Sunday, March 23, 2014

२३ मार्च २०१४-२

नमस्कार!
हालचाल ठीक है,

आज  विधान परिषद उ.प्र. के गोररखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिये मतदान हुआ. यह चुनाव भी चुनाव आयोग ही कराता है. प्रदेश में जितने भी विद्यालय और शिक्षक हैं  उसकी सूची शासन के पास है. निर्वाचन आयोग उससे कोई सूचना न प्राप्त कर मतदाता से आवेदन पत्र लेता है. जबकि प्रत्येक जनपद से फोटोयुक्त मतदाता सूची और पहचान पत्र निर्गत किया जा सकता है. प्रति चुनाव सूची के नवीनीकरण में बहुत सारे खिलाडी अपना खेल करते हैं.

शिक्षक विधायक अब शिक्षा-शिक्षार्थी-शिक्षक की बात नहीं करता. विधायक बनने के अपने सुख हैं उन्हीं सुखों की लालसा इन्हें इधर लाती है. चुनाव के बाद शिक्षकों से  सम्पर्क में बने रहना और शिक्षा के हित के लिये संघर्ष बनाये रखने में य सभी लोग असमर्थ हैं. उत्तर प्रदेश की शिक्षा प्रत्येक स्तर पर चौपट हो चुकी है. जब मैं यह लिख रहा हूं तो बहुत से लोगों के प्रश्न सामने आ जायेंगे. उन सभी से निवेदन है कि कभी सौ दो सौ किसी भी स्तर के विद्यार्थियों का उपयुक्त सैम्पल लेकर जाम्च कर लें. ५-१०% ही उपयुक्त विद्यार्थी मिलेंगे.

सीयनबीसी आवाज एक व्यवसआयिक चैनल है. यहा पर उद्योगपतियों के हितों की चर्चा होती रहती है. यहाम पर उद्योगपतियों का नये प्रधानमंत्री के लिये तय हो रहा है. क्या कोई चैनेल नागरिकों का एजेन्डा भी बनायेगा?
जनता को इसके लिये आगे आना चाहिये. केवल विकास......विकास...... विकास ......का क्या अर्थ. राजदल केवल विकास बता रहे हैं. उन्हें बताना चाहिये कि हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका,और न्याय चाहिये.
नमस्कार.

२३ मार्च २०१४

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन है. छुट्टी का दिन है. आज शहीद दिवस  है, देश दुनिया और आदमी की हालत  पर सोचने का दिन है. साल भर में आदमी को एक बार तो सोचना ही चाहिये कि आदमी को कैसे जीना चाहिये और वह कैसे जी रहा है. राजा भी आदमी है, दरबारी भी आदमी. रंक भी आदमी भिखारी भी आदमी. अपने हिस्से की आजादी लेते लेते आदमी दूसरे की आजादी छीन लेता है. एक वक्त की रोटी खाने के बाद पीढियों तक राज करने का सपना आने लगता है
.
२३ मार्च को कुछ लोग शहीदों की कुर्बानी को याद करने की कोशिश करते हैं. कुछ कर्मकांड भी होते हैं. बहुत से लोग इसी बात से डरने लगते हैं. हर छोटा या बडा बास भगत सिंह के नाम से घबराने लगता है. राजदल तो घबराहट में उन्हें ब्रह्म जैसे पूजते हैं. भारत इस वर्ष अपने सांसदों नहीं प्रधानमंत्री का चुनाव करने जा रहा है. या कहें कुछ लोग अपने में से किसी एक को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं ऐसी स्थिति में भगत सिंह का संदर्भ लेते हुये क्या करना चाहिये, क्या जो हम चाह्ते हैं कर पायेंगे, तमाम स्थितियों में हम उसे नहीं करते जो हम करना चाहते हैं हम उसे करते हैं जिसे लोग चाहते हैं.

एक पांच अंकों वाला धारावाहिक " सत्यमेव जयते" नाम से प्रसारित हो रहा है जो मार्च के हर रविवार को प्रसारित होगा. आज चौथा अंक प्रसारित हुआ. इस अंक में आम आदमी को जागरूक करने के लिये पूरा प्रयास किया गया है.

