

जब मैं लिख रहा हूँ कि गोरखपुर विश्वविद्यालय का सत्र नियमित नहीं है तो यह सुनकर बहुत सारे लोग नाराज हो सकते हैं. किन्तु यह वास्तविकता है कि यहाँ के परीक्षा परिणाम ४५ दिन में नहीं निकल पाते हैं. पहले तो दोष छात्रसंघों  का भी था किन्तु अब तो केवल विश्वविद्यालय प्रशासन ही जिम्मेदार है.

इस परिप्रेक्ष्य यह भी कहना समीचीन होगा कि पचहत्तर दिन के ग्रीश्मावाकास, पैंतालीस कार्य दिवसों की परीक्षा और असीमित अवकाशों और शोक अवकाशों के होते हुए एक सौ अस्सी पढाई के कार्य दिवस कैसे पूरे हो सकते हैं.
ऎसी स्थिति में पढाई की गुणवत्ता केवल इंफ्रास्ट्रचर से ही नहीं निर्धारित की जा सकती है.

यहाँ पर यहभी कहना समीचीन होगा कि शिक्षक संघों को शिक्षा की गुणवता और पाठ्यक्रम की सार्थकता पर भी ध्यान देना होगा नहीं तो परम्परागत विश्वविद्यालयों का अंत सुनिश्चित है.

Monday, October 3, 2011

गरीबी रेखा

नमस्कार !

क्या हालचाल है ?

अमीरी की रेखा का ज्ञान भारत को परेशान कर रहा है. महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री अहलुवालिया जी ने तमाम लोगों को रातोंरात अमीर बना दिया. बहुत दिनों से मैं भी गरीबी रेखा की खोज में था मिल ही नहीं रही थी. कई लोग और कई सस्थाएं इस रेखा को जहां तहां खीच रहे थे. शुक्र है माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग से रेखा की मांग कर दी. योजना आयोग की रेखा को देखकर, मध्यवर्ग जो विद्वान दीखने के लिए अखबार पढता है और टीवी पर समाचार पढ़ता है, बौखला गया. उसके पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी. वह अपने को अमीर समझता था. अब फिर रिक्सावाला उसके स्टेटस में आ गया. अब घड़ी, साइकिल,टीवी, मोबाइल और गैस जो कभी उसने अपनी अमीरी दिखाने के लिए लिए थे  निरर्थक हो गए. भारत अब अमीर देश हो गया. मध्यवर्ग अचानक बौखला गया और योजना आयोग पर हल्ला बोल दिया.

योजना आयोग के कर्ता धर्ता अहलुवालिया जी विदेश से लौटे   महान भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री से मिले और महान आईआईटीएन मंत्री माननीय जैराम रमेश जी के साथ प्रेसवार्ता  कर बताया कि लोग गलत कह रहे हैं . बत्तीस रूपये रोज पर बौखलाइये मत. लोगों को गणित ही नहीं आती. एक परिवार में पाँच लोग माने जाते हैं. बत्तीस में पाँच क गुणा कीजिए तो होगा एक सौ साठ.  एक दिन में एक सौ साठ, महीने में तीस दिन तो हो गए तो महीनें में हो गया चा.....र....ह....जा.....र....आठ....सौ...... अब बताइये महीने में चार हजार आठ सौ आमदनी वाला परिवार गरीब कैसे हुआ? जबसे मैनें उनका वक्तव्य सुना  है तब से जोड़ रहा हूँ. साल में तो ३६५ या ३६६ दिन होते हैं. ४८०० में १२ से गुणा करने पर आ रहा है ५७६०० . और ५७६०० में ३६५ से भाग देने पर आ रहा है १५७.८० . फिर १५७.८० में ५ से भाग देने पर आ रहा है ३१.५६  तो इस प्रकार तीन साल के लिए गरीबी रेखा ३१.५६ दिन ही हुई. ३६६ वाले साल में फिर गणित गडबड हो जा रहा है. तो भाई मेरे समझ के बाहर के इस गणित को समझाइये.

