Saturday, October 12, 2013

जनता, राजदल और सरकार

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. शहर में ढोल नगाडे बज रहे हैं. महाष्टमी की तिथि . लोग व्रत हैं. हवन करेंगे. कुछ लोग को यह खर्च बिल्कुल बेकार लगता है. धर्म अफीम की तरह नशा है. सत्ता भी नशा है. प्रतिशोध की भावना भी नशा है. जो जन्म से इन बातों को देखते रहे हैं उनके स्वभाव में इनके प्रति प्रतिरोध नहीं है. अधिकांश जनता तो ऐसी ही है. कन्फ्यूजन में पडी हुई. डरी सहमी हुई. आलस्य में डूबी हुई. पिछले सौ वर्ष में कोई एक व्यक्ति है जिसकी बात से सभी सहमत हों. शायद नहीं. पहले भद्रलोक ( ज्ञानी, विज्ञानी ,धर्मी ,धर्मी, वादी , विवादी) रास्ता तय कर ले. जनता को भी राह मिल जाये. भारत के लिये क्या ठीक है , संविधान में तो "समाजवाद" का उल्लेख कर दिया गया और बताया ही नहीं गया कि यह क्या बला है. मुलायम समाजवाद और बहुजन अम्बेडकरवाद तो इतना धन देता है कि आयकर और सीबीआई समझ ही नहीं पाते कि यह क्या है. कचहरी मे जाते हैं और आते है.

जनता अपनी कुंठा, विषाद, चिंता आदि को हवन में जला देती हैं. पुरोहितवाद अशिक्षा की देन है, शिक्षा के प्रसार होने पर पुरोहितवाद धीरे धीरे खत्म हो सकता है यदि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये. भ्रष्टाचार भाग्य के रूप में स्थापित होता जा रहा है. जनता भ्रष्टाचार जनित परिस्थिति को भाग्य मान लेती है. हर व्यक्ति अपना काम कराने के लिये सोर्स, सिफारिस घूस का सहयोग ले लेता है और भगवान को प्रसाद चढा देता है तथा मित्रों बन्धु बान्धवों की नजर न लगे इसलिये उन्हें कुछ प्रसाद भोजन करा देता है. नजर से बचने के लिये चरणपूजन भी  करता है. नेता चाहे किसी भी दल का हो चरण पूजन करवाता है. जनता भी करती रहती है.

सभी राजदल धर्म को अपना साधन बनाने की कोशिश में लगे हैं. नवरात्रि का व्रत अनिवार्य तो नहीं है. किन्तु हर धर्म या विचारधारा या वाद को जन्म से मृत्यु पर्यन्त प्रमुख गतिविधियों के लिये विधि या कर्मकांड निर्धारित ही करने पडेंगे. जनता को जब तक नया और पूर्ण विकल्प जब तक नहीं मिलेगा तब तक पुराने कर्मकांड चलते ही रहेंगे. मूर्तियां तो बनती रहेंगी. विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, यीशु. मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा. गांधी , नेहरू, अम्बेडकर, ्कांसीराम,मायावती, मार्क्स,लेनिन आदि हर देश में हर वेष में. अच्छा लगे तो राम लीला, रावणलीला, दुर्गापूजा, असुर पूजा करते रहिये.

अब तो टीवी तरह तरह की लीला और बीच में विज्ञापन , हरतरह की पत्रिकाओं में सम्पादकों के धर्म और आडम्बर के विरुद्ध लेख और साथ में यौन जीवन के लिये दवा, टानिक जनता देख रही है और उसे भी आजमा  रही है. सभी पुरोहितों की कमाई से अधिक कमाई यौन टानिकों के माध्यम से होती है जिसे हमारे क्रांतिकारी सम्पादक अपनी विश्वसनीयता बांट देते हैं.

पुराने जमाने में वोट देने के लिये पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लेना आम बात थी. आज कल का सभ्य इन्टर्नेटिया समाज बूथ्कैप्चरिंग मेम माहिर हो गया है. एक ही आदमी जितना चाहे उतना वोट दे सकता है. इस फर्जी मतदान के आधार पर जिसे चाहे उसे महान बना दीजिये. जनता क्या करे. पढे लिखे बुद्धिजीवी समाज के इन्टरनेटिया फर्जी मतदान को कैसे रोके?

