Monday, January 6, 2014

आयकर से टोलटैक्स तक

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद  मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.

आयकर  की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा  को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया  जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था  को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.

आम आदमी और चुनाव के मुद्दे

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
२०१४ के संसदीय आम चुनाव का प्रचार जोरों पर है. मीडिया और चौपाल सभी जगह एक ही चर्चा कौन जीतेगा. किस राजदल को कौन सी रणनीति अपनानी चाहिये.
भारत के नागरिक को, भोजन, वस्त्र, आवास,शिक्षा, चिकित्सा,न्याय,सुरक्षा कैसे मिल सकेगी? कौन इसे देने की बात कर रहा है? केजरीवाल, मोदी, राहुल, मायावती, मुलायम या कोई और.
भाजपा ने कर्म्चारियों के पेंशन योजना को बिना सोचे समझे समाप्त कर दिया अभी तक उसका पूरा पूरा  समाधान नहीं हो पाया है. मोदी के विकास के माडल में पूंजीवाद ही चलेगा. भले ही उनकी माताजी घरेलू नौकरानी थी वे मजदूरों की बात नही करेंगे आज उनके प्रिय कारपोरेट घराने हैं.वे चाय जब बेचते थे तब बेचते थे अब उनके मन में गरीबों को और गरीब बनाने का सूत्र है.
वे सबको समान और गुणवत्ता पुर्ण शिक्षा देने की बात नहीं कर सकते. ्गुजरात के सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय मानक नहीं हैं. वहां के हर नागरिक को हर स्तर की अत्याधुनिक चिकित्सा की सुविधा नहीं है. वहां पर भी न्याय शीघ्रता से नहीं मिलता है.

आज भारत की जनता मूल्भूत मुद्दों पर राय जानना चाहती है.वह रोजी-रोटी, भोजन-छाजन या रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय  ौर सुरक्षा की चिन्ता में है. इन समस्याओं का समाधान किस दल के पास है? उसका खाका बताये और जाकर जनता की सेवा करे. सता और कुर्सी केलिये ठीका पर कब्जा के लिये मुखौटा बदल कर विधायिका के रास्ते सता पर कब्जा की नीयत छीड दे.
नमस्कार!


सरकारी आवास की सीमा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर  पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि  उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.

इस बहस  ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में  सिंहासन,  राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों  पर हुये  व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.

जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर  बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो  काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.

नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.

नमस्कार.


Saturday, January 4, 2014

आप ही आप

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप  के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से  कार्यालय या  सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने  की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों  तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.

