Friday, May 31, 2013

किसका वाद और किसका तंत्र

किसका वाद और किसका तंत्र
नमस्कार!

हालचाल ठीक ही है. तंत्र और वाद के संघर्ष में कुछ जीवन और गये. जिसके हाथ में बन्दूक हो या जिसकी सुरक्षा में बन्दूकधारी हों उसके मृत्यु की प्रायिकता सामान्य जन की अपेक्षा अधिक होती है. रक्तपात अच्छा तो कभी नहीं होता. किन्तु युद्ध में रक्तपात वीरता और शहादत मानी जाती है. इसलिये सैन्यबल, माओवादी और राजदल के सदस्य मरते हैं तो शहीद हैं और घायल हैं तो वीर हैं. किन्तु शहादत उसे ही मिलती है जिसके रक्तपात में केवल सैद्धान्तिक शत्रुता हो व्यक्तिगत स्वार्थ कहीं भी न हो. क्या ऐसा सम्भव है? इतिहास के पन्नों में इस तरह के युद्धों का विवरण मिलता है किन्तु बुद्धिमान लोग युद्ध और प्रेम में सब जायज है कहकर अपने कुकृत्यों का तर्कीकरण कर लेते हैं, विजयी होने पर करोडों खून माफ होते हैं.

भारत में कौन किस वाद का समर्थक है कहना दुष्कर है. किन्तु सरलता के दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि जो पचास प्रतिशत से अधिक दशाओं में जिस विचारधारा के निकट हो वह उस विचारधारा का है. और अधिक कसौटी खरी करें तो कह सकते हैं कि जसकी विचारधारा पन्चानबे प्रतिशत दशाओं में सही है वह व्यक्ति विचार के अनुसार व्यवहार कर रहा है.इससे अधिक प्रत्याशा नहीं की जा सकती है, शर्त यह है कि वह व्यक्ति जानबूझकर कोई त्रुटि नहीं कर रहा है.

भारत में जितने भी लोकतांत्रिक राजदल हैं उनमें से किसी भी दल में गुप्त मतदान द्वारा पारदर्शितापूर्ण निर्णय नहीं किया जाता है अतः उन्हें लोकतान्त्रिक दल कैसे कह सकते हैं . जब दल लोकतान्त्रिक नहीं हैं तो चुनाव और मतदान के आधार पर लोकतंत्र का नाम दे दिया गया है. मैं भी इसी तरह के लोगों में से ही हूं जो भारत को विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र कहते रहते हैं. भारत के मतदाताओं के लिये मतदाता पहचान पत्र का कार्यक्रम बहुत दिनों से चल रहा है, किन्तु विश्व के सबसे अधिक कम्प्यूटर ज्ञाताओं के देश में धुंधले चित्र,त्रृटिपूर्ण नाम पते वाले पहचान पत्रो की भरमार है. रंगीन फोटोयुक्त शुद्ध मतदाता पहचान पत्र  के अभाव में कितना विश्वास और कितना संदेह किया जा सकता है.

हमारे माननीय प्रत्याशी  के रूप में सेवा का अवसर मांगते हैं और माननीय बनते ही केवल मेवा की तलाश में लग जाते हैं, लाल बत्ती के वाहन के बिना जनसेवा हो ही नहीं पाती और लाल बत्ती की गाडी क्या से क्या बना देती है यह किसी को बताना नहीं है. गठबन्धन के नाम पर देश गिरवी रख दिया गया. दवा और अफीम की तस्करी तो समझ में आती है किन्तु पानी के जहाजों में भरकर खनिज पदार्थ शत्रु देशों को चले जाते हैं. फिर भी कानून व्यवस्था बनी रहती है. गरीब जनता माननीयों के आगे छोटे छोटे कामों के लिये आगे पीछे घूमती रहती है. नौकरी, स्थानान्तरण, ठीका, पट्टा आदि आदि के लिये मध्यवर्ग या खेतबेंचकर धन देनेवाले पीछे-पीछे घूमते हैं. और माननीय बडे घरानों को फंसाने के फिराक में रहते हैं. लाबीईस्ट लगे ही रहते हैं. 