हमारे राजदल पंजीकृत होते हैं, चुनाव आयोग पंजीकरण करता है. नेता तय करते हैं कि दल क्या करेंगे. किसी में भी आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. ईनके धन का कोई हिसाब नहीं. जो चाहे सो करें. मंत्री जी सरकार के खर्चे पर सरकार का वेतन लेते हुये मनमानी बोलते रहते हैं. लोकसेवक यदि सरकार से वेतन पाता है तो उसकी आचार संहिता है. जो नेता सरकार से वेतन लेता है वह कुछ भी बोलने के लिये स्वतंत्र नही होना चहिये.

आइये आशा करें कि हमारे पथप्रदर्शक निष्पक्षता पूर्वक ऐसा व्यवहार करेंगे जो अनुकरणीय होगा. चैनल और मीडिया के लोग अपने आचार पर भी विचार करेंगे. जनता जो कनफ्यूजन में निर्णय के लिये दूसरों का मुंह देख रही है उसे उचित मार्ग मिलेगा. वह ठगा नहीं जायेगा छला नहीं जायेगा.

हमें अन्याय से लडने की शक्ति चाहिये , शक्ति चाहिये, शक्ति चाहिये.

नमस्कार.

Friday, October 11, 2013

"प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य"

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. त्यौहार का मौसम है. नवरात्रि से छठ तक भक्तिमय वातावरण है. गत दो दिन से महातूफान की चेतावनी चल रही एक भयंकर प्रलयंकर तूफान आज १२/१०/१३ की रात कभी भी भारत की धरती को छूने वाला है. आज नवरात्रि की अष्टमी तिथि है जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं. हमलोग बचपन से इस व्रत को करते आ रहे हैं. मेरे बचपन में इस व्रत का प्रचलन बहुत कम था. इस क्षेत्र में व्यवसायी (वैश्य) लोग दुर्गा पाठ कराते थे. पहले इस पाठ को बडे गोपनीय ढंग से कराया जाता था. कुछ लोग मूर्ति स्थापित कराते थे. धीरे धीरे इसका प्रसार होता चला गया . मानव उत्सव धर्मी है. उसे उत्सव मनाना ही है चाहे जिस रूप में मनाये.

भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाया गया. संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार दे दिये गये. राजनैतिक समानता मिल गयी. भारत में इस कारण पुराने भद्रजनों के साथ साथ नये भद्रजन जुडते चले गये. नये भद्र जन भी पुराने भद्रजनों की लीक पर चलने लगे.

वर्ण और जाति व्यवस्था का वैधानिक रूप समाप्त हो गया. आधुनिक  वैज्ञानिक जीवन  पद्धति का विकास होने लगा. समाजवाद की साम्यवाद की चर्चा आम होने लगी. राजा और राज व्यवस्था समाप्त हो गयी. प्रिवीपर्स की समाप्ति के साथ साथ राजा नाम भी समाप्त हो गया. सांसद और विधायक अपने को राजा कहने/मानने  लगे. जो एक बार राजनैतिक पैठ बनाया वह आजीवन पद और सुविधाओं को अपने पास करने के लिये नाना प्रकार के अनैतिक उपाय में जुट गया. इस क्रम में वर्ण और जाति को पुनः जीवित किया गया और राजभद्र लोगों ने इसके बहाने लोगों में आन्तरिक द्वेष फैलाने में पूर्णतः सफल हो गये. सम्प्रदाय के नाम पर बंटे भारत में समूह बनाकर राजभद्र लोग पद प्रतिष्ठा और धन की मनभर लूट की और कर रहे हैं. सबके पास नामी और बेनामी तथा विदेशी बैंको में अकूत सम्पत्ति भरी हुई है.

अपने धन और पद की रक्षा के लिये रोज नये हथकंडे अपनाये जाते हैं. पिछले दो या तीन वर्षों में मूल निवासी और महिषासुर पूजन की चर्चा शुरु हो गयी है. आज इस संदर्भ राजीव रंजन प्रसाद का एक अच्छा लेख पढ्ने को मिला.

समकालीन स्थिति में केजी से लेकर पीजी तक शिक्षा की स्थिति बदहाल है न स्कूल हैं न शिक्षक हैं न आधुनिक पाठ्यक्रम है. इस बदहाली को तभी समाप्त किया जा सकता है जब सभी इसकी लडाई लडे. जब सभी के लिये व्यवस्था हो जायेगी तो जाति, वर्ग, लिंग, सम्प्रदाय की बात समाप्त हो जायेगी. चिकित्सा सबकी आवश्यकता है. इसकी चपेट में आते ही अच्छे अच्छों की हालत खराब हो जाती है. भारत में सबके लिये निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था की लडाई सभी की लडाई है. सभी एक हो जायेगे तो दवा मे लूट समाप्त हो जायेगी.