Sunday, December 29, 2013

वर्ग और संघर्ष

नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आआप की सरकार के शपथग्रहण कालीन  स्वतःस्फूर्त भीड के चलते आज फेसबुक पर साम्यवादी, वामपंथी, बहुजनवादी, अम्बेडकरवादी,कांग्रेसी, समाजवादी और भाजपाई मित्र अपने अपने विचार की कसौटी पर कस रहे हैं. अपने से सहानुभूति रखनेवालों को सचेत कर रहे हैं.
भारत में अधिकाधिक लोग किसी दल के सदस्य नहीं हैं, उन्हें एक अच्छी साफसुथरी सरकार चाहिये. मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं. मुझे प्रतियोगिता की अपेक्षा  सहकारिता अच्छी लगती है, व्यक्तिनिष्ठता की अपेक्षा वस्तुनिष्ठता अच्छी लगती है. गांधी व  विनोबा का त्याग और समाजसेवा आकर्षित करता है.
मुझे अम्बेडकर अच्छे तो लगते हैं लेकिन एकांगी लगते हैं. मुझे मार्क्स भी आकर्षित करते हैं किन्तु बन्दूक की गोली अच्छी नहीं लगती. इस प्रकार राजनैतिक दृष्टि से एक भ्रमित व्यक्ति. इस तरह का भ्रम केवल मेरा नहीं है. बहुतों का है. यही सोचकर मैं अपनी बात आपसभी के समक्ष रख रहा हूं कि मुझे अपनेभ्रम को दूर करने के लिये कुछ सुझाव प्राप्त होगा.
जनता को दो आर्थिक वर्गों में बांटकर उनमें संघर्ष की बात की जाती है. क्या आर्थिक आधार पर दो भाग का विभाजन हो  तो सकता है आप कह सकते हैं कि भूस्वामी और भूमिहीन. क्या सभी भूस्वामी समान भूमि रखते हैं ? नहीं. फुट्पाथ से लेकर महल तक फैली हुई आवासीय सम्पत्ति को क्या दो ही वर्ग में बांटा जायेगा?
उदाहरण दिया जाता है कि रात और दिन. सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन और बाकी रात, कितु प्रकाश की मात्रा और गर्मी एक सातत्य पर मिलेगा. शून्य आय से लेकर सर्वाधिक आय के बीच एक सातत्य है.
पूंजीवाद में कहा जाता है कि मजदूरी मारकर ही धन कमाया जाता है. हर उत्पाद का उपभोक्ता भी तो ठगा जाता है. पूंजीवाद प्राथमिक उत्पादक, मजदूर, धन लगाने वाले शेयरहोल्डर और उपभोक्ता सभी शोषित की श्रेणी में हैं.
देश की सभी सम्पदा पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व हो जाय. उत्पादन के साधन सरकार के पास हो जाय यह सब ठीक लगता है किन्तु सत्ता एक व्यक्ति में सीमित हो जाय तो ठीक नहीं लगता. कोई भी दल या व्यक्ति सर्वोच्च हो जाने पर नियंत्रण से बाहर हो जाता है.
भारत के संसद्वादी वामपंथी दल और अन्य वामपंथी दलों को वामपंथी विचारक एक साथ लाने में विफल हैं. सर्वोच्च आसन पर जाने और उसपर बने रहने की अदम्य लालसा सबमें एक समान दिखाई दे रही है. यही सबसे बडी बाधा है.
नमस्कार.

Monday, October 14, 2013

भारतीय उच्च शिक्षा

नमस्कार!
हालचाल ठीक है. किन्तु भारतीय उच्च शिक्षा का हाल ठीक नहीं है. आज बीबीसी के रेहान फजल का ब्लाग देखा और उसे शेयर भी किया किन्तु लगता है कि कुछ और भी कहना चाहिये, इसलिये ब्लाग पर आ गया.
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिये जबसे नाक (NAAC) का कार्य प्रारम्भ हुआ तबसे ही संदेह उपजने लगा. इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के बाद संदेह विश्वास में बदलने लगा कि भारत के राजदल शिक्षा को भार मानते हैं और इसे बेचकर अकूत धन कमाना चाहते हैं.

उच्चशिक्षा की गुणवत्ता की बात महामहिम राष्ट्रपति  श्री प्रणव मुखर्जी भी कर रहे हैं. इस देश के नागरिक जानते हैं कि वे कितनी बार वित्तमंत्री रह चुके हैं. उच्चशिक्षा के स्तर की जानकारी उन्हें तब भी थी. 1966 के कोठारी आयोग द्वारा सबके लिये स्नातक स्तर की निःशुल्क शिक्षा की बात की गयी थी. उसी शिक्षा को अब बेचने की बात चल रही है , वह भी तब जब आयकर, सेवाकर के साथ शिक्षा उपकर लिया जाता है. कांग्रेस को छोड दें तो भाजपा भारतीय परम्परा की बात तो बहुत करती है किन्तु शिक्षा का धंधा करती है इसलिये निःशुल्क शिक्षा से उसे परहेज है. वह अपने सरस्वती शिक्षा मंदिरों को निजी विश्वविद्यालय में बदलने का सपना देखती है.

उच्च शिक्षा की दुर्दशा का प्रमुख कारण इस मद में बजट प्रावधान को कम करना रहा है. प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने की जगह प्रौढ शिक्षा और आंगन बाडी जैसी योजनायें संचालित की जाती हैं जिसका नब्बे प्रतिशत धन हवा में उड जाता है. पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिली. आज भी गावों और शहरों के प्राथमिक पाठशाला मूलभूत संसाधनों के अभाव में हैं. शाला-शिक्षक-पुस्तक के अभाव में दर्जाफनौवल कर दिया जाता है. माध्यमिक शिक्षा की स्थिति उससे भी बदतर है. उच्चशिक्षा की स्थिति सबसे खराब है. आज के चिन्तक केवल उच्च शिक्षा  की गुणवत्ता पर अचानक हायतौबा मचा रहे हैं तो क्यों?

