नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से कार्यालय या सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी. आम आदमी खुश है. आआप के रथ को रोकने के कुछ तिकडमी प्रयास किये गये. रथ को २०% पहले रोक भी लिया गया. अभी आम आदमी भीड का हिस्सा ही बना रहना चाहता. अपने मत को हारते देखने से पहले ही रास्ता बदल लेता है. इसका मुख्य कारण निर्णय लेने के लिये आवश्यक मुद्दों का अभाव. बहुमत के अभाव में ही सही भाजपा, कांग्रेस और मीडिया ने हुरपेट कर केजरीवाल को फंदे में लेना चाहा किन्तु उन्होंने जनता से पू्छने का आइडिया लेकर इन तीनों के मंसूबे पर पानी फेरकर सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया.
अब कोठी और कार का कलह उपजा है. प्रशासनिक लोकसेवक भारत में अपना प्रभुत्व बनाने के लिये मंत्रीगण को तमाम सुख सुविधायें उपलब्ध करा देते हैं, प्रलोभन, के तमाम स्वरूपों का उपयोग कर इन्हें जनता से दूर और आरामदेह जिन्दगी जीने का आदती बनाकर अपना काम करा लिया जाता है. करोडों, अरबों के कारोबार में आदर्शों के नशे हिरन हो जाते हैं. इन लोगों पर सभी प्रकार के साम, दान, दण्ड और भेद के हथियार उपयोग में लाये जायेंगे. जनता से संवाद करते रहने और सचेत रहने से तथा निरंतर सुधार करने की आदत रहेगी तो निखार ही आयेगा.
जनसेवा का कार्य वानप्रस्थ आश्रम या सन्यास आश्रम से ही चल सकता है. अर्थात जो भी जनसेवा करना चाहेगा उसे परिवार और परिजन के सुख से वंचित होना पडेगा. विधायक हो मंत्री सबको एक समान ही आवास की आवश्यकता है. आवास को आफिस मत बनाइये. कार्यालय का काम कार्यालय में ही कीजिये. जनता से कार्यालय या सचिवालय में ही मिलिये. लेकिन मिलिये अवश्य. प्रेस से भी मिलिये. ऐसी तकनीक बनाइये कि जनता को अपनी बात कहने के लिये आपके पास जाने की जरूरत ही कम पडे. ईमेल से आवेदन मंगाइये और समस्या का निपटारा कीजिये.
भारत की जनता में त्याग को बडा माना गया है अभी भी उसका महत्व है. आआपा के प्रत्येक सदस्य अब राडार पर है. इसपर आपको सचेत रहना पडेगा. इस समय जो भी दशा चल रही है
भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही चर्चा चलती रही कि साम्राज्यवाद के अवशेषों का समापन कर दिया जाय किंतु हर बार जनता धोखा खा जाती है. बहुत दिनों तक बहस चली कि राष्ट्रपति भवन से लेकर समस्त तामझाम में लोकतंत्र की आत्मा मर जाती है. एक बार बडा फैसला लेकर लुटियन दिल्ली को तहस नहस कर सभी सांसदों, विधायकों मंत्रियों केलिये बने हुये भवनों कोध्वस्त करना ही होगा.
देश के बहुत से लोग सांस थामे आआप की सफलता चाह्ते हैं तथा यह भी चाह्ते हैं कि मंत्रीगण इत्नी सादगी से रहें कि कोई भी जल्दी मंत्री न बनना चाहे.
नमस्कार.
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