नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.
आयकर की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है.
चुनाव के जमाने में कर की चर्चा भी हो ही जाती है. भारत में पत्रकार जगत में 'करदाता' शब्द प्रचलित है. जब हम करदाता कहते हैं तो भारत के कुछ लोग गौरवान्वित महसूस करते है. कर तो भारत का प्रत्येक नागरिक देता है. कर पर चर्चा योगव्यवसायी बाबा रामदेव ने शुरु किया है. बाबा अब हजार रूपये की नोट नहीं बन्द करायेंगे न ही कालाधन को भारत में मंगवायेगे. (अब बाबा भी क्रीम पाउडर बनाने बे्चने लगे हैं तो बात का विषय भी बदल गया है. इनके उत्पादों की दुकानों से भी पक्की रसीद नहीं मिलती. दन्तकांति के लगातार उपयोग से मेरे दांत हिलने लगे हैं. )
मुद्दा तो बिल्कुल ठीक है कि भारत की कर प्रणाली दोषपूर्ण है. इस प्रणाली में हम केन्द्र सरकार, प्रान्त सरकार, नगर , गांव सबको अलग अलग टैक्स देते हैं. जब सुविधाओं की बात आती है तो सब अपना पल्ला झाड लेते हैं.
अप्रत्यक्ष कर उत्पादकर्ता और विपणन कर्ता वसूल करते है. जितनी इच्छा होती है उतनी सरकार को देते हैं बाकी सब रख लेते हैं. आईयमयफ भारत सरकार को सरकारी खर्च कम करने को कहता है तो ये सरकारी विभागों में नियुक्तियों रोककर खर्च बचाने का दिखावा करते हैं, खूब फिजूल्खर्ची करते हैं और अप्रत्यक्ष करों का मात्र दस प्रतिशत ही संग्रह करते हैं.
भारत के नागरिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद भी कितना कर दे देना पडता है उसका हिसाब करना कठिन है.
एक जमाने में दियासलाई पर भी दिये गये कर की रसीद मिल जाती थी. अब राजदल उत्पादकों, विपणनकर्ताओं और ठीकेदारों से चुनाव चंदा और गिफ्ट ले लेते हैं और उन्हें करचोरी की छूट दे देते हैं.
आम अखबारी जनता और मीडिया आयकर, पेट्रो पदार्थों के दाम,रेल किराया पर खूब चर्चा करते है. रेल किराया बढाने के विवाद पर ममता जी ने मंत्री को हटवा दिया. सेवाकर बढाने पर चुप रहीं. सेवाकर का दायरा बढता जा रहा है जनता झेलती जा रही है.
जब बिक्री कर आया तो कहा गया कि जिसकी बिक्री अधिक है वे लोग सरकार को कुछ कर दे दें. बाद मे सरकार ने इसे ग्राहकों से वसूलने की छूट दे दी.अब जनता कर देती है, उसका एक हिस्सा सरकार पाती है बाकी टैक्स कलेक्टर. अब इसका नाम वैट हो गया है, पहले तो व्यापारियों ने इसका विरोध किया बाद में राजी हो गये. जब सरकार को वैट वसूलना है तो सरकार को हर छोटी या बडी दुकान को अपनी ओर से छपवा कर रसीद देनी चाहिये. साथ मे आधुनिक डिजिटल तकनीक का एक उपकरण देना चाहिये. रसीद पर पूर्ण विवरण होना चाहिये तथा भुगतान किए गये धन की स्लिप डिजिटल मशीन द्वारा भी मिलनी चाहिये यह मशीन हर बिक्री की की सूचना वैट विभाग को दे देगी.
जो सडक या पुल सरकार बनवाती है वह नागरिकों के धन से बनती है. टोल के नाम पर जनता से खूब वसूली होती है. जिसका दस प्रतिशत हिस्सा भी सरकारी कोष में नहीं जाता. इससे केवल ठीकेदार ही कमाते हैं यह उन्ही के लाभ के लिये वसूला भी जाता है. टोल टैक्स की वसूली तत्काल ही बन्द होनी चाहिये.
आयकर की चक्की में मध्यवर्ग को पीसा जात है. आयकर दाता से दंड के नाम पर कर लिया जाता है तथा उसे कोई सुविधा भी नहीं दी जाती. आयकर के दायरे में आते ही उससे सुविधायें हटाई जाने लगती हैं. आयकर विभाग अपने इस दुधारी गाय को लाठी मारने के सिवा कुछ नहीं करता. उसे आयकर की सूचना तक नहीं देता. आयकर की सीमा बहुत नीचे से शुरु हो जाती है तथा १०,२०, और ३० प्रतिशत तक ही रहती है.
आयकर की सीमा को फुटकर उपभोक्ता सूचकांक से जोड दिया जाना चहिये.
पचास लाख की सीमा तक २५% आय को बीमा, पीयफ आदि के लिये छूट दिया जाना चाहिये.
प्रत्येक आयकरदाता का समूह बीमा किया जाना चहिये, करदाता द्वारा दिये गये धन का एक प्रतिशत इस हेतु व्यय किया जाना चाहिये और असामयिक मृत्यु की दशा में तथा अति गम्भीर रोगों की चिकित्सा में दिया जाना चाहिये.
इसे अत्यन्त सरल किया जाना चाहिये और किसी भी संस्था को छूट किसी भी दशा में नहीं दिया जाना चाहिये.
बाकी फिर कभी.
नमस्कार.
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