धार्मिक/ मिथकीय आधारों पर मनाये जाने वाले समारोहों को राजनैतिक न बनाकर भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. "प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य" हे मां सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करें.
नमस्कार.

Wednesday, October 2, 2013

महात्मा मोहन दास गांधी

महात्मा मोहन दास गांधी
नमस्कार!
हालचाल ठीक है. आज दो अक्टूबर है. भारत का  राष्ट्रीय पर्व है. भारत के लोग गांधी से पिंड छुडाना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें नोट में छापकर घर घर पहूंचा दिया है. आन्दोलन करना हो तो भारत में गांधी का मार्ग लेना पडेगा किन्तु साथ में भीड भी रखना होगा. अगर भीड हटी तो इरोम जैसे गान्घीगीरी करते रहिये कोई फर्क नहीं पडेगा, राहुल गांघी की एक आवाज पर सिट्टी पिट्टी गुम.

गांधी के लिये मेरे मन में आदर रहा है, अभी भी आदर है, ऐसा राजनेता जो समाजसेवा के लिये राजनीति करता है. औसत भारतीय जैसा रहने और खाने व पहनने की आदत डाल लेता है. सत्य पर कायम रहने की कोशिश करता है. लोग आदर से महात्मा कहते हैं अभी भी तमाम आन्दोलन कर्मी गान्धी को अनुकरण करने का प्रयास करते हैं. भारत के लोग भगत सिंह को भी बहुत आदर देते हैं लेकिन उनके अनुसरणकर्ताओं की कमी है. सुभाष के नाम पर भी गांधी को बहुत अधिक बुरा भला कहा जाता है. ऐसा तो सम्भव नहीं है कि किसी भी राजनेता की हर बात सर्वकालिक  हो, समय के साथ साथ परिवर्तन जरूरी होता है.

स्वदेशी और चरखा गांधी के बडे हथियार सिद्ध हुये थे. कुटीर उद्योग की भि वकालत की गयी थी. उस समय की आवश्यकता भी थी. स्वदेशी का विकल्प क्या है? हमारा दैनिक जीवन जितना ही अधिक स्वदेशी पर निर्भर अर्थात आत्मनिर्भर होगा हमारी उन्नति  होगी. जापान और चीन हमारी सम्स्कृति के नजदीक हैं. हम उनसे काफी पीछे हैं, लगभग हर क्षेत्र में पीछे हैं. जापान का जनसंख्या घनत्व हमारी अपेक्षा बहुत अधिक है किन्तु हम जनसंख्या के नाम पर भ्रष्टाचार और घोटाले करते रहे. गांधी के नाम पर वोट लेने के लिये भाजपा नीत शासनकाल में भी भारत की नोट से गांघी नहीं हटाये गये. नोट पर तो मात्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह और रिजर्व बैंक का चिन्ह होना चाहिये. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का आदर होना चाहिये. अभी भी स्वदेशी की प्रासंगिकता उतनी ही है. हमें पूरे विश्व पर नजर रखते हुये तकनीक के हर क्षेत्र में स्वदेशी को बढावा देना चाहिये. हम जितना ही आत्म निर्भर होंगे मुद्रासंकट से उतना ही मुक्त रहेंगे.

गांधी एक वकील थे, वकालत उन्हें रास नहीं आयी.  क्यों ? (आसाराम के वकील). आज जो भी वकील राजनीति में आ रहे हैं वकालत को छोडकर नहीं आ रहे हैं. उन्हें धन और राजसुख चाहिये, इसके लिये वे सत्ता को सत्य से दूर करने का हर उपाय शासन को बताते हैं ऐसी स्थिति में क्या जनता से उम्मीद की जा सकती है कि वह कानून और संविधान का सम्मान करे.

राजनेता अधिकारियों को निलंबित, स्थानान्तरित,  मौखिक प्रताडना आदि से दबाव बनाकर लगातार अवैधानिक कार्य कराते हैं इसका प्रमाण खोजकर न्यायालय में सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है किन्तु जिस प्रकार यह काम किया जाता है उसका संदेश तो जनता में जाता ही है. गांधी के देश में राजपद पर रहते हुये गांधी के चित्र के नीचे ही यह काम हो तो गांधी की प्रासंगिकता को ही समाप्त करता है."लगे रहो मुन्नाभाई" का किरदार निभानेवाला अपनी गलती स्वीकार कर जेल जाने को तैयार नहीं होता. जब किरदार निभाने वाले के चरित्र में परिवर्तन नहीं हो पाता तो यह फिल्म मात्र मनोरंजन ही तो कर पायेगी.

मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ही अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये गान्धी को निरंतर अप्रासंगिक बनाने का काम करती रही है. जब किसी व्यक्ति को अप्रासंगिक बनाना हो तो उसकी मूर्ति बना लिया जाय. उसपर माला चढाया जाय, उसकी पूजा की जाय, उसके विचार कालवाह्य हो जायेंगे. गांधी स्मारक स्थल पर जितनी गैस जला दी जाती है उससे गांधी के जीवन भर के त्याग की   तपस्या नष्ट हो जाती है.

लुटियन दिल्ली को बिल्कुल नष्ट कर राजशाही और अंग्रेजों के बनाये राजप्रतीकों नष्ट कर जनता के प्रतिनिधियों के लिये और जनता को अपनी बात कहने का स्थान बनाना चाहिये. स्वदेशी का प्रारम्भ यही से होना चाहिये.

बाकी बहुत कुछ है फिर कभी..
इस बकवास में कुछ सार्थक हो तो बताइयेगा.
नमस्कार!

Tuesday, August 27, 2013

नमस्कार!
हालचाल ठीक है,
खाद्य सुरक्षा बिल और उसकी आवश्यकता पर बडे बडे माननीय, अर्थशास्त्री, चिन्तक, सिविल सोसाइटी के लोग अपनी बात कह चुके. बिल लोक सभा से पास हो गया. राज्यसभा से पास हो जायेगा. कानून भी बन जायेगा. यह भारत के सभी नागरिकों के लिये हो जाता तो क्या बुरा हो जाता. कालाबाजारी बन्द हो जाती. इससे सम्बन्धित भ्रष्टाचार बन्द हो जाता.

प्रत्येक व्यक्ति के लिये खाने भर का गेंहू और चावल एक भाव से पूरे देश में मिल जाय तो अर्थव्यवस्था बिल्कुल  नहीं हिलेगी. किसान से लाभकारी मूल्य पर केन्द्र सरकार जितना किसान बेंचना चाहे उतना खरीद ले हर विकास खण्ड पर अत्याधुनिक सेलो बनाकर सुरक्षित कर ले. उसे साफ करके गुणवत्ता के मानकों को नियत कर सभी के लिये खाने भर का गेंहू और चावल उपलब्ध करा दे.

अर्थशास्त्री जी बोलेंगे कि पैसा कहां से आयेगा? ७०% आबादी के लिये जहां से आयेगा वहीं से सबके लिये आयेगा. श्रीमान अर्थशास्त्री जी भारत की जनसंख्या की आमदनी को चाहे जितने वर्गों बांटिये लेकिन कुछ सातत्य तो रहेगा. हमारे संविधान में समाजवाद  जोडा गया है उसका  उपयोग , भोजन, वस्त्र, शिक्षा और चिकित्सा में होना चाहिये.

राम जी को वर्ष में तीन लाख वेतन मिलता है, वर्ष भर में पचास हजार जीपीयफ.बीमा आदि धारा ८० का लाभ ले लेते हैं. उनको पांच हजार टैक्स भी दे देना पडता है, घर में उनको छोडकर पांच अन्य सदस्य हैं. इस प्रकार उन्हे प्रति व्यक्ति लगभग तीन हजार प्रति माह खर्च के लिये मिल जाता है. इतनी ही आमदनी वाले श्याम जी के घर कुल तीन प्राणी हैं. उन्हें छह हजार प्रति व्यक्ति मिल जाता है. परनामी जी भी साल भर में तीन लाख कमा लेते हैं किन्तु वे यह कमाई ठेले से करते हैं. वह बीपीयल कार्ड धारक हैं .चरनामी जी तीनलाख वेतन से और तीन लाख ऊपर से कमा लेते हैं. वह एक लाख की बचत दिखाकर आय्कर से भी बच जाते है. इसप्रकार नाना प्रकार के लोग हैं, इन्हें आयकरदाता वर्ग, मध्यवर्ग और गरीबी रेखा के नीचे के वर्ग में बांट्कर केवल वोट का जुगाड किया जा रहा है.

बन्धुओं, आप सभी लोग, सबके लिये एक भाव पर अन्न, के.जी. से पीजी तक एक समान सबको शिक्षा तथा सबके लिये एक समान चिकित्सा सुविधा की मांग कीजिये चाहे आप जिस दल को पसन्द करते हों.
ध्न्यवाद.