भारत के प्रति व्यक्ति सम्पत्ति की स्थिति बतायी गयी. मीडिया द्वारा प्रसारित करदाता के भ्रम को तोडने का प्रयास किया गया. भारत के भ्रष्टाचार की स्थिति बतायी  गयी. संघर्ष और निर्माण की भूमिका रेखांकित की गयी. सूचना के अधिकार के प्रयोग के लिये प्रेरित किया गया.

मुझे लगता है कि सोसल मीडिया के द्वारा जनता को सभी राजदलों को नागरिक एजेन्डा बताने की आवश्यकता है. सभी दल जनता को मूर्ख बनाकर अपनी कुर्सी पक्की करना चाहते हैं. उन्हें प्रतिनिधि बनाना पडेगा.
नमस्कार!
फिर मिलेंगे.
धन्यवाद.

Sunday, February 2, 2014

"आम आदमी और आम आदमी पार्टी"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
रविवार का दिन, धूप का अभाव, फेसबुक की खींच, टीवी की खींच, रजाई की खींच हीटर की खीच .......फेसबुक ही जीत जाता है. कभी-कभी ब्लाग भी.
इस जाडे में  मफलर और चाय में जंग हो रही है. मफलर वाला भी नया है. चायवाला अचानक चायवाला बन गया. विज्ञापन कम्पनियां जिसको जब चाहे नककटवा बना दें.
केजरीवाल की हिट्लिस्ट पुआल की आग जैसे गर्मी दे रही है. सर्वविदित रहस्य की चर्चा जब कोई करता है तो सभी प्रमाण मांगते हैं. इस देश के बहुत सारे सत्य कभी कचहरी में प्रमाणित नहीं हो सकते. कोई राजदल यह नहीं दावा कर सकता कि उसके शासन काल में काला धन नहीं बनेगा.
आजकल आरोप लग रहा है कि केजरीवाल को शासन करने नहीं आता. आरोप लगाने वाले अपने शासन को देखते ही नहीं. दिल्ली में पुलिस ( गृहमंत्री) की कार्य कुशलता रोज ही दिखाई देती है.
किसी भी दूर जाने वाली रेलगाडी ( रेल मंत्रालय )  में टिकट भारत निर्माण और शाइनिंग इंडिया दोनों की याद दिला देता है.
सेना की स्थिति और सैन्य साजो-सामान की शीघ्र आपूर्ति और नियुक्तियां (रक्षा मंत्रालय ) की कार्य कुशलता बताती रहतीं हैं
इस देश में बिकनेवाले तमाम साजोसामान भारतीय भाषा में निर्देश भी नहीं देते हैं. तमाम वैधानिक चेतावनियों को पढने के लिये सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है. ( गृह मंत्रालय ) की कार्य कुशलता.
पूरे देश में कुछ स्थानों को छोडकर किसी को भी समय से  रसोई गैस की आपूर्ति नहीं हो पाती. आपूर्ति कोई मुद्दा भी नही है. रात को दो बजे से लाइन लगाने वाले जिन्दाबाद. ( पेट्रोल मंत्रालय की कार्य कुशलता)
देश के सभी पढनेवालों के लिये शिक्षा संस्थान नहीं है. छात्रों का अधिकाधिक समय प्रतीक्षा में ही कट जाता है. यहां तक कि दिल्ली में भी विद्यालयों की कमी है. (शिक्षा मंत्रालय की कार्य-कुशलता)
न्यायालयों में लम्बित पडे मुकदमें विधि मंत्रालय की कार्यकुशलता दिखाते हैं.
यह सब देखने के बाद लगता है कि " आप" को कुछ दिया जाना चाहिये.
आप को छूट की आशा नहीं करनी चाहिये. आप का मूल्यांकन प्रतिदिन के हिसाब से किया जाना चाहिये. दिल्ली सरकार के प्रत्येक मंत्रालय का काम तीब्र गति से होना चाहिये. मैंने कहीं पढा था कि बिडला की कम्पनी में प्रतिदिन की पडता प्रडाली से मूल्यांकन होता है. "आआप" को इसे दिल्ली सरकार के कार्य प्रणाली के लिये उपयोग में लाना चाहिये. इसके लिये मूल्यांकन की एक वस्तुनिष्ठ प्रणाली विकसित कि जानी चाहिये. आज के जमाने में किसी को सच या झूठ सिद्ध करना मीडिया के हाथ में है.
भारती जी के छापे को लेकर बहुत आलोचनायें हुईं. किन्तु अभी तक वस्तुस्थिति सामने नहीं आ सकी.
तमाम आलोचक आप की आलोचना खाप को लेकर भी कर रहे है.
कुछ अति महत्वाकांक्षी लोग आप के सदस्य बने हैं. आये दिन कुछ लोग आप की आलोचना कर अपनी छवि बनायेंगे. दूसरे दलों में जगह बनाने के लिये यह एक अच्छा अवसर है. मोबाइल से आप का सदस्य बनिये सौ ऐसे ही सदस्यों के सहारे  दूसरे दल में अपना टिकट पक्का कीजिये.
राजनीति में बाहुबल, धनबल, जनबल सभी से अधिक बलवान छलबल है. लंगीबाजी राजनीति भी चलती रहती है.
आम आदमी भी आज की राजनीति में केवल यही जानना चाहता है कि कौन जीतेगा.?
वास्तविक प्रश्न है किसे मत दें दल को या व्यक्ति को?
चुनाव की कसौटी क्या है?
हमें अपने निर्णय पर रहना चाहिये या जीतनेवाले के साथ हो जाना चहिये.
नमस्कार.
 