हर राजदल चुनाव में असीमित धन खर्च करता है. सही हिसाब कोई नहीं देता किन्तु इसका प्रमाण नहीं है. चुनाव चन्दा चढावा के रूप नहीं आता उसे प्रच्छन्न बल कौशल से वसूला जाता है. सभी दल इसके लिये नाना प्रकार के हथकन्डे प्रयोग में लाते हैं किन्तु यह सभी कार्य करते हुये राजदल लोकतंत्र की सीमा में बने रहते हैं. राजदल हैं जहां  लोकतंत्र है वहा.

प्रत्येक सरकारी कार्यालय में आफिस आफिस होता रहता है. नजराना, शुकराना और जबराना हर जगह चलता है. हर आफिस, दूकान, मकान चौराहा, ट्रेन, बस, टैक्सी, गांव , मुहल्ला, शहर और महानगर. सडक से संसद तक इसकी जितनी चर्चा होती है उतनी तीब्र गति से वसूली में विकास होता है. यह विकास समावेशी होता है. इसे छोडकर भारत में और कहीं भी समावेशी विकास नहीं होता सिर्फ नारा दिया जाता है.

ऐसे लोकतंत्र में लोग बडी गम्भीरता से कह रहे हैं कि नक्सलवादी  अपनी विचारधारा से भटक गये हैं. आतंकवादी हो गये हैं. रंगदारी वसूलते हैं. उन्हें सबक सिखाना चाहिये. सैन्य अभियान चलाना चाहिये.

ऐसी स्थिति में जब हर जिम्मेदार सेवा के अधिकाधिक लोग भ्रष्टाचार, कदाचार पर उतारू हों. हर दूसरे की गलतियों को गिना रहे हों. और रात को चर्चा में मशगूल हो जाते हों कि किसने कितना किसतरह से कमाया और किस तरह से पचाया. 

ऐसी स्थिति में भारत में कौन सा तंत्र और कौन वाद कहां है ? एक अनुत्तरित प्रश्न जैसे मेरे समक्ष खडा है.






























Thursday, May 23, 2013

रिपोर्ट कार्ड

नमस्कार
हालचाल ठीक है. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भारत निर्माण कर रहे हैं. ्यह निर्माण उन्हें और कान्ग्रेसियों को ही दिखाई दे रहा है. इस समय कोई भी दल नहीं है जिसमें आन्तरिक लोकतन्त्र हो. सभी हर प्रकार से सामन्तवादी हैं. ये सारा दोष जनता पर थोप देने के लिये तैयार बैठे हैं.१९१४ में लोकसभा का आम चुनाव है. सभी दल अपनी सीट बढाने के तिकडमी कार्यक्रम पर जुटे हुये हैं . इस समय कान्ग्रेस चार वर्ष पूरे करने का समारोह कर रही है. मैं भी सोच रहा हूं कि इस सरकार ने भारत को और मुझे ऐसा क्या दिया है जिसके लिये इसकी सराहना करूं या उलाहना दूं.

अब भारत सरकार छ्ब्बीस जनवरी को राष्ट्र की प्रगति का लेखाजोखा न देकर सरकार के गठन के दिन को रिपोर्ट कार्ड का दिन मानती है और अपने को टापर बना देती है.नौ वर्षों से सोनिया और मनमोहन को छोडकर सभी अस्थिर रहे हैं. इन दोनों की प्रत्येक  गलती क्षम्य है.

राष्ट्रीय स्तर तथा अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार में प्रथम  स्थान दिया जा सकता है.
शासन के सन्चालन में बस पास भर किया जा सकता है.
मौन और धैर्य के लिये प्रथम स्थान दिया जा सकता है.
केवल भाजपा वाले मनमोहन जी को ईमानदार कहते रहे हैं क्योकि ये सदा से पूंजीपतियों के पक्षधर रहे हैं किन्तु अब वे भी बेईमान कहने लगे हैं. अतः बेईमानी में प्रथम श्रेणी प्रदान किया जा सकता है.
देश के भ्रष्टों को मनमोहन जी के कारण राहत, सूझ, और सहनशक्ति मिलती है अतः इन्हे माडल भ्रष्ट कहा जा सकता है.