Wednesday, August 14, 2013

१४ अगस्त २०१३

१४ अगस्त २०१३

नमस्कार!

हालचाल ठीक है. कल "पन्द्रह अगस्त" है. भारत की जनता के लिये एक महत्वपूर्ण दिन. पुराण कथा में जिस प्रकार गंगा जी भगीरथ के अथक तपस्या से  स्वर्ग से अवतरित हुई. उसी प्रकार जनता की प्रसन्नता का दिवस है. गंगा जी शिव की जटा में उलझ गई. भगीरथ पुनः तपस्या में जुटे तब गंगा जी पृथ्वी पर आकर भगीरथ के पीछे-पीछे गंगासागर तक जाकर समुद्र में मिलीं.

भारत के लोग पन्द्रह अगस्त १९४७ के बाद अपनी तपस्या छोड दिये और हमारी स्वतंत्रता तमाम विचारधाराओं  के बहाने कुछ लोगों के हाथों में चली गई. उन्होनें अपनी सुविधानुसार संविधान बनाया. अब उसकी मनमानी व्याख्या करते हैं, अपने लिये संशोधन भी कर लेते है.

जनता मुंह ताकती रह जाती है. वे संविधान को सर्वोपरि नहीं मानते. संसद को भी नहीं मानते. अपने को मानते हैं. किन्तु इन सभी की आत्मा कुछ घरानों और व्यक्तियों में सिमट गयी है.

उनके वक्तव्य आम जनता को सुनने पड्ते हैं, झूठ लगने पर भी मानने पडते हैं. अपनी आवश्यकताओं के लिये इन पर निर्भर होना पडता है. इसलिये ये जनता को तमाम खेमों में बांट चुके हैं. लोग आपस में दंगा करने पर उतारू हैं. बहुत होता है तो इनमें से कुछ को गाली देकर जनता अपनी भडास भी निकाल लेती है.

आशा करें कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर पुनः एक साथ तपस्या करेंगे और हमारी स्वतंत्रता निर्मल धारा के रूप में बहने लगेगी. हम पुनः अपनी आजादी को उल्लास के साथ आत्मसात कर सकेंगे.

जय जनता! जय जगत!!

Friday, August 9, 2013

हमारी शिक्षा -१

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.

शिक्षा किसी के चुनाव के घोषणा-पत्र का प्रमुख अंग नही बन पाता. सबको शिक्षा किन्तु कैसी शिक्षा? प्रत्येक वर्ग के अभिजन समुदाय के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ सकें इसकी  व्यवस्था शिक्षा के अधिकार कानून में कर दी गयी है.

प्राथमिक शिक्षा की चिन्ता छोडकर अब केवल मिड डे मील की बात चलती है. ग्राम पंचायत के सभापति को छोडकर अन्य सदस्य तथा अभिभावक के चुने हुये सदस्यों को एक एक माह मिड डे मील की व्यवस्था की जिम्मेदारी दी जानी चाहिये. अभिभावकों में से ही निरीक्षक भी रखे जाने चाहिये शिक्षकों को इससे पूर्णतः मुक्त कर दिया जाना चाहिये.

छात्र-शिक्षक अनुपात को २५  ः १ करना चाहिये, प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम छ्ह कमरे कक्षा के लिये, इसके अतिरिक्त अध्यापक कक्ष, भंडार कक्ष, रसोईघर, पर्याप्त संख्या में शौचालय होने चाहिये. विद्यालय की सफाई की व्यवस्था होनी चाहिये. स्वतंत्रता के पूर्व मिट्टी के बने भवनों मे कमरों की संख्या अधिक होती थी. किन्तु बाद में तीन कमरों के भवन बनने लगे. उसके बाद छोटे छोटे कबूतरखानें जैसे  कमरे बनाने की भरमार हो गई.

प्राथमिक शिक्षकों से जो भी अतिरिक्त कार्य लिये जाते हैं उन्हें ग्रीष्मावकाश में समुचित मानदेय देकर कराना चाहिये.

अंग्रेजी की पढाई की व्यवस्था अब सभी स्कूलों मे कर दी जानी चाहिये किन्तु पढाई का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिये. हाई स्कूल तक भाषा की पढाई मौखिक और लिखित दोनों स्तरो पर होनी हिये. सुलेख, श्रुतिलेख,सुपठन अनिवार्य किया जाना चाहिये.