Friday, January 31, 2014

बसन्त/बजट

 बसन्त बजट
नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
चार फरवरी को बसन्तपंचमी है. जिसका प्रचलन कम होता जा रहा है, आउट आफ फैशन. वैलेन्टाइन डे या चौदह फरवरी नया बसन्तोत्सव दिवस है. जो अंग्रेजी पर्व है वह नवउदारवादी व्यापार को मदद करनेवाला होता जा रहा है. अमिताभ बच्चन और हेमामालिनी ने बागवान फिल्म के माध्यम से अपने समवयस्कों को भी वैलेन्टाइन डे से जोड दिया है. मोबाइल और स्मार्टफोन और विज्ञापन सब कुछ मिलाकर बसन्त को अधिक रंगीन करने पर जोर दे रहे हैं. 
इस वर्ष का जाडा है जाने का नाम ही नहीं लेता,  लोग बसन्तपंचमी को भी दांत कटकटाते हुये मिलेंगे. परसो नेट पर देख कर कह दिया कि मौनी अमावस्या को धूप होगी. किसी ने कहा बसन्तपंचमी तक जाडा ऐसे ही बना रहेगा, किसी और ने कहा आठ फरवरी तक. इस वर्ष आधा पूरा माघे कम्बल कांधे रहेगा. 
इधर बसन्त का दस्तक होता है और टैक्स विशेषज्ञ आयकर का राग अलापने लगते हैं. आयकर विभाग का नाम सुनते ही भय हो जाता है. उनकी हर चिट्ठी में दंड का जिक्र होता है. बचपन में गांव में मालगुजारी वाले लाल पगडी और मोटा डंडा लेकर आते और लोगों के बैल खोलकर लेकर चले जाते (तब हल और बैलों से जुताई होती थी) . पीछे-पीछे किसान, हाथ जोडते, माई बाप करते पहुंच जाते. अजकल भी हर सरकारी विभाग और  कर्मचारी सरकार ही कहलाना पसन्द करते हैं.
बजट में सबसे चर्चित आयकर ही है. वैट को लोग ध्यान नहीं देते, उत्पाद कर को कोई पूछता ही नहीं, सेवाकर का भी यही हाल है. सारे लोगों की निगाह में मध्यवर्ग की एक नम्बर की आमदनी निगाह में होती है. आयकर भी कई तरह का होता है. आजकल, कभी महिला कभी वरिष्ठ नागरिक, हिन्दू अविभक्त परिवार आदि कई तरह से जोडा जाता है. पता नहीं कितनी धाराओं छूट मिलती है.
१-मुझे लगता है कि व्यक्ति के लिये सबसे अधिक व्यय का काल ३५-६० वर्ष तक का होता है. इसलिये अस आयु वर्ग के लोगों को छूट मिलनी चाहिये.
२- आय का योग समस्त स्रोत से कर लिया जाता है किन्तु उस आय पर कितने जीवन निर्वाह करते हैं इसका ध्यान नहीं रखा जाता है. आश्रित संतति या माता, पिता, भाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता. प्रत्येक परिवार में प्रति व्यक्ति आमदनी के आधार पर ही कर लगाया जाना चाहिये.
३- एक व्यक्ति के सामान्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिये प्रतिव्यक्ति व्यय के अनुसार आमद्नी को करमुक्त रखना चाहिये. इसे प्रतिवर्ष फुटकर मूल्य सूचकांक के अनुसार बदला जाना चाहिये. जैसे पिछले वित्तवर्ष में दो लाख था तो इस वित्त वर्ष में दो लाख पचीस हजार होना चाहिये.
४- बचत पर छूट के भी तमाम अभ्यास हुये अब इसे एक लाख किया गया है. जिसकी आमदनी तीन लाख है उसे भी एक लाख तथा जिसकी आमदनी बीस लाख है उसे भी एक लाख. सामान्यतः इसे तीस प्रतिशत  कर देना चाहिये और इसकी सीमा भी दस लाख तक ले जाना चाहिये. 
५- आयकर की तीन दरें ही है. १०%, २०%और ३०%. इसे निम्न प्रकार करना चाहिये-
                   ५ लाख तक ५%
                 १० लाख तक १०%
               १५ लाख तक १५%
               २० लाख तक २०% 
               २५ लाख तक २५% 
                 १ करोड तक ३०%
                 २ करोड तक ३५% 
                 अधिक पर ४०%
६- बकायेदारों और कर प्रवंचकों को तरह तरह की छू ट मिलती है किन्तु जो समय से पूर्व अप्रैल से कर देते हैं उन्हें कोई छूट नहीं मिलती है. जो जितना पहले से जितना अधिक कर दे उसे उतना ही अधिक छू ट देना चाहिये. जो सारा भुगतान अप्रैल में कर दे उसे और छूट देना चाहिये. 
इस  ठंढ को बचाने में आयकर और बजट की गर्मी से कुछ राहत मिली है शायद आपको भी राहत मिले. 
नमस्कार.