इतना ही नहीं जब हर तीन महीने में औद्योगिक महगाई सूचकांक बदल जाता है, हर छह महीने में सरकारी कर्मचारियों का सूचकांक बदल जाता है तो गरीबी रेखा भी ऊपर उठेगी या अगले दस सालों के लिए स्थिर  रहेगी . क्योंकि अहलुवालिया जी ने कहा कि हमने तो रेखा को बदला है वो भी तेंदुलकर जी की राय पर.  फिर कोई कमेटी बनेगी और रेखा बनाएगी तब तक तो यही रेखा रहेगी यही नियम चला आ रहा है.

जयराम जी बोले कि जाति गणना के साथ ग़रीबों की भी गणना हो जायेगी तब पुनः रेखा खींची जायगी. अब इस समय जो गणना हो रही है वह तो पुराने फार्मूले पर ही चल रही है. फिलहाल हल्ला गुल्ला बंद हो जाय. बाक़ी बाद में  रेखा खींचना तो मंत्रालय को ही है खीच दी जायगी.

मेरे समझ आ रहा कि जब हमलोग ग्लोबल गाँव में ही रह रहें हैं तो  एक गाँव में गरीबी रेखा तो एक ही होनी चाहिए. मुहल्लेवार अलग अलग तो नहीं होनी चाहिए .

फिर मिलेंगें.
नमस्कार.

Sunday, October 2, 2011

गांधी और भारत

नमस्कार !

आज २ अक्टूबर २०११ है. मोहनदास करमचंद गांधी, गांधी जी, महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता गांधी या बापू  का जन्म दिन है. गांधी को बचपन में टोपी से जाना. बाद में खादी से जाना. हाईस्कूल में संछिप्त आत्मकथा से जाना.लेकिन मैं  क्या गाँधी को जान पाया ? नहीं. सत्याग्रह, असहयोग और  अनशन की बातें सुनी. राष्ट्रीय सेवा योजना में काम करते समय कुछ लोगों को बताया, सुना उसे  आचार में लाना कठिन है लेकिन प्रयास करता रहा. विशेषकर अहिंसा का मार्ग अच्छा लगता रहा. अब भी अच्छा लगता है. साम्यवाद की भी बहुत सी बातें अच्छी लगतीं हैं. गोली और बंदूक की बात अच्छी नहीं लगती है.

२०११ की कुछ घटनाएँ गाँधीवाद की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्नों की बाढ़ को रोक रहीं है. किन्तु कांग्रेस सरकार जो अपने को गाँधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी मानती है, गांधी को अप्रासंगिक बनाने पर तुली हुई है. कांग्रेस सरकार को सत्य और अहिंसा से कोई सरोकार नहीं है. अगर सरकार अपने को बापू का उत्तराधिकारी मानती है तो उसे भ्रष्टाचार और काले धन का मोह छोडना पड़ेगा.  गाँधी जी भी वकील थे.  चिदंबरम, सिब्बल और सलमान खुर्शीद भी वकील ही हैं. कौन सच्चा वकील है ? राजनीति में सच्चे वकीलों की जरूरत हैं ,ऐसे वकीलों की जो न्याय की रक्षा कर सकें न कि धन कमाने के लिए वकालत करें.

अन्ना हजारे के आंदोलन ने भारत में गाँधी को पुनः प्रासंगिक बना दिया है. पूरे भारत में एक आंदोलन बिना किसी राजनैतिक दल के सक्रिय सहयोग के अहिंसा के साथ बारह दिनों तक चलता रहा. गांधी टोपी जो गाली बन गयी थी अन्ना और अहिंसा तथा निष्ठा के स्पर्श से पुनः पूज्य हो गयी.

गाँधी का पुनर्जन्म हो चुका है. बचपन में कुपोषण से लेकर महामारियों तक का भारी खतरा होता है. भारत में तो यह खतरा  कई गुना होता है. कांग्रेस से ही नए गाँधीवाद को भारी खतरा है. टोपी के साथ तिरंगा भी जनप्रिय हो गया है. भारत में राष्ट्रवाद भी बढ़ा है. आइये कामना करें कि सत्य और अहिंसा में हम सबसे आगे हों. समानता और बंधुता में आगे हों. समता और न्याय में आगे हों.