Monday, May 13, 2013

मेला

नमस्कार !
हालचाल ठीक है .

बचपन में अक्षय तृतीया को सोहनाग का मेला करने ( मेला में जाने के लिए प्रयुक्त शब्द )गया था. परशुरामधाम  सोहनाग देवरिया जिले के सलेमपुर तहसील मुख्यालय से २-३  किमी दक्षिण स्थित है. उस समय मै प्राथमिक कक्षा के तीसरी या चौथी का विद्यार्थी था. मुझे कनिया (मेरी चचेरी दादी ) के साथ जाना था .कनिया को सभी लोग कनिया ही कहते थे . मरे गाँव से सोहनाग की दूरी लगभग तीन कोस या दस किमी है. अक्षय तृतीया मई महीने में पड़ती  है . देहात में तब मई महीना रबी के कृषि कार्य के बाद का काल होता था. प्राथमिक विद्यालय अभी चलते रहते थे. लू और गर्मी सहने की आदत भी थी. 

एकतीजिया (अक्षय तृतीया) के दिन बहुत सबेरे चलकर सूर्योदय तक सोहनाग पहुँच गए . वहां कमल (पुरइन ) के पत्तों से घिरा एक पोखरा दिखा जिसके चारो ओर लोग नहा रहे थे . हमलोग भी नहाए . आज के दृष्टिकोण से ओह नहाने लायक पानी नहीं था . किन्तु वहां सभीलोग नहाते रहे। कहते  रहे कि कनई (कीचड) हो गया है . लोग नहाते रहे. नहाने के बाद भगवान  परशुराम  का दर्शन कैसे किया यह तो याद नहीं किन्तु मानस पटल में मंदिर और पोखरे को जो चित्र  था वह कुछ वर्षों पूर्व धूल धूसरित हो गया . मंदिर के बगल का खँडहर  भी नहीं दिखा. 

मेले में नहाने के बाद जलपान के लिए तीसी के तेल की जलेबी मेले की सर्व प्रमुख आकर्षण थी  जो आज भी बनी हुई है. अब तीसी का तेल दुर्लभ हो गया है तब शोध हुआ है की दिल के रोगियों की दवा है तीसी. अब तो सबसे घटिया वनस्पति या किसी ऐसे  माध्यम में जलेबी बनती  है. जलेबी के साथ घर से लाया हुआ जलपान भी हुआ. जलपान से याद आया कि घर से जलपान, दान का सिद्धान्न (सीधा ) और दोपहर के लिए सत्तू भी साथ आया था. 

पोखरे के चारो ओर कई मदारी प्रदर्शन में जुटे थे . उसमे से एक बिच्छू की दवा बेंच रहा था . उसके पास बहुत से बिच्छू भी थे वह दवा का परीक्षण भी दिखाया फिर दवा बेचने लगा मैंने भी एक गोली खरीदी . उस गोली नुमा बूटी की विशेषता बतायी गयी थी की बिच्छू के डंक मारने पर उस दवा को पत्थर पर पानी के साथ रगडकर चिपकादेने पर वह  चिपक कर विष खीचने लगेगी और दर्द कम होने लगेगा . दर्द समाप्त हो जाने पर बूटी अलग हो जायेगी, धोकर रख देने पर पुन: कार्य करने लगेगी. मैंने भी वह बूटी खरीदवाया .

बहुत जल्दी ही धूप तेज होने लगी और लोग मेले से बाहर होने लगे . रास्ते में भिखारियों की लाइन लगी हुई थी जिसमे से अधिकाश कोढी थे. उस समय भी भिखारियों के विषय में जो चर्चा हो रही थी आज भी होती है . मेले में आने वाले लोगों की मनोवृत्ति की भी चर्चा हुई . शिव पार्वती की एक प्रचलित कथा के अनुसार बताया गया की जो जिस भावना से आया है उसे वही मिलेगा. 