हमारे माननीय गण विकास की बात करते हैं, वेतन भत्ता और पेंशन लेते हैं पैसा बांटने के लिये लोगों की लाइन लगवाते हैं किन्तु हर प्रकार के दायित्व से मुक्त रहते  हैं. उनके क्षेत्र के छात्र पिछडे क्यों इसका उत्तर भी उनसे पूछा जाना चाहिये. जिस प्रकार प्रश्नकाल होता है उसी प्रकार प्रतिवेदन काल भी होना चाहिये जिसमें हर माननीय अपने क्षेत्र की जानकारी दे सके. इस प्रतिवेदन में प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा  तक होनी  चाहिये. जहां तक शिक्षा के अधिकार के दायरे  को बढाया जाय वहां तक जबाबदेही भी बढनी चाहिये.

यदि हम चाहते हैं कि उच्च शिक्षा गुणवत्ता पूर्ण हो तो हमें प्राथमिक स्तर से लेकर हर स्तर पर सुधार करना होगा. प्रत्येक स्तर पर मानव संसाधन और भौतिक संसाधन दोनों का अति अभाव है.

अतः हम सभी को आगामी चुनाव में दबाव बनाना ही होगा कि केजी से पीजी तक अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निःशुल्क एवं सबके लिये सुलभ शिक्षा की व्यवस्था होनी ही चाहिये.

फिर मिलेंगे
नमस्कार!

Sunday, July 21, 2013

आयकर

नमस्कार!

हालचाल तो ठीक है किन्तुआज आयकर के बारे में कुछ सूचनायें देखने को मिलीं. आयकर विभाग मध्यवर्ग के नौकरों (नौकरी करने वाले ) को बहुत डराती है. आयकर विभाग जो भी चिठ्ठी भेजता है उसमें सजा की धमकी जरूर रहती है. हर कार्यालय में आयकर गणना  की चर्चा होती रहती है. कुछ वर्षों पूर्व आयकर की गणना और सूचना भेजने के लिये एक सीडी  की चर्चा चली किन्तु अभी तक आयकर विभाग यह सीडी टीडीयस अधिकारियों को नहीं भेज सका.

अभी धारा ८० सी के तहत सभी को दो लाख की ही छूट मिलती है चाहे आप की आमदनी  चार लाख प्रति वर्ष हो या दस लाख प्रति वर्ष.यह छूट तो आमदनी आधारित होनी चाहिये.  चाहे आप अकेले  हों या आपके दस आश्रित हों. आय कर तो प्रतिव्यक्ति आमदनी पर होना चाहिये. आपकी आमदनी अधिक होती है तो व्यय भी अधिक होता है और आप व्यय पर भी विविध प्रकार के कर देते हैं. इसी कारण व्यक्तिगत आयकर न लेने का भी सुझाव आता है किन्तु सरकार इसे नहीं सुनती.

इस देश के तमाम लोग जो नौकरी नहीं करते वे कितना आयकर  देते हैं, सभी जानते हैं. किन्तु डिफाल्टरों का जमाना है सरकार एक आध डिफाल्टरों को पकड कर चुप हो जाती है. और मध्यवर्ग के नौकरों के बच्चे दूध, फल, सब्जी और अखबार क पैसा आयकर के रूप में जमाकर सर पीट्कर रह जाते हैं.

आयकर देने वालों को एक पैन कार्ड भी सरकार अपने व्यय पर नहीं दे पाती और जो बनवाते हैं उसपर आवास का पता नहीं होता, अर्थात आप उस कार्ड का उपयोग बैंक का खाता खुलवाने या सिमकार्ड लेने में नहीं कर सकते. है न सोचनीय बात कि जो व्यक्ति आय्कर विभाग को लखों दे देता है सरकार बदले में उसे एक आवासीय पता का प्रमाण पत्र भी नहीं दे पाती.

यदि आप आयकर दाता हो गये तो गये काम से यह सरकार आपके कल्याण के लिये कुछ नहीं कर सकती. न चिकित्सा करायेगी न दुर्घटना पर पूछेगी न मरने पर पूछेगी.

इसलिये बन्धुओं यदि मेरी बात से सहमत हों तो इसे शेयर करें, राजदलों पर दबाव बनाये कि आयकर आयकर दाता के परिवार के सदस्यों कभी ध्यान रखे. उसके आयकर का एक मामूली अंश सामूहिक चिकित्सा बीमा में भी भेजे. उसका सामुहिक बीमा कराये और वह जब तक कर देता है उसकी करदेयता के आधार पर उसे बीमा धन मिले..........