Thursday, January 30, 2014

बापू जी नमस्कार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आज मौनी अमावस्या है. मौन रहकर स्नान करने का दिन. भारतीय परम्परा का एक पर्व, समारोह, मेला, सेमिनार सबकुछ. इस सेमिनार में लोग कुछ ज्ञान देते हैं कुछ लेते हैं. अपना खाना लेकर जाते हैं. कुछ दूसरे का खाते हैं दूसरे को खिलाते हैं.
अभी लम्बे काल तक यह पर्व चलेगा. अभी सेमिनारों और उनके द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का जो हाल है, सबको पता है उससे कुछ को धन और कुछ को मान तथा कुछ को भविष्य के लिये प्रमाण-पत्र मिल जाता है. इस तरह के सेमिनार माघ मेला जैसे नहीं हो गयें हैं. जो सेमिनार में न जाय उसे उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये.
आज ३० जनवरी है. अहिंसा के पुजारी को भारत में गोली मार दी गयी. तमाम लोग दुखी हुये और कुछ मिठाई भी बांटे. आज भी गांधी का मूल्यांकन जारी है. गांधी की हत्या में सम्मिलित लोगों को कोई अपराधबोध नहीं है.
भारत की स्वतंत्रता के जितने भी कारण गिनाये जाय उसमें सबसे अधिक योगदान गांधी का माना जाता है. वर्तमान लोकसेवक और जनसेवक दोनों ही गांधी का नाम जरुर लेते हैं. भारत के राज-काज में गांधी की रेखा दिखाई देती रहती है. कम से कम  साल में दो बार सरकार और अखबार उनको चर्चा में ला देते हैं.
२९ जनवरी २०१४ को बीटिंग-रिट्रीट समारोह में २०सालों बाद पुरानी स्वर्णिम बघ्घी पर सवार होकर भारत के राष्ट्रपति समारोह मेम सम्मिलित होने आये.
गांघी के सिद्धान्त तो मानने वालों के लिये ही हैं. भारत के गवर्नर जनरल को कितना खर्च करना चहिये इसपर गांधी जी टिप्पणी किये थे. आज राष्ट्रपति पर भारत के औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के किते गुना व्यय होता है इसका भी लेखा किसी न किसी के पास होगा. अन्तिम व्यक्ति कीआमदनी का हिसाब भी किसी न किसी के पास होगा ही.
आज जो लोग राजघाट गये होंगे उन सभी के दिलों को गांधी प्रेरित नहीं कर सकते. गांधी की प्रेरणा उन्हीं को मिलेगी जो उनसे प्रेरणा लेना चाहेंगे. फिर भी मैं आशा करता हूं कि इरोम शर्मिला को न्याय मिलेगा. देश के अन्तिम व्यक्ति को भी अच्छी शिक्षा मिलेगी. सभी के सवास्थ्य की देख्रेख हो जायेगी.
लुटियन दिल्ली  की सभी इमारतों को गिरा करके अंग्रेजों की गुलामी के अवशेष समाप्त कर दिये जायेंगे. वहां पर आधुनिक जनतंत्र के मानक के अनुसार भवन बनेगे. जनता को अपनी बात कहने के लिये एक विशाल मैदान मिलेगा.
बापू जी नमस्कार.