आगे बढ़ने  पर एक बड़ा सा आम का बाग़ आया वहां कूआं था जिसपर कोई व्यक्ति ढेकुल से लगातार पानी चला रहा था .बहुत से लोग अपना लोटा और डोरी लेकर गए थे वे अपना पानी अपने ही भर लेते थे . कई लोग पनिसरा चला रहे थे . वे लोग बड़े से मिटटी के मटके में जल रखकर लोगों को बतासे के साथ पिलाते थे. बतासा अभी भी बचा हुआ है लेकिन हर सस्ती भारतीय मिठाई की तरह उपेक्षित है. इसमें मिलावट तो की ही नहीं जा सकती. तब केवल मापतौल में डंडीमारी (घटतौली )होती थी. 

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पवहारी महाराज का नाम बहु प्रचलित है. पैकौली में उनकी मूल कुटी है जहां का पक्का पोखरा देखने लायक है. इस क्षेत्र बहुत से लोग पवहारी महाराज के शिष्य हैं . उस बागीचे में उनकी जमात भी विश्राम कर रही थी. उनके चेले खलिहानी जौ , गेंहू या गोजई लेकर आते उन्हें देते और चरण स्पर्श करते. बहुत से लोग उसी दिन सिख (शिष्य) बन जाते. 

हम लोग भी गमछे में सत्तू सानकर  भरुआ मरिचा  और अचार से खाकर आगे चल दिये. अब धूप तेज हो गई थी . पैर जलने लगे थे. रास्ते के किनारे की घास खोज कर उसपर चल रहे थे. जहां बालू होता वहा दौड़ते हुये. छाया में रुकते हुए लगभग पांच बजे घर पहुँच गये. घर आने पर थाली में पर धोया गया . वह मेले का का अद्भुद आनंद वास्तव में पूरा वर्णित हो सकता. 

तब परशुराम जी राजनैतिक नहीं हुए थे. 

वर्तनी की अशुद्धियों केलिए क्षमा याचना सहित .

 नमस्कार ! 




















Wednesday, October 3, 2012

" उच्च शिक्षा में लूट की छूट"


  " उच्च शिक्षा में लूट की छूट"
सभी बड़े औद्योगिक घराने लाभकारी शिक्षण संस्थाएं चलाना चाहते हैं. क्योंकि इसमे सतत  लाभ
की पूर्ण संभावना है. अभी कुछ दिनों पहले भारत के राष्ट्रपति महोदय ने भारतीय उच्चशिक्षा के केन्द्रों के निराशाजनक प्रदर्शन पर टिप्पड़ी किया. उसके तत्काल बाद गुणवत्ता की चर्चा पुनः चला गयी है.

अब प्रश्न उठता है कि क्या अबतक भारत के वित्तमंत्रियों ने शिक्षा और विशेष कर उच्च शिक्षा पर उतना वित्तीय ध्यान दिया जितना  देना चाहिए? उत्तर मिलेगा नहीं . कारण यह है कि अभी तक शिक्षा और शिक्षा का स्तर वोटबैंक की राजनीति में कोई महत्त्व नहीं रखते.

जनतांत्रिक देश में शिक्षा की व्यवस्था किसी भी हालत में किसी के दान पर नहीं छोडी जानी चाहिए न ही इसे व्यापार के लिए खोला जाना चाहिए. भारत का प्रत्येक नागरिक कर देता है उस कर का प्रयोग राज-दल  अपने वोटबैंक बनाने के लिए करते हैं. तमाम योजनायें चलाई जाती हैं जिन्हें लूट के लिए ही चलाया जाता है. जनता से अब शिक्षा कर  की  वसूली भी की जा रही है किन्तु सबको शिक्षा का समान अवसर नहीं दिया जा रहा है. जब मांग होती है तो एक आयोग बना कर समस्या को लटका दिया जाता है.

