नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है.
इस घोर ठंढ में भी टैक्स और टोल का नाम सुनकर पसीना छूट जाता है. भारत का हर नागरिक कर देता है. भारत सरकार को, प्रदेश सरकार को, जिला पंचायत को, नगर/गांव को . पुल/सडकें जनता के कर से बनतीं हैं. जब तैयार हो जाती हैं तो टोल टैक्स की वसूली शुरु हो जाती है. हमलोग भी सोचते हैं कि सरकार ने दयाकर के सडक/पुल बना दिया, अब इसके लिये पैसा वसूल रही है तो ठीक ही है.
जब जनता के धन से ही उसका निर्माण हुआ तो फिर अतिरिक्त धन कैसा? टोल जो वसूला जाता है ठेकेदारी प्रथा से वसूला जाता है. जनता से जो धन जाता है उसका अधिकाधिक अंश इन्हीं ठीकेदारों के पास जाता है. इस प्रकार यह केवल टोल ठीकेदारों और उनसे मिले हुये लोगों के लिये ही वसूला जाता है.
सरकार और तमाम लोग इस पर प्रश्न उठायेंगे कि आखिर सरकार के पास धन कहां से आयेगा?
लोग सडक और पुल बनाने के लिये अनशन धरना और प्रदर्शन करते हैं, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राजदलों की चाटुकारिता करते हैं वोट के वादे करते हैं तब सरकार कई सालों में धीरे धीरे फंड देती है. फंड मिलने के बाद- ठीकेदारी और उससे जुडे तमाम जगजाहिर-रहस्य-जिनके प्रमाण जुटाये नहीं जा सकते- के बाद घीमी गति से निर्माण शुरु होता है, सरकार बदलने पर निर्माण रुक जाता है, फिर कुछ जगजाहिर-रहस्यों के समधान के बाद निर्माण कार्य शुरु होता है. और जनता गदगद भाव से निर्माणकर्ता का गुणगान करते हुये टोल्टैक्स देते हुये आशीष देते हुये चली जाती है.
यदि सरकार निर्माण धन किसी बैंक से कर्ज लेकर करे व बाद में टोल-टैक्स से कर्ज का भुगतान करे तो कुछ हद तक बात बन सकती है.
कुछ और सोचने पर यह समझ में आता है कि सरकार हर वाहन के उत्पादन पर कर लेती है, बिक्रय पर कर लेती है और पंजीकरण पर कर लेती है, पेट्रोल और डीजल पर कर लेती है तो फिर टोल टैक्स क्यों? इतना कर देने के बाद हर वाहन को चलाने का समुचित मार्ग तो मिलना ही चाहिये.
कारपोरेट प्रत्येक उपयोगी उपादान को अपने कब्जे में लेकर उससे असीमित कमाई करना चाहता है. इसलिये अब पीपीपी नया नाम देकर भरमाने की प्रक्रिया जारी है. आखिर कारपोरेट के पास जो धन है वह भी तो जनता का ही धन है. जनता से असीमित माध्यमों से धन लेकर उसी धन से पुनः धन बना रहा है. उनका काम भी ठेके पर ही होता है. आखिर सरकारी काम और कारपोरेट के भी काम ठीके पर ही हो रहे हैं और उनमें गुणवत्ता का अन्तर है तो मात्र व्यस्थापकों अर्थात सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण ही है.
अतः टोल टैक्स वास्तव में भ्रष्टाचार के कारण और भ्रष्टाचार के लिये लिया जाता है. इसे बन्द ही किया जाना चाहिये. अधिकाधिक टोल नाके पर टोलवसूली का ढंग अमानवीय होता है इसलिये भी इसे बन्द किया जाना चाहिये.
नमस्कार.
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