सरकार अब से भी चाहे तो  चरणबद्ध रूप से काम करने पर 2025  तक हम मानक स्तर पर पहुंच सकते हैं. इसके लिये हमें यह जानना होगा कि हमारी तब तक की युवा शक्ति को कहां भेजना है? सबके लिये मानक प्राथमिक शिक्षा की  ( कक्षा आठ तक  ) निःशुल्क व्यवस्था करनी होगी. इसके लिये मानक विद्यालय भवन, शिक्षक, पाठ्यपुस्तक चाहिये. शिक्षकों की आवश्कता की पूर्ति हेतु प्रत्येक तहसील स्तर पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र चाहिये. साथ ही स्नातक स्तर पर एक प्राथमिक शिक्षा का डिग्री पाठ्यक्रम चलाना चाहिये जिसके तीसरे  वर्ष में अध्यापन अनुभव होना चाहिये. यह काम हमें युद्ध स्तर पर 2016 तक पूरा करना होगा.

माध्यमिक विद्यालयों को  चार वर्ष का (नौवीं से बारहवीं कक्षा तक)  का पाठ्यक्रम चलाना चाहिये. सभी माध्यमिक विद्यालयों में  सभी स्ट्रीम की शिक्षा मिलनी चाहिये. इसके विद्यालय  भवन,  शिक्षक, पाठ्यक्रम चाहिये. इन सभी कार्यों के लिये प्राइवेट एजेंसियां नहीं चाहिये. सरकार को करनी होगी . इसके लिये संविधान में उल्लिखित वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को ध्यान में रखना होगा. शिक्षा को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना होगा. 2020 तक इस काम को पूरा करना होगा.

उच्चशिक्षा के केन्द्र महाविद्यालय और विश्वविद्यालय  को राजनीति से मुक्त करने के लिये कुलपतियों की नियुक्ति से सरकार को अपने से अलग कर लेना चाहिये. इस समय कुलपति  से लेकर चपरासी तक सभी पदों पर बोली लग जा रही है. जहां बोली नहीं है वहां वेतन नहीं है. दो हजार, आठ हजार, दस हजार प्रति माह पर नेट या पीयचडी शिक्षक भारत में ही मिलेंगे, और आप गुणवत्ता कि बात करेंगे.

समसामयिक जीवन के लिये किस क्षेत्र में किस तरह के कितने लोगों आवश्यकता है इसकी जानकारी करनी होगी. तदनुरूप पाठ्यक्रम और सभी सम्बन्धित साजोसामान की व्यवस्था सरकार को करनी पडेगी. यदि 1500  विश्वविद्यालय चाहिये तो भारत की जनता तो इतना कर(Tax) देती है कि 3000 विश्वविद्यालय चल सकें. जो लोग रोज यह कहते हैं कि कठोर निर्णय लेने पडेंगे उन लोगों ने कालेधन की उत्पत्ति रोकने , बाहर गये काले धन को वापस लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कौन से कठोर निर्णय लिये हैं.

जितने भी गुणवता निर्धारण करने वाले संस्थान  हैं उन सभी की गुण्वत्ता संदिग्ध है. नाक का क्या मानक है ?उसे पहले देश और प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मूल्यांकन करना चाहिये. निदेशालयों का मूल्यांकन करना चाहिये. महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में तिथि निर्धारित कर पहुंच जाना चाहिये. अभी तक नाक के वेबसाइट का हिन्दी संसकरण काम नहीं करता है.

हमारे माननीय  संसद में बैठकर संसद की गुणवत्ता जब तक नहीं बनायेगे तबतक भारत के किसी संस्था में गुण्वत्ता नहीं आयेगी. शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर उसे बेचने की तैयारी चल रही है. इससे जनता को सावधान होना होगा.

नमस्कार.