अब देशी और विदेशी  कारपोरेट सेक्टर शिक्षा से धन दोहन की पूरी तैयारी कर चूका है और सरकार बेचना शुरू कर दी है . शिक्षा के अधिकार के कानून में सबको शिक्षा देने के लिए आवश्यक धन जुटाने केलिए केंद्र सरकारें और प्रांतीय सरकारें एक दूसरे को नीचा दिखाती रहेंगी. और सुधार के नाम पर झुनझुने मिलते रहेंगे.

Monday, September 17, 2012

बरसात में गैस की आग

बरसात में गैस की आग
नमस्कार !

हालचाल ठीक है न.

मानसून की कमी में कोयले  के भ्रष्टाचार को लेकर संसद का सत्र व्यर्थ हो गया. कोयला सुलगते सुलगते आग में बदल गया. सरकार आग में पानी डालने के बजाय एक अधिक ज्वलनशील पदार्थ डीजल और गैस में आग लगा दिया. गैस की आग खतरनाक होती है अतः सभी विरोधी दल गैस से हाथ सेंकने चल दिए. २० सितम्बर को देश की दुकाने बंद रखने के लिए भारत बंद होगा. स्पष्ट है देशवासी और राज-दल दोनों के लिए भ्रष्टाचार अधिक ज्वलन शील मुद्ददा गैस है.

पेट्रोलियम पदार्थों का दाम हरदम अबूझ पहेली रहा है. इसमें सब्सिडी दी जाती है. तेल कम्पनियां घाटे का रोना रोती हैं.  हरदम दाम बढाने या सब्सिडी घटाने की चर्चा होती रहती है. पेट्रोल पम्प और गैस की एजेंसी के लिए पचास लाख  से लेकर एक करोड़ तक घूस दिया जाता है. एजेंसी पाने वाला करोड़ पति हो जाता है  .यह सब हो जाता है, किन्तु जनता को गैस और मिट्टी का तेल जिसे किरोसिन भी कहते हैं सुविधापूर्वक नहीं  मिल पाता है. छोटे शहरों की हालत तो और ही खराब है. समाज के प्रभावशाली चारो खम्भे ( विधायिका,कार्यपालिका, न्यायपालिका, और मीडिया ) तथा पांचवा खम्भा ( असामाजिक तत्व ) के लोगों को छोड़कर बाक़ी गैस पाने का हर जुगाड़ करते हैं और जी लेते हैं.

जब गैस के दाम बढाने की बात होती है तो राज-दल खूब हल्ला मचाते हैं किन्तु नया कनेक्सन लेना और भरे गैस का सिलिंडर मिलता रहे इसकी व्यवस्था बनवा लेने में अबतक असफल रहे हैं.

इस समय यह लिखना जरूरी है कि भाजपा के शासन काल में गैस की किल्लत आश्चर्यजनक रूप से दूर हो गयी थी .इसका राज नही खुल पाता है.

सरकार ने डीजल दाम बढ़ा दिए और गैस में हिचकी ले रही है. सरकार बचाने का रास्ता शायद गैस दे दे किन्तु जनता के गैस की समस्या दूर कैसे होगी इसकी चिंता किसी को नहीं है.

मैं देवरिया नाम के एक छोटे से शहर में रहता हूँ. गैस को लेकर जो जो दुर्गति हो चुकी है उसका संस्मरण कभी फिर. अभी तो मैं इस समस्या समाधान के लिए अपना विचार रखने जा रहा हूँ.

पेट्रो पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दिया जाय, क्योंकि  सब्सिडी  व्यापारी, अफसर, नेता, मंत्री और राज-दल के चक्रव्यूह में फंसकर रह जाता है. सरकार केवल डीजल और मिट्टी के तेल पर लगने वाले टैक्स को कम कर दे अथवा करमुक्त कर दे. राजकोषीय घाटा का हल्ला कर मंहगाई बढाने वालों का मुंह बंद हो जायगा.