Tuesday, January 28, 2014

टोल क्यों?

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब  इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु  होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं  और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.

Monday, January 27, 2014

भावत माता की जय

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस वर्ष २६ जनवरी को देवरिया में ठंढक बहुत थी, तेज हवा भी. कालेज गया था. झंडा फहराने के साथ उच्च शिक्षा निदेशक के पत्र का वाचन सुना. महाविद्यालय के जलपान समारोह के बाद घर के लिये मिठाई लिया. २६ जनवरी राष्ट्रीय पर्व के साथ बडी पुत्री के विवाह का दिन भी है.
कैमरा साथ ले गया था. ठंढ के कारण साहस नहीं हुआ. केवल रास्ते में पांच चित्र लिये. तीन को फेसबुक पर लगा दिया.
घर आकर बाहर निकला पुष्पों का छायाचित्र लेने. आजकल कुछ पुष्पों का रोज छाया चित्र लेकर उन्हें ही फेसबुक पर लगाता रहता हूं. बाहर निकट के विद्यालय के छोटे बच्चे समारोह से उल्लास के साथ लौट रहे थे.
अपना बचपन याद आया. एक दिन तो झंडा बनाने और कईन ( बांस की टहनी)  की व्यवस्था में लग जाता था. झंडा ऊंचा करने के लिये एक बित्ते (लगभग नौ इन्च) के झंडे में दस फुट की टहनी. हंसी भी आरही थी. आजकल बनाबनाया प्लास्टिक का सुन्दर झंडा मिलता है.
तीन बच्चों में से सबसे छोटा बच्चा अपना झंडा लहराते लगातार नारा लगा रहा था- भावत माता की जय, भावत माता की जय, भावत माता की जय..........भारत का उच्चारण भारत, उसका उल्लास, आवाज की खनक से ध्वनित हो रही थी.......
उसका उल्लास बना रहे, वह आगे चलकर उसके कार्य भारत की जय लायक हों......

पीछे मुडकर देखने पर विकास भी दिखाई देता है, लूट भी दिखाई देती है,
संविधान का वादा......................नेताओं के भाषण.............................अपना कार्यकलाप ............
सपने.......सच्चाइयां......भूल.......झूठ.........सच.......................................................................................................................भावत माता की जय.......
रात को चिन्मय पूछता है आप झंडा फहराने कालेज गये........................
भावत...............माता ...................की .........................जय.
किंशुक अभिनय के साथ सारे जहां से अच्छा हमारा गा रहे हैं...........................
भावत माता की जय............