नमस्कार!
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.
इस बहस ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में सिंहासन, राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों पर हुये व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.
जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.
नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.
नमस्कार.
हालचाल ठीक है.
आम आदमी पार्टी ने हर आम व खास आदमी की पहचान बदल दी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के परम्परागत आवास को छोडकर पांच कमरेवाले मकान को रहने के लिये् चुना तथा साथ वाले पांच कमरेवाले आवास को आवासीय कार्यालय बनाने के लिये . उनके इस निर्णय ने हलचल मचा दी है. अरविद के परिवार में छह सदस्य हैं. वे बताते हैं कि उनका इस समय का घर भी चार कमरे का है. यनडीटीवी के पत्रकार ने सम्भवतः टिप्पडी की थी कि बडे मकान वालों को मुख्यमंत्री का यह निवास बडा लगता है. आम आदमी पार्टी के घोषडा पत्र में है कि वे बंगला और मंहगी गाडी नही लेंगे. एक नामी पत्रकार ने लिखा है कि पहलेवाली मुख्यमंत्री जी का बंगला भी टीवी पर दिखाया जाना चाहिये. इस समय सादगी और केजरीवाल के बंगले पर राष्ट्रीय बहस चल रही है.
इस बहस ने मेरी स्मृति में बसी बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक में ्चर्चित बहस को सामने ला दिया जिसमें राष्ट्रपति भवन, सरकारी तामझाम, तोपों की सलामी आदि पर चर्चा हुआ करती थी. लोकतंत्र की स्थापना के बाद लोगों के दिमाग में सिंहासन, राज , सत्ता तख्त आदि अभी तक बसे हुये हैं. इसे समाप्त करने के महात्मा गांधी के सलाह को कोई महत्व न देते हुये दिल्ली में उनकी समाधि बनाकर उस पर इतना व्यय किया जाता है कि बाकी सभी लोगों पर हुये व्यय को न्यायपूर्ण सिद्ध किया जा सके.
जब यह बहस चल रही है तो यह तय जाना चाहिये कि भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक लोकसेवकों को किस स्तर का कितने क्षेत्रफल का आवास दिया जाना चाहिये. भारत में प्रत्येक स्थान पर इसी मानक का उपयोग किया जाना चाहिये. ऐसा करने पर प्रत्येक स्थान पर भरपूर मात्रा में सरकारी जमीन खाली होगी, जिस पर तमाम कार्यालय, विद्यालय और कर्मचारियों के आवास बनाये जा सकते हैं. जितना बडा शहर हो भवन की ऊंचाई उतनी ही बढाई जाय.इस बात पर बहुत से लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि वर्तमान भवनों का क्या किया जायेगा. सभी जानते हैं कि इनमे से अधिकांश भवन अपनी आयु पूरा कर चुके हैं. जो काम लायक हैं वे भी साम्राज्यवाद की मानसिकता को ही बनाते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व संसद भवन की आयु को लेकर प्रश्न उथे थे, आज के सरकारी लोगों को इन्हें नष्ट करने का मन नहीं करता. ये लोग अग्रेजों के बनाये भवनों और कानूनों इतर नहीं जाना चाहते हैं.
नई दिल्ली की सरकारी इमारतें जितनी जमीन घेरती हैं उतनी जमीन में आज की तकनीक से भवन और आवास बनाये जाय तो तमाम समस्याओं का समाधान मिल सकता है. सबसे बडी आवश्यकता है कि जनता मैदान की जहां जनता अपनी बात कह सके उसे जंतर मंतर पर सीमित कर दिया गया है. दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नियोजित बहुमंजिले भवन बना दिये जांय. पूरा लुटियन क्षेत्र बहुमंजिले भवनों का बना दिया जाय तो अनेकानेक समस्याओं का समाधान निकल आयेगा.
नमस्कार.
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