गैस का वितरण जैसे हो रहा है उसे होने दिया जाय और प्रत्येक तहसील पर कंपनियों के नए गोदामों द्वारा सीधे जनता को छोटे, मझोले और बड़े सिलिंडरों में दिए जाय. जो चाहे जितना चाहे ले जाय. गैस उसके एक फोन काल पर उसके  घर पहुंचा दिया जाय. छोटे सिलिंडरों का  ग्राहक वही तबका है जिसके नाम पर गैस सस्ता बेचनें कि राजनीति की जा रही है. ये ग्राहक बाजार से अप्रामाणिक छोटा सिलिंडर खरीदते हैं और अवैध रूप से  तिगुने दाम पर बेचे जाने वाले गैस को भरवा लेते  हैं.


सरकार जितना सबसिडी देती है लगभग उतना ही धन ब्लैक सिलिंडर के बिकने से बाजार में आता है. यही हाल मिट्टी के तेल का भी है.

इसी प्रसंग में यह भी कहना जरूरी है कि रिफाइनरी से सीधे हवा में जला दी जाने वाली ऊर्जा को भी उपयोग में लाया जाना जरूरी है.

जनता को भीख नहीं अधिकार चाहिए. उसे हर खरीद अथवा बिक्री पर उचित  मूल्य चाहिए. जनता द्वारा दिया गया कर राजकोष में ही पहुचना चाहिए. तेल के सब्सिडी के खेल की भी जांच जरूरी है. आखिर तेल का पैसा कौन खा रहा है? 

नमस्कार !

Sunday, August 5, 2012

सपने से सपने तक


नमस्कार ! अगस्त माह भारत में अति महत्वपूर्ण है. हम अपनी स्वतंत्रता की याद करते हैं. अपने विकास की समीक्षा करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत ने विकास नहीं किया है. किन्तु हम कितने पीछे हैं और क्यों इतने पीछे हैं?

बहुत दिनों से बहुत सारे लोग भ्रष्टाचार को इसका कारण मानते हैं. कुछ लोग संसदीय लोकतंत्र को ही इसका कारण मानते हैं. भारत के राजनैतिक दल निराशा के दौर में थे , भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक आन्दोलन की अगुआयी की , आपातकाल लागू हुआ , सारे विरोधी  दल के नेता गण फर्जी मुकदमों में जेल में डाले गए. तब यह ज्ञात हुआ कि कि शासन के कहने पर कैसे लोगों को झूठे आरोपों में डाल दिया जाता है. जिले स्तर पर कांग्रस के नेता सूची बनाकर दे देते थे और लोग जेल में बंद कर दिए गए. जनता दल का गठन हुआ. जनता दल के टिकट देने के समय खूब धांधली हुई.  सभी दलों के एक हो जाने के कारण कांग्रेस हारी. जनता दल का शासन आया,  इंदिरा जी जेल गयीं , व्यक्तियों की राजनैतिक पदलिप्सा ने उसका अंत किया और कांग्रेस पुनः शासन में लौट गई. संजय गांधी ने जनता दल को तोड़ने की कूटनीति काफी योगदान किया. भारत के आगामी प्रधानमंत्री के रूप पूजे जाने वाले संजय गांधी का दुखद अंत हो गया. इंदिरा जी के पश्चात राजीव गांधी  देश के प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस के लोगों को उनकी इमानदारी नहीं पची और वे षड़यंत्र के शिकार हो गए. देश में पुनः बोफोर्स तोप काण्ड के बहाने भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात पर सरकार बनी . वामपंथी और भाजपा दोनों एक साथ खड़े हो गए. वह सरकार भी भ्रष्टाचार को समर्पित हो गयी. इसके बाद तो भ्रष्टाचार किस गति से बढ़ा कुछ पता ही नहीं. भारत के नेताओं ने  संविधान के संकल्प के विपरीत  समाजवाद को छोड़कर पूंजीवाद अपना कर जनता की संपत्तियों को बेंचकर काला धन बनाया. विदेश भेजा और उसे फिर मंगा कर भारत में लगाया , एन आर आई के नाम पर भारत  का पैसा भारत में फिर आ गया. नेताओं ने प्रतियोगिता कर के धन कमाया. इस बीच बहुत से आन्दोलन हुए किन्तु निष्प्रभावी रहे . एक हिन्दुस्तानी आन्दोलन नामक संस्था कुछ  दिन तक चर्चा में रही. भाजपा भी भारत को भ्रष्टाचार से चमका कर चली गयी . लोग पुनः कांग्रेस की और झुक गए . यद्यपि साझा सरकारों का ज़माना आ गया. भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता और बढ़ गयी. उसी समय अंधरे में एक किरण के रूप में अन्ना का आन्दोलन आया और लोग उस किरण की और लपके. इसी के साथ काले धन पर बाबा रामदेव की चर्चा बढी . बाबा देश में काला धन बनने से चिंतित नही. केवल बाहर गया काला धन वापस लाना चाहते हैं.