Sunday, October 13, 2013

विजयादशमी

विजयादशमी

नमस्कार!
हालचाल ठीक ही है. आज विजयादशमी, आश्विन, शुक्लपक्ष, विक्रमीय संवत २०७०,  चौदह अक्टूबर २०१३  है. हर्ष का पर्व है. भारतीय परम्परानुसार क्षत्रिय लोग शस्त्रपूजन करते हैं. दशहरा का मेला और छुट्टी. एक हंसी खुशी का त्यौहार , दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन की तिथि. यह सब कुछ आज अधर में लटका हुआ है. एक भयंकर तूफान पायलिन/फेलिन उडीसा से उत्तर पश्चिम की ओर बढते हुये कमजोर पडता जा रहा है. उसके प्रभाव से देवरिया में कल से ही बरसात हो रही है. कल रात से अबतक लगातार मध्यम गति से मध्यम हवा के साथ वर्षा ने उत्सव और और समारोह पर वास्तव में पानी फेर दिया है. सरकार की चैतन्यता से तूफान से सम्भावित जनहानि को बचा लिया गया है. किन्तु मध्यप्रदेश में दतिया के पास देवीदर्शन के समय प्रशासन की चूक से भयंकर भगदड में ९० लोग मर गये सैकडों घायल हो गये. तूफान प्रभावित क्षेत्र को छोडदिया जाय तो लोग बरसात के बाद आनन्दोत्सव में व्यस्त हैं.

राम भारत में भक्ति, अध्यात्म, समाज और राजनीति सबको अत्यधिक प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व है. भारत में राम से निरपेक्ष रहना कठिन है. कभी राम के साथ कभी राम के विरोध में. इस समय जब मैं यह ब्लाग टंकित कर रहा हूं साथ साथ जगजीत सिंह का राम भजन सुन रहा हूं. कथा के अनुसार राम का अवतार एक काल विशेष में एक कार्य विशेष  के लिये हुआ था. वह कार्य सम्पन्न कर राम ने जलसमाधि ले लिया.

अब राम के नाम पर केवल राजनीति चल रही है. वह राजनीति भक्ति की हो या शक्ति की. लोग अपनी बुद्धि के अनुरूप राम की व्याख्या में लगे हैं. इसके अतिरिक्त  शैव, वैष्णव, शाक्त,  तांत्रिक, मान्त्रिक, वामाचारी, अघोरी आदि न जाने कितने लोग लोगों को लुभाकर उनकी श्रद्धा के कारण अपने नाम और धाम को चमका रहे हैं. मनुष्य के जन्म के साथ ही तरह तरह की समस्यायें शुरु हो जाती हैं, इन सभी समस्याओं का निराकरण किसी स्पष्ट वैज्ञानिक विधि से सम्भव नहीं हो पाता. जिन समस्याओं का निराकरण सपष्ट है उसके लिये कोई राम के पास नहीं जाता. लेकिन असमाधानशील समस्याओं ्के निवारण के लिये लोग अवैज्ञानिक विधियों का सहयोग लेते हैं इसमें लगभग सभी आ जाते हैं.

राम रामलीला के बहाने बचपन में जो आनन्द दे जाते हैं वह आजीवन रस देता रहता है. और दशहरा मनाया जाता रहेगा. जब हम किसी भी खेल में जीत होने पर इतने मगन हो जाते हैं तो एक समय के राष्ट्र के जीत पर लोगों ने खुशी मनायी और वह चल रही है. आधुनिक लोग तो सचिन को भी भगवान बना चुके हैं. जो बचपन में आत्मसात हो जाता है उसे बाद के ज्ञान और तर्क द्वारा भले ही मानस से निकालने का प्रयास किया जाय वह पुनः स्थापित हो जाता है. साम्स्कृतिक परिवर्तन और जीवन की आवश्यकता के कारण बहुत सी विचित्र बातें दिखाई देने लगती हैं. यह व्यक्ति के मूल्य का प्रश्न है.

भोजपुरी में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को दुर्गा भसान कहते हैं. आज दुर्गा भसान का दिन भी है वर्षा हो रही है. आज स्थगित ही होगा लोग इसे अब पूर्णिमा तक ले जा सकते हैं.

इन सारी गतिविधियों के सक्रिय भागीदार, समर्थक, निरपेक्ष, विरोधी, निन्दक,  सभी को अपना लक्ष्य मिल जाय और किसी के मन में कोई ग्रंथि न रहे, सभी मानसिक रूप से स्वस्थ रहें यही त्यौहार की उपयोगिता है.

नमस्कार.