बुद्धिजीवी अन्ना आन्दोलन से ज्यादा जुड़े. अन्ना देश के दूसरे गांधी बन गए. कांगेस के वकील मंत्री अपने वाकजाल में आन्दोलन को उलझाने में लग गए. अन्ना और साथी उनके जाल में फंसकर उतावली में आ गए. और हमारे सामने एक और अनशन आ गया जिसमे अरविंद केजरीवाल नेता बनकर आये. जनता का साथ अब उतना नहीं मिला. लेकिन बहुत सारे लोग सपना देखने लगे. कांग्रेस बहुत सारे अनशनकारियों  को मार चुकी है. यह सोचकर लोगों ने कई विकल्प सुझाए जिसमें अनशन स्थगित कर राजनैतिक दल गठन करने का सुझाव आया. अचानक यह समाचार बहुत सारे लोगों के गले नहीं उतारा.


आन्दोलन के पुराने आलोचक दिवाली के मूड में आ गए. राजनैतिक दलों का तो कहना ही क्या.

 अब एक नया दल बनने वाला है जो राय मांग रहा है.

सभी समाचार पत्र इस नए दल हेतु राय बताएं. जब दल की रूपरेखा आ जाए तो सवाल उठायें.

जो यह कहते हैं कि इस आन्दोलन के नाते उनके प्रभावशाली आन्दोलन की हवा निकल गयी, वे पुनः अपने काम पर लग जाय. रास्ता बनाने वालों को रास्ता मिल जाता है.

सभी दलों और चिंतको को नमस्कार और देश के उज्जवल भविष्य की शुभकामना के साथ.

Friday, May 11, 2012

और अवंतिका बिक गयी


नमस्कार ! 

अवंतिका के बिकने पर भी मुझे खुशी हुई. यद्यपि अवंतिका का बिकना भारतीय समाज में फैले अन्धविश्वास में से एक है. किन्तु ऐसे अंधविश्वास  बुरे नहीं लगते हैं. कोई अपनी संतति को क्यों बेंचता है ? निश्चय ही अत्यंत मजबूरी में, सभी मार्ग बंद होजाने पर संततियां बिक जातीं हैं. मेरा यह कथन निरापद नहीं है. (दहेज लेना बेटा बेचने के रूप में प्रचलित नहीं है.)

आजके जमाने में जब बेटियों को कुछ लोग पसंद नहीं करते उसी जमाने में बेटियां हर क्षेत्र में धूम मचा रहीं हैं.  फिर भी बेटी का जन्म बहुत प्रीतिकर नहीं होता. थोड़ी कसक रहती है. अभी भी जब हम सब केवल मतदान मात्र के लिए समान अधिकारी हैं, तब अवंतिका को जीवित बचाने के लिए उसके पिता का संघर्ष प्रशंसनीय है.

अवंतिका अपनी माँ की दूसरी किन्तु पहली जीवित सन्तति है. आपरेशन से जन्मी अवंतिका को कुछ  ही समय में अपनी माँ  की सुखद गोद को छोड़कर दो किलोमीटर दूर एक ऐसे बाल चिकित्सक की शरण में जाना पड़ा जो अपने दुर्व्यवहार के लिए पूरे देवरिया में जाने जाते हैं. उसे क्या हुआ था यह तो चिकित्सक ही जानते हैं . भारत में चिकित्सक  रोगी को पूरी बात बताने परहेज करते है. पर्चा ऐसी अंग्रेजी में लिखते हैं जिसे कोई पढ़ नही सके. कोई कुछ नही कर सकता है . माननीय  सर्वोच्च न्यायालय की भाषा भी अंग्रेजी ही है. संसद में माननीय सांसद जिस भाषा में चाहे सुन सकते हैं किन्तु लोकसभा की कार्यवाही का प्रसारण  सुनाने वालों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है . डिस्कवरी चैनल को आप हिन्दी में सुन सकते हैं. ऎसी स्थिति में अवंतिका की माँ को कोई कैसे समझा सकता है की अवंतिका जीवित है. उसे तो यही लगता है की उसकी पहली सन्तति जैसे यह भी मर गयी है और घरवाले बता रहे हैं  कि वह दूसरे हास्पिटल में है.

जब मैं अवंतिका को देखने गया तो तो सुन्दर सी अवंतिका के चहरे पर रोग के नहीं शान्ति के लक्षण  थे किन्तु वह आक्सीजन  पर जी रही थी.  बहत्तर घंटे बाद  ही वह अपने इस बंधन से मुक्ति पा सकी तबतक उसे पीलिया हो गया . दस बारह हजार रूपये खर्च हो जाने के बाद अवंतिका अपने प्रसन्न पिता कि गोद में सवार होकर अपनी जननी सेमिलने पहुंची किन्तु तबतक  भयाक्रांत माँ को बताया जाचुका था कि यह सन्तति आपकी होते हुए जी नहीं सकती अतः इसे बेंच दें. 

और अवंतिका हास्पिटल के दाई के हाथों दस रूपयें बिक गयी.

अवंतिका के माँ बाप किसी तरह से धन एकत्र किये थे कि इस द्वितीय प्रसव के समय सामान्य प्रसव और जिला चिकित्सालय का परित्याग कर दिया जायगा जिससे कि सन्तति की हानि न हो. प्रसव चिकित्सालय पैसा तो लेते हैं किन्तु सामान्य और आवश्यक सुविधाए नहीं प्रदान करते . माँ किसी और जगह और नवजात शिशु  कहीं और एक दडबे में . उस दडबे में दो शिशु और दोनों के अभिभावक  एक साथ  इन्फेक्शन की पूरी संभावना के साथ.

इस लोकतंत्र में अवंतिका के  पिता ऋण  लेकर यदि अवंतिका की जान बचानें के लिए दिन रात एक नहीं करते तो अवंतिका का क्या होता ? संसद में  केंद्र और राज्य लड़ते रहते हैं  . चिकित्सा की धन राशि लूटी जाती रहती है और हजारों अवन्तिकाएं मरती रहती हैं. 

हम किसी देश के कानून के अनुसार शिशुओं की देखरेख  न करने वाले माता पिता के लिए शोर मचा सकते हैं किन्तु अपने देश की प्रसूताओं और शिशुओं की रक्षा के उपाय नही कर सकते हैं .

क्या हम अवंतिका को कह सकते हैं कि अवंतिका तुम निश्चिन्त रहो हम तुम्हारे साथ हैं. 

नहीं अवंतिका नहीं हम तम्हे  कानून दे देगे- स्वास्थ्य  रक्षा का कानून , शिक्षा के अधिकार का कानून, दहेज  निरोध का कानून.

कानून और केवल  कानून.  और अवंतिका जब इस कानून को लागू कराने के लिए जब  तुम न्यायालय जाओगी तो हो सकता है कि तुम्हारे जीवन काल  में ही न्याय मिल जाए. न्यायालय  में लगने वाले समय पर तो फर्नीचर वाले टिकाऊ फर्नीचर का विज्ञापन करते हैं.